विहान

बाल-कहानियों व कविताओं का पिटारा

मंगलवार, 3 सितंबर 2013

मिट्टी की बात

›
एक था नन्हा पौधा गुलू । बहुत ही कोमल ,प्यारा और खूबसूरत । उसके हरे-भरे पत्ते बडे उल्लासमय लगते थे मानो आकाश से जान-पहचान करना चाहते हों । ...
17 टिप्‍पणियां:
सोमवार, 19 अगस्त 2013

धरती गमक उठी है ।

›
पडी फुहारें वन आँगन में , भीगी धरती गमक उठी है । धूमिल काले कलश उठाये, मेघराज पानी भर लाये । उमड--गरज कर खाली कर गये, बीजुरिया ,लो ...
4 टिप्‍पणियां:
बुधवार, 14 अगस्त 2013

हमारा तिरंगा

›
हमें जान से भी है प्यारा तिरंगा, अनौखा निराला है न्यारा तिरंगा । ये लहराए, पहली किरण मुस्कराए सिन्दूरी प्रभा से गगन जगमगाए। उदय होते र...
5 टिप्‍पणियां:
सोमवार, 15 जुलाई 2013

वर्षा का स्कूल

›
आसमान में शुरु होगया, वर्षा का स्कूल। सूरज की जो बजी 'बेल,' सुन दौडे रेलमपेल। नन्हे -नन्हे बादल , लादे भारी बस्ता , और पानी...
6 टिप्‍पणियां:
बुधवार, 12 जून 2013

पेड किसका है ?

›
यह कहानी वैसे तो चकमक, मिट्टी की बात ( कहानी संग्रह एकलव्य) तथा बाल भास्कर में आ चुकी है लेकिन आपके पढे बिना बात अधूरी है । इसलिये इसे यहाँ...
12 टिप्‍पणियां:
बुधवार, 5 जून 2013

नदिया कहती है ।

›
नदिया बहती है । सबसे कहती है । गति ही तो जीवन है । गति ही अन्वेषण है । तुम चलते रहो ,डरो ना मन में सन्देह भरो ना   जो पानी सा बहता है...
6 टिप्‍पणियां:
गुरुवार, 30 मई 2013

सूरज सर

›
सूरज सर के गरम मिज़ाज जब देखो रहते नाराज   क्यों  रहते हैं  तेवर तीखे ? क्यों इतने रूखे अन्दाज ? देते कितने कठिन सवाल चलते अन्धड और ब...
2 टिप्‍पणियां:
‹
›
मुख्यपृष्ठ
वेब वर्शन देखें

मेरे बारे में

मेरी फ़ोटो
गिरिजा कुलश्रेष्ठ
जीवन के छह दशक पार करने के बाद भी खुद को पहली कक्षा में पाती हूँ ।अनुभूतियों को आज तक सही अभिव्यक्ति न मिल पाने की व्यग्रता है । दिमाग की बजाय दिल से सोचने व करने की आदत के कारण प्रायः हाशिये पर ही रहती आई हूँ ।फिर भी अपनी सार्थकता की तलाश जारी है ।
मेरा पूरा प्रोफ़ाइल देखें
Blogger द्वारा संचालित.