शनिवार, 19 जून 2021

मेरे बाबूजी

सरल साँवले दुबले-पतले मेरे बाबूजी .

भट्टी में तपकर निकले थे मेरे बाबूजी .


नियमों के पक्के बाबूजी 

बातों के सच्चे थे . 

निर्मम था अनुशसन  ,

पर दिल से पूरे बच्चे थे .

बड़े कठोर ,बड़े कोमल थे मेरे बाबूजी .


लेखन गायन और चिकित्सा में

पूरे निष्णात .

कभी नहीं आए जीवन में ,

द्वेष, बैर , छल ,घात .

झूठ ,कपट से अनजाने थे मेरे बाबूजी .


सादा जीवन ,ऊँचा चिन्तन ,

ध्येय रहा जीवन में .

जाति धर्म का भेद न माना

थी समरसता मन में .

सबके प्यारे मास्टरजी थे मेरे बाबूजी .


“या हंसा मोती चुगै 

या लंघन मर जाय .

जितनी लम्बी चादर हो ,

उतने ही पाँव बढ़ाय .”

यही सीखकर पले बढ़े थे मेरे बाबूजी .


नंगे पाँव चले काँटों पर  ,

थककर कभी न हारे  .

धूप छाँव में रहे एकरस ,

खोजे नहीं सहारे .

यही सिखाते रहे सभी को मेरे बाबूजी .

मरु में लाते रहे नमी को मेरे बाबूजी .

बुधवार, 16 जून 2021

पहली उड़ान

 बुलबुल हैरान थी . उसके तीन बच्चों में से दो बच्चे बड़े शौक से जल्दी उड़ना सीख गए थे . एक बच्चा तो ,जो तीनों में सबसे ज्यादा तन्दुस्त और चुलबुला था वह इस टहनी से उस टहनी तक उड़ानें भरकर माँ को अपना कौशल-करतब दिखा रहा था . दूसरा बच्चा भी माँ का अनुकरण करते आँगन की मुँडेर तक और फिर मुँडेर से अमरूद की टहनी तक उड़ने में कामयाब हो चुका था .अब वह नीम की शाखा तक पहुँचने की कोशिश कर रहा था . बुलबुल बराबर उसका हौसला बढ़ा रही थी . लेकिन तीसरे  बच्चे में, जिसे सुविधा के लिये छुटकू कह सकते हैं, उड़ने की ललक जरा भी दिखाई नहीं देती थी . इसलिये उसे उड़ना सिखाना कठिन हो रहा था .

छुटकू बाकी दो बच्चों की तुलना में शुरु से ही कुछ मनमौजी और लापरवाह था . दोनों की तुलना में कुछ छोटा और कमजोर भी . जब बुलबुल सुबह सुबह उनके नाश्ते के लिये इल्ली ,टिड्डा या कोई दूसरा कीड़ा पकड़ लाती तब दो बच्चे किलक कर चोंच खोल देते थे लेकिन छुटकू आँखें बन्द किये आराम से बैठा रहता

ओ आलसीराम ! जागो और अपने हिस्से का नाश्ता लो .” –-एक बच्चा छुटकू को हल्का सा धकेलकर कहता .तब कहीं छुटकू महाशय चोंच खोलते .

 अब मैं कुछ दिन ही तुम्हारे लिये खाना लाऊँगी ..फिर अपने लिये नाश्ता तुम्हें खुद लाना होगा ..—बुलबुल ने बच्चों को समझाया ..

और अब हमें यह घोंसला भी छोड़ना होगा . इसलिये उड़ने के लिये तैयार हो जाओ  . आज से ही अभ्यास करना है .

हाँ माँ हम तैयार हैं .”.—दो बच्चों ने माँ की बात  एक साथ चहके .

छुटकू तुम भी .”–बुलबुल ने छुटकू को चुप देखकर कहा .

