विहान

बाल-कहानियों व कविताओं का पिटारा

मंगलवार, 16 सितंबर 2014

मेरी बकरी

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मेरी बकरी है चितकबरी पर वह थोडी सी है बहरी। चाहे कुछ भी उसे सिखालो वह तो ,मैं....मैं....पर ही ठहरी । मेरी बकरी चटपट चबरी खाने में प...
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शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

कितने रंग तुम्हारे !

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बादल भैया , अजब-गजब के हैं ये ढंग तुम्हारे । कितने रूप बदलते पल में , कितने रंग तुम्हारे ।  कुल्फी, सॉफ्टी,आइसक्रीम  तो कभी केक लगते...
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शनिवार, 28 जून 2014

"मैं तो छुटकी हूँ ।"

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छुटकी गिलहरी वैसे तो हर समय कुछ भी खाने को तैयार रहती है । ब्रेड,बिस्किट,चना मूँगफली से लेकर सूखी रोटी तक बडे चाव से हजम कर जाती है । कुछ ...
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रविवार, 27 अप्रैल 2014

मच्छर जी !

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सुनो-सुनो ओ मच्छर जी ! हो तुम कितने निष्ठुर जी ! बातों-बातों में ही तुमने मारे डंक बहत्तर जी । नन्हे नाजुक लगते हो, पर दिल के पूरे पत...
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शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014

रात-रात में ही !!

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कल तक थीं  टहनी पर , कलियाँ  जोई-मोई सी । अभी-अभी जन्मे शिशु जैसी  सोई--सोई सी । लेकिन देखा सुबह  सभी मिल , पलक खोल हँसतीं थीं  खिल-...
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रविवार, 16 मार्च 2014

होली, होली, होली ।

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सुबह -शाम सिन्दूरी हो  लीं । होली, होली, होली  । आँगन धूप झाँक कर बोली ,  होली, होली, होली ..। खुलीं ,खिलीं कचनारी कलियाँ। चीं चीं......
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गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

पापा तुम बस मेरे ही हो ...।

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सहमे से बोले अप्पू जी "पाप जरा बताओ । क्या तुम दादी के बेटे हो ? साफ-साफ समझाओ ।" "हाँ..हाँ वह मेरी माँ हैं-"- कह...
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मेरे बारे में

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गिरिजा कुलश्रेष्ठ
जीवन के छह दशक पार करने के बाद भी खुद को पहली कक्षा में पाती हूँ ।अनुभूतियों को आज तक सही अभिव्यक्ति न मिल पाने की व्यग्रता है । दिमाग की बजाय दिल से सोचने व करने की आदत के कारण प्रायः हाशिये पर ही रहती आई हूँ ।फिर भी अपनी सार्थकता की तलाश जारी है ।
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