विहान
बाल-कहानियों व कविताओं का पिटारा
मंगलवार, 23 दिसंबर 2014
माँ
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वह बहुत ही सर्द सन्नाटे से भरी रात थी .सर्दी के आतंक से सड़कें ,गलियां सहमी और खामोश थीं. पेड़-पौधे कोहरे की चादर में लिपटे थे फिर भी काँप र...
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गुरुवार, 13 नवंबर 2014
अलविदा -दूधिया दाँत
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14 नवम्बर 2014 -------------------------------------- पूरा पक जाने पर टपके टहनी से ज्यों आम । पूरी खिलकर ,झट से झर जाएं पाँखुरियाँ शाम। ...
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मंगलवार, 16 सितंबर 2014
मेरी बकरी
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मेरी बकरी है चितकबरी पर वह थोडी सी है बहरी। चाहे कुछ भी उसे सिखालो वह तो ,मैं....मैं....पर ही ठहरी । मेरी बकरी चटपट चबरी खाने में प...
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शुक्रवार, 25 जुलाई 2014
कितने रंग तुम्हारे !
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बादल भैया , अजब-गजब के हैं ये ढंग तुम्हारे । कितने रूप बदलते पल में , कितने रंग तुम्हारे । कुल्फी, सॉफ्टी,आइसक्रीम तो कभी केक लगते...
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शनिवार, 28 जून 2014
"मैं तो छुटकी हूँ ।"
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छुटकी गिलहरी वैसे तो हर समय कुछ भी खाने को तैयार रहती है । ब्रेड,बिस्किट,चना मूँगफली से लेकर सूखी रोटी तक बडे चाव से हजम कर जाती है । कुछ ...
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रविवार, 27 अप्रैल 2014
मच्छर जी !
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सुनो-सुनो ओ मच्छर जी ! हो तुम कितने निष्ठुर जी ! बातों-बातों में ही तुमने मारे डंक बहत्तर जी । नन्हे नाजुक लगते हो, पर दिल के पूरे पत...
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शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014
रात-रात में ही !!
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कल तक थीं टहनी पर , कलियाँ जोई-मोई सी । अभी-अभी जन्मे शिशु जैसी सोई--सोई सी । लेकिन देखा सुबह सभी मिल , पलक खोल हँसतीं थीं खिल-...
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