हाँ माँ मैं भी ..लेकिन मैं कुछ सोच रहा था .– छुटकू ने कहा .

क्या ?”

 यही कि अभी कुछ दिन और रहते हैं ना इस घर में . -- छुटकू ने अपने नन्हे कोमल पंखों को सिकोड़ते हुए कहा .

घोंसले में रहने के दिन बीत चुके हैं मेरे लाल .  घर में ही रहोगे तो आसमान कैसे देख सकोगे ? . –बुलबुल ने चोंच से उसके नन्हे पंख सहलाकर कहा .ऐसा कहते हुए उसकी आवाज और मीठी होगई थी .

 तभी दूसरा बच्चा बोल पड़ा--

 ओ भाई ! माँ ने कहा है न कि अब हमें घर की जरूरत नहीं हैं . हम बड़े होगए हैं .अब उड़ भी सकते हैं और अपना भोजन भी खुद ही ढूँढ़ सकते हैं .

छुटकू ने कोई जबाब नहीं दिया .

क्या तुम डर रहे हो ? मैं तो जरा भी नहीं डरा ..देखो ऐसे पंख हिलाते रहना .पहले वाले बच्चे ने छुटकू को पंख फड़फड़ाकर दिखाए और उड़कर छत की रेलिंग पर जा बैठा .

 तुम जाओ मैं यहाँ कुछ दिन और रहना चाहता हूँ . छुटकू ने सीना फुलाने की कोशिश करते हुए कहा .

शायद यह उसका डर ही है –बुलबुल ने सोचा और अचरज भी हुआ आज तक वह कितने बच्चों को पाल पोस कर उड़ना सिखा चुकी है  किसी ने ऐसा नहीं कहा . पंख होजाने पर भला घोंसलों में कौन रहना चाहता है .

फिर उसने छुटकू से कहा –-तुम अकेले ही यहाँ कैसे रह सकोगे जबकि हम सब एक नई और सुन्दर दुनिया का हिस्सा बनने जा रहे हैं ? वहाँ तुम देखोगे कि फूलों के आसपास कितनी सुन्दर तितलियाँ उड़ रही हैं ..आसमान कितना साफ है , कितनी चिड़ियाँ उड़ रही हैं ..एक उड़ना ही तो चिड़ियों को चिड़िया बनाता है .

इसलिये पहले उड़ना तो सीखलो .फिर जहाँ चाहो रहना ..—बुलबुल ने समझाया .

तुम्हें यह भी जानना जरूरी है कि पत्तों के साथ रह रहे कीड़े धोखा देने के लिये एकदम पत्तों जैसे ही दिखते हैं . ऐसा न हो  कि नाश्ते में इल्ली या टिड्डे की बजाय पत्ता चबाते रहो ---बुलबुल की इस बात पर सब चहक उठे .

आओ छुटकू मेरे साथ . बहुत बढ़िया नाश्ता तुम्हारा इन्तज़ार कर रहा है .” --–यह कहकर बुलबुल उड़कर नीचे एक पौधे की टहनी पर बैठ गई . पर छुटकू घोंसले के किनारे पर बैठा माँ को देखता रहा . वह यहाँ वहाँ ऊपर नीचे उड़ उड़कर छुटकू को उड़ने के गुर सिखा रही थी . पर छुटकू टस से मस न हुआ .

आ जा मेरे बच्चे ! डरो नहीं मैं हूँ ना यहाँ ..आ जा ..आजा . नीचे जमीन पर बैठी बुलबुल ने पुकारा .

इतने ऊँचे से !”- घोंसले के किनारे बैठा छुटकू नीचे देखते हुए घबराया .

जरा सा ही अन्तर तो है तुम्हारे मेरे बीच ..तुम बहुत आराम से आ सकते हो क्योंकि तुम एक बहादुर बच्चे हो ! वैसे भी जैसे ही नीचे आओगे तुम्हारे पंख ,जो अब उड़ने के लिये तैयार हो चुके हैं ,अपने आप खुल जाएंगे ..

