टहनी
टहनी मुस्काते हैं
पढकर
आए है सूरज से ,
रंगों
सजी किताब।
कल तक
पंखुडियाँ सोईं थीं
देख
रही थी सपने ।
तड़के
ही चिड़ियों ने इनको ,
गीत
सुनाए कितने ।
किरणें
बोली --जागो जी,
कबतक
देखोगी ख्वाब ।
झुकी
बोझ से इनके
टहनी
की है हालत खस्ता ।
जैसे
भारी बस्ता ।
या नन्ही
के कन्धों पर ज्यों
मुन्नू
चढ़े जनाब ।......
कितना
सुन्दर आँगन ।
अनगिन
फूल खिलें जिस आँगन
है कितना
मन-भावन ।
किसने
दीं हैं कुदरत को ये ,
खुशियाँ
बिना हिसाब ।...
क्यूँ
ना यूँ ही मुस्कायें
फूलों
की ही तरह सभी की
आँखों
को हम भायें ।
हर सवाल
को मिल जाए
ऐसा
मासूम जबाब ।



सुन्दर आह्वान
जवाब देंहटाएंवाह
बहुत बहुत धन्यवाद आपको
हटाएंसुंदर
जवाब देंहटाएंहार्दिक धन्यवाद आदरणीय जोशी जी
हटाएंहोंठों पर मुस्कान गुलाबी बिखर गयी सुगंध फूलों की मासूमियत निखर गयी।
जवाब देंहटाएंप्यारी रचना।
सादर।
-------
नमस्ते,
आपकी लिखी रचना सोमवार १३ जनवरी २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
देर से आमंत्रित करने के लिए क्षमा प्रार्थी हूॅं।
होंठों पर मुस्कान गुलाबी बिखर गयी सुगंध फूलों की मासूमियत निखर गयी।
जवाब देंहटाएंप्यारी रचना।
सादर।
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नमस्ते,
आपकी लिखी रचना सोमवार १३ जनवरी २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
देर से आमंत्रित करने के लिए क्षमा प्रार्थी हूॅं।