विहान

बाल-कहानियों व कविताओं का पिटारा

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

आया वसन्त

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सर्दी का अन्त हुआ ,आया वसन्त . लम्बे अब दिन हुए .उजले हैं अनछुए . धूप नई निखरी है .पात पात बिखरी है . उत्सव दिगन्त हुआ आया वसन्त.   ...
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रविवार, 29 नवंबर 2020

सर्दी के दिन

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  दादाजी की पगडी जैसी लम्बी रातें हैं चुन्नू जी के चुनमुन चड्डी ,झबलों जैसे दिन लम्बी और उबाऊ, जटिल सवालों सी रातें उछल-कूद और मौज-मजे की छु...
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सोमवार, 14 सितंबर 2020

अपनी खड़ी बोली

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  मिसरी की गोली अपनी  खडी बोली । माँ ने दूध में है घोली अपनी खडी बोली ।   सरस है  , सक्षम है सरल और शुद्ध है अनुभूतियों का सागर अभिव्यक्ति म...
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शुक्रवार, 7 अगस्त 2020

चौमासे के दिन

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  बौछारों से गीले गीले ,चौमासे के दिन  कपड़े जैसे सीले सीले ,चौमासे  के दिन . कभी बादलों की छाया में , सोए सोए से , कभी धूप में चटकीले हैं ,...
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सोमवार, 6 जुलाई 2020

बिन्नी की जीत

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नौ साल की बिन्नी अपने तीन भाई-बहिनों में सबसे बड़ी है . पढ़ने में तो सबसे होशियार है ही पर खेलने में भी उसका कोई मुकाबला नही है .उसे सु...
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रविवार, 28 जून 2020

छोटी चिड़िया

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उस समय पूरब के आसमान में लालिमा फैल गई थी . चिड़ियाँ भी  अपने अपने नीड़ छोड़कर दाने की तलाश में उड़ गईँ थीं . बिरज माँ घर-आँगन बुहार चुकी...
मंगलवार, 5 मई 2020

सबसे सुन्दर

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एक छोटी सी नदी के किनारे एक बड़ा सा बगीचा फैला हुआ था .बगीचे में कई तरह के पेड़ थे .आम , कटहल , अमरूद , सन्तरा , कचनार , गुलमोहर , चम्पक ...
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मेरे बारे में

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गिरिजा कुलश्रेष्ठ
जीवन के छह दशक पार करने के बाद भी खुद को पहली कक्षा में पाती हूँ ।अनुभूतियों को आज तक सही अभिव्यक्ति न मिल पाने की व्यग्रता है । दिमाग की बजाय दिल से सोचने व करने की आदत के कारण प्रायः हाशिये पर ही रहती आई हूँ ।फिर भी अपनी सार्थकता की तलाश जारी है ।
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