हाँ मैंने कुछ देर पहले एक आदमी को एक बड़ी सी चिड़िया को पेट से गिरते देखा था ..थोड़ी ही देर में उसका बड़ा गोल पंख खुलकर ऊपर तन गया था और वह आदमी मजे से उड़ता हुआ उतरा था .

हाँ , पर वह चिड़िया नहीं हवाईजहाज होता है .उसके पंख को आदमी लोग पैराशूट कह रहे थे –बुलबुल ने बच्चों को बताया .तब छुटकू ने खुद को नीचे छोड़ तो दिया पर उसने महसूस किया कि उसके पंख खुल ही नही रहे , वह घबराकर नीचे फर्श की ओर आया लेकिन अच्छा ही हुआ कि फर्श से टकराने से पहले उसके पंख खुल गए और उसका नन्हा नाज़ुक बदन पंखों ने सम्हाल लिया . इसलिये उसे चोट तो नहीं आई पर वह घबरा गया . जब माँ उसके पास आई वह काँप रहा था .

तुमने कितनी बढ़िया उड़ान भरी छुटकू !”

मुझे पता है वह उड़ान नहीं थी माँ , मैं गिर रहा था ...वह ,बहुत डरावना अनुभव था .

कोई बात नहीं ..सीखने की शुरुआत अक्सर इसी तरह होती है मेरे लाल .  

मुझे ऐसी शुरुआत करनी ही नहीं है .” --कहता हुआ वह एक कोने में पड़े सामान के पीछे जाकर छुप गया .

बुलबुल सचमुच हैरान थी ..कोने में पड़े कबाड़ के पीछे से उसे निकालना बहुत मुश्किल था . मीठी आवाज में अपनी बात कहे जा रही थी – मेरे बच्चे यहाँ छुपाछुपाई खेलना खतरनाक है .तुम मेरे साथ उड़कर चलो  हम दोनों शाखों और टहनियों में खेलेंगे ...

छुटकू ...मेरे लाल ..बाहर आओ .मेरे साथ ..कोशिश तो करो . बुलबुल पुकारे जा रही थी . पर छुटकू को माँ के साथ चुहल करने में आनन्द भी आ रहा था .माँ जैसे ही पुकारती वह और अन्दर घुस जाता . इसी कोशिश में उसने खुद को एक ऐसी जगह पाया जहाँ लगभग अँधेरा था . उजाला एकदम धुँधला था ..कुछ ही देर में छुटकू को लगने लगा कि यह जगह उसके लिये नहीं हैं वह शायद खो गया है .

अरे कोई मुझे पुकारो– -- उसकी नन्ही पतली सी आवाज थोड़ी दूर जाकर खत्म होगई .

कौन हो तुम ? क्या नाम है ? अरे पंखों वाले होकर काकरोच की तरह क्यों रेंग रहे हो ?” छुटकू ने दीवार पर चिपकी एक एक मटमैली सी छिपकली को देखा . सोचा इसे क्यों बताऊँ असली बात .बोला--

मैं ज़रा सैर के लिये निकला हूँ .देख रहा हूँ कि जमीन पर चलना कितना अच्छा लगता है

पर तुम्हारी सूरत बता रही है कि छुपकर भाग आए हो ...तुम अपनी माँ की आवाज को नहीं सुन रहे ,जबकि हम साफ सुन रहे हैं !”-- छिपकली दीवार से नीचे उतरी और कहती हुई सर्र से ऊपर चढ़ गई .

खुद ही तो डर रही है –छुटकू ने सोचा तभी एक छोटी चुहिया भी फुदकती हुई आई .

मैंने री ममा की बातें सुन ली है ..तुम उड़ना नहीं सीखोगे तो सब तुम्हें चिड़िया नहीं ,चूहा कहेंगे .जैसे मुझे कहते हैं .

