एक संस्मरण
यह अगस्त 1972 की बात है तब
मैंने पहाड़गढ़ के हायरसेकेन्डरी स्कूल में नौवीं कक्षा में प्रवेश लिया था । वह
लड़कों का स्कूल था । उन दिनों लड़कियों के लिये आठवीं के बाद पढ़ने के लिये दूर
दूर तक कोई स्कूल नहीं था । पर काकाजी (पिताजी) को इससे क्या ,उन्हें तो मुझे किसी भी तरह पढ़ाना था । गाँव
से कुछ लड़के भी उसी स्कूल में पढ़ने पैदल जाते थे । मैं भी उनके साथ ही स्कूल
जाती-आती थी । हमारे गाँव से स्कूल तक का पैदल रास्ता लगभग एक डेढ़ घंटे में तय
होता है। हम सुबह साढ़े छह बडे तक निकल जाते और दोपहर दो बजे तक घर आजाते थे ।
एक दिन छुट्टी के बाद चलते समय मैंने खुद को अकेली पाया । पता नहीं क्यों लड़के मुझे छोड़कर घर के लिये निकल आए । मैं कुछ पल सकते में आगई । अभी तक अकेली जाने आने की आदत नहीं थी पर ‘मरती क्या न करती’ ,मैंने हिम्मत की और चल पड़ी । इतने दिनों में रास्ता याद हो ही गया था ।
शायद वह भादों के महीने का कोई दिन था । धूप काफी तेज थी । वर्षाऋतु में धूप ज्यादा तेज और चमकीली तो होती ही है । लेकिन बाड़ों ,कछारों ,खेतों ,मैदानों में चारों तरफ खूब हरियाली थी । जाने कितने जाने अनजाने पौधे खिलकर झूमते प्यारे लग रहे थे । रास्ते में छोटी सी नदी ,जो हमारे लिये तब बहुत बड़ी नदी थी,जिसे सब सोन नदी कहते हैं , को पार करने के बाद कहारपुरा गाँव है । वहाँ से पठार शुरु होजाता है जिसे सब डांड़़ा कहते हैं । यह सामान्य धरातल से लगभग 150 मीटर ऊँचा है जो सुनसान कंकड़ पत्थरों वाली जमीन है जिस पर कोई पेड़ नहीं हैं । लेकिन झरबेरियों के झाड़ खूब फैले हुए हैं । जो बरसात में काँटों से ज्यादा हरे पत्ते और फूलों से भरे होते हैं और दीपावली तक आते आते झाड़ियाँ लाल -पीले खट्टे मीठे बेरों से लद जाते हैं । सर्दियों की गुनगुनी दोपहरें उन खटमिट्ठे बेर तोड़ते खूब सुहानी हुआ करती थीं । लेकिन उस समय तो उस सुनसान डांड़े को पार करने की धुन थी ।
नीचे ढलान पर मनोहरपुरा गाँव बसा हुआ है । उसके बाद चम्बल नहर मिलती है । नहर का पुल पार करते करते मैने देखा ,आसमान में धुँए जैसे बादलों का मेला सा लग गया । धूप बादलों के उस
मेले में कहीं गुम होगई थी । पलक झपकते ही चारों ओर काली घटाएं उमड़ घुमड़कर
आसमान से धरती तक फैल गईँ । दोपहर में ही जैसे शाम उतर आई । मौसम को इस तरह बदलते देख मैं चकित थी और कुछ चिन्त्तित भी । पर मुझे ज्यादा सोचने का मौका नहीं मिला और अगले ही पल तड़तड़ाती हुई मोटी मोटी
बूदें बरसने लगीं । मैं घबरा गई ,क्योंकि चारों ओर सुनसान अँधेरा था
। एक चिड़िया तक नहीं थी कहीं । मेरे पास बारिश की बौछारों से बचने लिये कुछ नहीं था । किताबों को भीगने से बचाने में कपड़े का थैला बेवश था । और मेरे पास न छतरी थी न ही मोमजामा की खोली । अभी घर लगभग दो किमी दूर था । तेज वर्षा जिसे मूसलाधार कहते हैं ,में घर जाने की बात सोची भी नहीं जा सकती थी । मैंने
तेजी से दौड़कर उस जगह पहुँची जो चारों तरफ बाजरे के खेतों से घिरी थी । वहाँ एक कुआं और तीन-चार आम के बड़े पेड़ थे । बाजरे की फसल एक लम्बे आदमी से भी ऊँची होगई थीं । पौधों में बालियाँ निकल आईँ थीं हालाँकि दूधिया दाने पूरी तरह भरे नहीं थे । अगर कोई दूसरा समय होता तो मैं बाजरे की बालियों को देखकर ज़रूर बहुत खुश होती पर उस समय वह जगह बन्द घर जैसी सुनसान और डरावनी सी लग रही थी । कहीं कुछ और दिखाई नहीं देता था । लेकिन कहीं खुले में जाकर बड़ी बड़ी बूँदों की मार सहने से अच्छा था कि वहीं रहती । मैं आम के पेड़ के तने से चिपककर खड़ी होगई । हालाँकि पेड़ खुद भीग रहा था तो मुझे क्या बचाता ।
। मैं और मेरी किताबें पूरी
तरह भीग गईँ । मैं काँप रही थी । मेरे दाँत बज रहे थे । उस पर गजब या कि बिजली गुच्कीचे में बार बार अपने दाँत दिखाती लाल पीली होरही थी और फिर बादलों की भयंकर गडगड़ाहट जैसे कोई बड़ी इमारत भरभराकर गिरपड़ी हो । मात्र बारह साल सात महीने बड़ी लड़की मैं , तब सचमुच बहुत डर
गई थी । जिया (माँ) को याद करते हुए मुझे रोना आ रहा था । तभी अचानक मुझे आम की टहनियों
में भीगती ठिठुरती दो तीन चिड़ियाँ दिखीं ।
"ओहो ,मैं अकेली नहीं
हूँ .। यह कितना अच्छा है कि ऐसे में प्यारी सी चिड़ियाँ भी यहाँ है । "—मुझे चिड़ियों के देख बड़ी राहत मिली कि मेरे साथ कोई है , चिड़ियाँ ,मेरी साथी ,मेरी दोस्त जिनका होना मेरे लिये एक नियामत
जैसा था । मेरा डर जाने कहाँ चला गया । मैं भीगती किताबों , कपड़ों और ठंड से कँपकँपाती अपनी हालत को भूल गई । मेरा ध्यान सिर्फ
चिड़ियों पर था । आह , ये
भी तो कितनी परेशान हैं । मेरा तो घर है पर
इनके पास तो घर भी नहीं ।
धीरे धीरे बारिश का जोर भी कम होगया । जब बारिश काफी कम होगई तो मैं चल पड़ी । चिड़ियों ने पानी झटककर पंख फड़फड़ाए ,मानो मुझे विदा कह रही हों । अगला पल मेरे लिये और भी तसल्लीभरा था । दूर छाता लिये मेरा माँ मुझे लेने आ रही थी ।




