मंगलवार, 7 मई 2013

क्यों लगती है प्यास ?


गर्मी रानी ,क्यों लगती है ,
तुमको इतनी प्यास ।
पी जाती हो गटक् गटागट, 
दिन भर कई गिलास ।

मटके रीते ,रीत चले हैं ,

कूप ,नदी और ताल ।
इन्हें रोज भरते--भरते ,
धरती नानी बेहाल ।

कभी चाहिये शरबत तुमको ,

कभी शकंजी ,लस्सी ।
आइसक्रीम तो , अरे बाप रे...,
पूरी..... सत्तर...अस्सी ।
एक न छोडी बोतल फ्रिज में,
कोल्ड-ड्रिन्क खल्लास ....
गर्मी रानी क्यों लगती है ,
तुमको इतनी प्यास ।

"क्यों लगती है प्यास ?

न पूछो मुझसे छुटकूलाल ।"
कहते--कहते गर्मी जी का ,
चेहरा होगया लाल ।
"सर्दी ने गुड ,गजक ,बाजरा ,
 उडद मखानी दाल ,
 तिल की टिक्की गरम मँगौडे,
 परसे भर-भर थाल ।
मैथी के चटपटे पराँठे ,
और कचौरी खस्ता ।
भजिये, आलू-बडे ,समोसे,
सब कुछ पाया सस्ता ।
इतना खाया...,इतना खाया,
पिया गया ना पानी 
अब लगती है प्यास 
तभी तो ,..पानी ,
और बस...
पानी....।"

5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर ... मीठी ... प्यारी रचना ...
    सच कहूं तो मैं भी जिज्ञासा से पढ़ रहा हूं तो बच्चे तो रोमांचित हो जाएंगे ....

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  2. पानी बिन कुछ और न सूझे,
    कितनी प्यास लगी, न बूझे।

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  3. बिन पानी सब सून!

    स्वाद!!!

    आशीष

    --

    थर्टीन एक्सप्रेशंस ऑफ़ लव!!!

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