.अरे चूहा नहीं काक्रोच कहेंगे . बड़ी बड़ी मूँछों वाला काक्रोच ...फिर एक दिन तुम सचमुच काक्रोच बन जाओगे . फिर ममा तुम्हें पहचान भी नहीं पाएगी . –छिपकली फिर आगई वह छुटकू की खीज का आनन्द लेना चाहती थी .

नहीं नहीं मुझे चूहा या काक्रोच हरगिज नहीं बनना . –छुटकू घबरा गया . छिपकली की बातों से ऊब भी रहा था उसने पुकारा----माँ ..माँ मुझे उड़ना है ...

कहाँ हो मेरे बच्चे ? बाहर आओ मैं तुम्हारा इन्तज़ार कर रही हूँ . छुटकू माँ की आवाज का पीछा करता बाहर आगया . बुलबुल ने उसे चौंच में दबा टिड्डा दिखाते हुए कहा .

 देखो मै तुम्हारे लिये बहुत बढ़िया नाश्ता लेकर आई हूँ .

मुझे यह चाहिये माँ ..मैंने कब से कुछ नहीं खाया—.” छुटकू की आँतें कुलबुला उठीं .

पर इसके लिये तुम्हें यहाँ इस टहनी तक उड़कर आना पड़ेगा और तुम जरूर आ सकोगे . बस ज़रूरत है मन को पक्का करने की .

कहते हुए बुलबुल बच्चे के पास आई और ,अब तुम मेरा पीछा करना .,कहते हुए उड़ गई . छुटकू देख रहा था कि माँ कितनी आसानी से उड़ रही है . मुँडेर , फिर मुँडेर से नीम की शाखा तक उड़ उड़कर उसे दिखा रही है .फिर बार बार नीचे उसके पास आकर फिर उड़ान भरकर छत की मुँडेर पर जा बैठती है .

जल्दी करो छुटकू . ऐसा न हो कि पूरा नाश्ता खत्म होजाए .

यह देख उसके पंखों में जबरदस्त हलचल होने लगी ..और उड़कर मुँड़ेर पर जा बैठा .

शाब्बास!” –बुलबुल चहकती हुई उसके पास आई और उसकी पीठ पर चोंच फिरा कर प्यार किया .

अब हमें उस टहनी तक जाना है . कहती हुई बुलबुल उड़ी . उसे देखते हुए छुटकू भी उड़ा .पहली बार टहनी तक तो न पहुँच पाया . नीम के तने में छोटी सी शाख निकली थी उसी पर बैठ गया पर अगली बार उड़कर वह सीधा माँ के पास पहुँच गया जहाँ मोटी शाख पर माँ के साथ उसके भाई-बहिन भी उसका स्वागत करने खड़े खूब चहक रहे थे .

आखिर तुमने सीख ही लिया ना उड़ना ! जियो छुटकू !” –एक बच्चे ने चहक कर शाखा पर फुदकते हुए खुशी जाहिर की .

हाँ अब मुझे कोई काक्रोच तो नहीं न बुला सकेगा .” –छुटकू ने बड़े मासूम अन्दाज में अपने मन की बात कहीं . सुनकर कुछ देर सब एक दूसरे को देखते रहे फिर एक साथ चहक उठे . चहकने में सबसे मीठी और तेज आवाज छुटकू की थी .

रविवार, 30 मई 2021

यों लगती है प्यास

 

गर्मी रानी ,क्यों लगती है ,

तुमको इतनी प्यास ?

पी जाती हो गटक् गटागट,

दिन भर कई गिलास ।

 

मटके रीते ,रीत चले हैं ,

कूप ,नदी और ताल ।

इन्हें रोज भरते--भरते ,

धरती नानी बेहाल ।

 

कभी चाहिये शरबत तुमको ,

कभी शकंजी ,लस्सी ।

आइसक्रीम तो , अरे बाप रे...,

पूरी..... सत्तर...अस्सी ।

एक न छोड़ी बोतल फ्रिज में,

कोल्ड-ड्रिन्क खल्लास ....

