विहान

बाल-कहानियों व कविताओं का पिटारा

सोमवार, 2 अगस्त 2021

सतरंगी और फूल

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एक थी सतरंगी . वह रंग-बिरंगे पंखों वाली एक सुन्दर तितली थी .वह केवल सुन्दर ही नहीं थी , बड़ी चचंल और मनमौजी भी थी .उसने जैसे ही उड़ना सीखा...
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शनिवार, 19 जून 2021

मेरे बाबूजी

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सरल साँवले दुबले-पतले मेरे बाबूजी . भट्टी में तपकर निकले थे मेरे बाबूजी . नियमों के पक्के बाबूजी  बातों के सच्चे थे .  निर्मम था अनुशसन  , प...
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बुधवार, 16 जून 2021

छुटकू की उड़ान

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  बुलबुल हैरान थी . उसके तीन बच्चों में से दो बच्चे बड़े शौक से जल्दी उड़ना सीख गए थे . एक बच्चा तो ,जो तीनों में सबसे ज्यादा तन्दुस्त और चु...
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रविवार, 30 मई 2021

यों लगती है प्यास

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  गर्मी रानी , क्यों लगती है , तुमको इतनी प्यास ? पी जाती हो गटक् गटागट , दिन भर कई गिलास ।   मटके रीते , रीत चले हैं , कूप , न...
8 टिप्‍पणियां:
रविवार, 18 अप्रैल 2021

एक अनौखी माँग

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विहान अपने माता पिता की इकलौती सन्तान है . पिता विनीत बैंगलोर में एक बड़ी कम्पनी में मैनेजर हैं और माँ नीलिमा एक पत्रिका में सम्पादक है .उनक...
13 टिप्‍पणियां:
गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

आया वसन्त

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सर्दी का अन्त हुआ ,आया वसन्त . लम्बे अब दिन हुए .उजले हैं अनछुए . धूप नई निखरी है .पात पात बिखरी है . उत्सव दिगन्त हुआ आया वसन्त.   ...
11 टिप्‍पणियां:
रविवार, 29 नवंबर 2020

सर्दी के दिन

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  दादाजी की पगडी जैसी लम्बी रातें हैं चुन्नू जी के चुनमुन चड्डी ,झबलों जैसे दिन लम्बी और उबाऊ, जटिल सवालों सी रातें उछल-कूद और मौज-मजे की छु...
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मेरे बारे में

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गिरिजा कुलश्रेष्ठ
जीवन के छह दशक पार करने के बाद भी खुद को पहली कक्षा में पाती हूँ ।अनुभूतियों को आज तक सही अभिव्यक्ति न मिल पाने की व्यग्रता है । दिमाग की बजाय दिल से सोचने व करने की आदत के कारण प्रायः हाशिये पर ही रहती आई हूँ ।फिर भी अपनी सार्थकता की तलाश जारी है ।
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