विहान

बाल-कहानियों व कविताओं का पिटारा

रविवार, 30 मई 2021

यों लगती है प्यास

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  गर्मी रानी , क्यों लगती है , तुमको इतनी प्यास ? पी जाती हो गटक् गटागट , दिन भर कई गिलास ।   मटके रीते , रीत चले हैं , कूप , न...
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रविवार, 18 अप्रैल 2021

एक अनौखी माँग

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विहान अपने माता पिता की इकलौती सन्तान है . पिता विनीत बैंगलोर में एक बड़ी कम्पनी में मैनेजर हैं और माँ नीलिमा एक पत्रिका में सम्पादक है .उनक...
13 टिप्‍पणियां:
गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

आया वसन्त

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सर्दी का अन्त हुआ ,आया वसन्त . लम्बे अब दिन हुए .उजले हैं अनछुए . धूप नई निखरी है .पात पात बिखरी है . उत्सव दिगन्त हुआ आया वसन्त.   ...
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रविवार, 29 नवंबर 2020

सर्दी के दिन

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  दादाजी की पगडी जैसी लम्बी रातें हैं चुन्नू जी के चुनमुन चड्डी ,झबलों जैसे दिन लम्बी और उबाऊ, जटिल सवालों सी रातें उछल-कूद और मौज-मजे की छु...
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सोमवार, 14 सितंबर 2020

अपनी खड़ी बोली

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  मिसरी की गोली अपनी  खडी बोली । माँ ने दूध में है घोली अपनी खडी बोली ।   सरस है  , सक्षम है सरल और शुद्ध है अनुभूतियों का सागर अभिव्यक्ति म...
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शुक्रवार, 7 अगस्त 2020

चौमासे के दिन

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  बौछारों से गीले गीले ,चौमासे के दिन  कपड़े जैसे सीले सीले ,चौमासे  के दिन . कभी बादलों की छाया में , सोए सोए से , कभी धूप में चटकीले हैं ,...
4 टिप्‍पणियां:
सोमवार, 6 जुलाई 2020

बिन्नी की जीत

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नौ साल की बिन्नी अपने तीन भाई-बहिनों में सबसे बड़ी है . पढ़ने में तो सबसे होशियार है ही पर खेलने में भी उसका कोई मुकाबला नही है .उसे सु...
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मेरे बारे में

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गिरिजा कुलश्रेष्ठ
जीवन के छह दशक पार करने के बाद भी खुद को पहली कक्षा में पाती हूँ ।अनुभूतियों को आज तक सही अभिव्यक्ति न मिल पाने की व्यग्रता है । दिमाग की बजाय दिल से सोचने व करने की आदत के कारण प्रायः हाशिये पर ही रहती आई हूँ ।फिर भी अपनी सार्थकता की तलाश जारी है ।
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