गर्मी रानी क्यों लगती है ,

तुमको इतनी प्यास ।

 

"क्यों लगती है प्यास ?

न पूछो मुझसे छुटकूलाल ।"

कहते--कहते गर्मी जी का ,

चेहरा होगया लाल ।

"सर्दी ने गुड ,गजक ,बाजरा ,

 उड़द मखानी दाल ,

 तिल की टिक्की गरम मँगौड़े,

 परसे भर-भर थाल ।

मैथी के चटपटे पराँठे ,

और कचौरी खस्ता ।

भजिये ,आलू-बड़े ,समोसे,

सब कुछ कितना सस्ता ।

इतना खाया.... ,इतना खाया

पिया गया ना पानी

अब लगती है प्यास ,तभी तो ,...

पानी ,..पानी...,पानी....

और ..और ..बस पानी

रविवार, 18 अप्रैल 2021

एक अनौखी माँग

विहान अपने माता पिता की इकलौती सन्तान है . पिता विनीत बैंगलोर में एक बड़ी कम्पनी में मैनेजर हैं और माँ नीलिमा एक पत्रिका में सम्पादक है .उनका छोटा सा सुखी व सम्पन्न परिवार है .अपने पांच साल के इकलौटे बेटे के लिये उन्हों ने हर तरह की सुविधा जुटाई है . ढेर सारे नए नए किलौने , शानदार कपड़े , मनपसन्द खाना पीना , अलग कमरा तमाम किताबें , गेम्स .यानी कोई कमी नहीं . वह जो भी माँगता पापा या मम्मी ऑनलाइन मँगाकर या शनिवार रविवार को खुद बाजार जाकर तुरन्त हाजिर कर देते . विहान के लिये किसी सामान या सुविधा की कमी न थी .

एक दिन कोलकाता से विहान के मामा-मामी आए . दो-तीन दिन बैंगलोर में नीलिमा के पास रुककर उन्हें कन्याकुमारी जाना था . उनके साथ एक उनकी दो साल की प्यारी सी बेटी भी थी लिली . दो-तीन दिन घर में खूब चहल पहल रही . मामा ने विहान को कई कहानियां व चुटकुले सुनाए . मामी ने सबको रसगुल्ले बनाकर खिलाए . एक दिन लाल बाग घूमने गए और एक दिन बाजार भी गए . वे दो तीन दिन बहुत ही आनन्दमय रहे . पर विहान को सबसे ज्यादा आनन्द लिली के साथ आया . लिली भैया भैया कहती उसके आगे पीछे घूमती रहती और वह उसे कभी अपने घोड़े पर बिठाता तो कभी रिमोट वाली कार चलाकर दिखाता . लिली भी विहान के साथ खूब हिल मिल गई थी . तीन दिन बाद विहान के मामा मामी चले गए .

आज घर कितना खाली खाली सा लग रहा है .”—विनीत ने कहा .

आप कमली दीदी को बुला लें न. विहान को बुआ के साथ अच्छा लगेगा और.......”    

नीलिमा अपनी बात पूरी करती उससे पहले ही पास ही अपने चित्रों में रंग भरने बैठा विहान अचानक बोला –“मुझे एक बहन चाहिये .”

हें !! हें !!...----नीलिमा और विनीत एक साथ चौंके .

यह कौनसी नई धुन सवार होगई विहान बाबू .?”

मुझे बहन चाहिये .आपने सुना नहीं .? ” —इस बार विहान जोर से बोला यह देख विनीत और नीलिमा दोनों ही हक्के बक्के रह गए . यह तो ऐसी माँग थी जिसे न ऑनलाइन मँगाया जा सकता था न ही बाजार से खरीदा जा सकता था . पहले तो विहान ने कभी ऐसी बात नहीं कही थी . जरूर लिली के कारण उसके दिमाग में यह बात आई है .

