विहान

बाल-कहानियों व कविताओं का पिटारा

गुरुवार, 14 मई 2015

'कामधेनु '

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१९८८ की एक रचना --------------------------- एक तो उम्र का तकाजा और दूसरे खानेपीने में कसर , सो चांदुल सुबह साथी गाय ...
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गुरुवार, 19 मार्च 2015

मुनमुन जी का पेपर

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“ आज सुबह था मुनमुन जी का ; पहला-पहला पेपर पहुँच गई स्कूल हुलस, सबसे पहले बनठन कर . पेपर करके घर आई , दीदी पर रौब जमाया . नखरो...
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शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2015

बुलबुल के बच्चे

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बुलबुल के थे अण्डे तीन उनसे निकले बच्चे तीन माँ समझे नादान अभी तक लेकिन वे हैं बडे ज़हीन । कल तक देख नही पाते थे चीं चीं ची ची...
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मंगलवार, 23 दिसंबर 2014

माँ

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वह बहुत ही सर्द सन्नाटे से भरी रात थी .सर्दी के आतंक से सड़कें ,गलियां सहमी और खामोश थीं. पेड़-पौधे कोहरे की चादर में लिपटे थे फिर भी काँप र...
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गुरुवार, 13 नवंबर 2014

अलविदा -दूधिया दाँत

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14 नवम्बर 2014 -------------------------------------- पूरा पक जाने पर टपके टहनी से ज्यों आम । पूरी खिलकर ,झट से झर जाएं पाँखुरियाँ  शाम। ...
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मंगलवार, 16 सितंबर 2014

मेरी बकरी

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मेरी बकरी है चितकबरी पर वह थोडी सी है बहरी। चाहे कुछ भी उसे सिखालो वह तो ,मैं....मैं....पर ही ठहरी । मेरी बकरी चटपट चबरी खाने में प...
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शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

कितने रंग तुम्हारे !

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बादल भैया , अजब-गजब के हैं ये ढंग तुम्हारे । कितने रूप बदलते पल में , कितने रंग तुम्हारे ।  कुल्फी, सॉफ्टी,आइसक्रीम  तो कभी केक लगते...
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गिरिजा कुलश्रेष्ठ
जीवन के छह दशक पार करने के बाद भी खुद को पहली कक्षा में पाती हूँ ।अनुभूतियों को आज तक सही अभिव्यक्ति न मिल पाने की व्यग्रता है । दिमाग की बजाय दिल से सोचने व करने की आदत के कारण प्रायः हाशिये पर ही रहती आई हूँ ।फिर भी अपनी सार्थकता की तलाश जारी है ।
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