विहान

बाल-कहानियों व कविताओं का पिटारा

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

पापा तुम बस मेरे ही हो ...।

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सहमे से बोले अप्पू जी "पाप जरा बताओ । क्या तुम दादी के बेटे हो ? साफ-साफ समझाओ ।" "हाँ..हाँ वह मेरी माँ हैं-"- कह...
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सोमवार, 30 दिसंबर 2013

नई सुबह

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नीम की सबसे ऊँची टहनी पर किट्टू ने देखा । अभी तो चारों तरफ अँधेरा था ।आसमान में थरथराते हुए से तारे और धुन्ध में डूबे हुए पेड-पौधे अभी रात ...
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गुरुवार, 28 नवंबर 2013

जाडे आए भैया ।

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सहमे -सिकुडे लगते हैं दिन , रातें बडी लडैया ... जाडे आये भैया  । खीच-खीच सूरज की चादर, रजनी पाँव पसारे । काना फूँसी करें उघारे , थर्...
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बुधवार, 16 अक्टूबर 2013

एक रूप रुपहला तारा

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एक रूप रुपहला तारा  जैसे थाली भर पारा या परी भुलक्कड भूली  अपना सिंगार पिटारा  एक झिलमिल सा आईना टीका है जडा नगीना नीले सरुवर में ...
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मंगलवार, 1 अक्टूबर 2013

बापू तुम्हें सलाम ।

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पोरबन्दर  दो अक्टूबर, करमचन्द और पुतली के घर जन्मे थे अभिराम  बापू तुम्हें सलाम । दुबला तन  पर ताकतवर मन , सत्य ,अहिंसामय था जीवन ।...
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मंगलवार, 3 सितंबर 2013

मिट्टी की बात

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एक था नन्हा पौधा गुलू । बहुत ही कोमल ,प्यारा और खूबसूरत । उसके हरे-भरे पत्ते बडे उल्लासमय लगते थे मानो आकाश से जान-पहचान करना चाहते हों । ...
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सोमवार, 19 अगस्त 2013

धरती गमक उठी है ।

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पडी फुहारें वन आँगन में , भीगी धरती गमक उठी है । धूमिल काले कलश उठाये, मेघराज पानी भर लाये । उमड--गरज कर खाली कर गये, बीजुरिया ,लो ...
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मेरे बारे में

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गिरिजा कुलश्रेष्ठ
जीवन के छह दशक पार करने के बाद भी खुद को पहली कक्षा में पाती हूँ ।अनुभूतियों को आज तक सही अभिव्यक्ति न मिल पाने की व्यग्रता है । दिमाग की बजाय दिल से सोचने व करने की आदत के कारण प्रायः हाशिये पर ही रहती आई हूँ ।फिर भी अपनी सार्थकता की तलाश जारी है ।
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