विहान

बाल-कहानियों व कविताओं का पिटारा

गुरुवार, 23 अगस्त 2018

बादल बरसे रे ...

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उमड - घमड , घिर आये बादल , रिमझिम बरसे रे .. । चप्पा - चप्पा भीगा , पत्ता - पत्ता हरसे रे ... । कल ही बोली थीं अम्मा --- “...
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गुरुवार, 1 मार्च 2018

खेलो ऐसी होली

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रंग-उमंग गुलाल प्रेम का , भरलो अपनी झोली । खेलो ऐसी होली . भरो भरोसे के गहरे रंग , अपने निश्छल मन में । दुश्मन को भी आज डुबा...
सोमवार, 3 जुलाई 2017

बुलबुल रानी

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"सुनो - सुनो ओ बुलबुल रानी नहीं करेंगे हम शैतानी । जरा हमें घोंसला दिखादो, समझो नहीं इसे मनमानी।" "बोलो कहाँ - ...
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बुधवार, 4 जनवरी 2017

झरना

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झर् झर् झर् झरता है झरना . सर् सर् सर् बहता है झरना , पर्वत के अन्तर में पिघली , करुण-कथा कहता है झरना . रात और दिन झरे निरन्तर ...
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रविवार, 13 नवंबर 2016

पीछे-पीछे सब डिब्बों से......

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आठ माह की मान्या  नन्ही मान्या   घुटनों-घुटनों चलती किलक-किलककर ! उसे पकड़ने दौड़ पड़ा है पीछे  सारा  घर ! चश्मा रखकर ...
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शनिवार, 29 अक्टूबर 2016

जगमग दीप जले

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गिरी अँधेरे की दीवारें , जगमग दीप जले . झिलमिल झिलमिल सजी कतारें जगमग दीप जले . गया दशहरा जैसे ही , तन मन आई दीवाली . द्वा...
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मंगलवार, 27 सितंबर 2016

मुझको तो गाना है .

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था एक अँधेरा कमरा  कमरे में थी अलमारी . अलमारी में रक्खे थे , कुछ डिब्बी-डिब्बे भारी . डिब्बी डिब्बों के पीछे . बैठा था आँखें ...
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मेरे बारे में

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गिरिजा कुलश्रेष्ठ
जीवन के छह दशक पार करने के बाद भी खुद को पहली कक्षा में पाती हूँ ।अनुभूतियों को आज तक सही अभिव्यक्ति न मिल पाने की व्यग्रता है । दिमाग की बजाय दिल से सोचने व करने की आदत के कारण प्रायः हाशिये पर ही रहती आई हूँ ।फिर भी अपनी सार्थकता की तलाश जारी है ।
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