तुम्हें बहन क्यों चाहिये विहान .

क्योंकि मुझे बहन बहुत अच्छी लगती है . मैं उसके साथ खेलूँगा ..उसे पार्क में झूला झुलाऊँगा ...बीनू , गोलू , पवन सबकी बहनें हैं . वे उनको राखी बाँधती है . टीका लगातीं हैं .मुझे भी राखी बँधवानी है .

तुम्हें बुआ वाली रौनक दीदी रखी भेजती तो है .

पर बाँधती तो नहीं ना ?”

मैं बाँध तो देती हूँ . टीका भी करती हूँ ..

तुम कोई मेरी बहन हो ..इतनी बड़ी .?

विहान थोड़ा मुस्कराया पर अगले ही पल चिल्लाकर बोला . 

मुझे बहन चाहिये अभी ..."

उसके गले की नसें फूल गईँ .आवाज भर्रा गई और आँखें भी कुछ गीली सी लगने लगीं .

विनीत और नीलिमा अब सचमुच विहान की माँग को लेकर गंभीर होगए . अचानक विनीत को अपनी ऑफिस के माली का ध्यान आया जिसकी पत्नी चार माह पहले दो साल की बच्ची को छोड़ चल बसी थी . माली खुद काफी बीमार रहता था और बच्ची को पालने में खुद को बहुत असहाय अनुभव कर रहा था .

इस तरह हुआ यह कि कुछ दिन ही बाद वे उस बच्ची को अपने साथ घर ले आए .

लो विहान बाबू आपकी बहन आ गई .

आहा , यह तो बहुत प्यारी है पापा ! क्या सच्ची में यह मेरी बहन है ?

हाँ बेटा , यह आपकी ही बहन हैं  .”

 “क्या हमारे साथ ही रहेगी हमेशा ?

और नहीं तो क्या ! यह तुम्हारी बहन है और बेशक तुम्हारे साथ ही रहेगी  ,

ओहो !...तब तो मैं इसका नाम लिली रख दूँ मम्मी ?” –विहान खुश होकर बोला .

जरूर रखो बेटा .”--- विनीत और नीलिमा ने एक साथ कहा और हँस पड़े  .

  

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

आया वसन्त

सर्दी का अन्त हुआ ,आया वसन्त .

लम्बे अब दिन हुए .उजले हैं अनछुए .

धूप नई निखरी है .पात पात बिखरी है .

उत्सव दिगन्त हुआ आया वसन्त.

 

भोर ने उतारी कुहासे की शाल अब

गुलमोहर मुट्ठी भर लाया गुलाल अब.

वैभव अनन्त हुआ ,आया वसन्त .

 

पात पात सिन्दूरी वन वन पलाश हुआ

फूली है कचनार जैसे कोई दुआ .

कविता लिखी पन्त , आया वसन्त.

 

झौर झौर बौर खिला ,पोर पोर रूप मिला

सरसों को वासन्ती , बहुरंगी सेवन्ती .

रूप आभ बेअन्त ,आया वसन्त .

 

भोर गुनगुनाती सी ,साँझ कुनमुनाती सी ,

कोयलिया तान छेड़ , हवा झनझनाती सी .

अनबन का हुआ अन्त ,आया वसन्त .

 

रूप का ही राज है , राग रंग साज है

तितली हैं फूल हैं ,फूल के दुकूल हैं .

ऋतुओं का कन्त हुआ आया वसन्त .

 

 

 

रविवार, 29 नवंबर 2020

सर्दी के दिन

 दादाजी की पगडी जैसी लम्बी रातें हैं

चुन्नू जी के चुनमुन चड्डी ,झबलों जैसे दिन

लम्बी और उबाऊ,
जटिल सवालों सी रातें
उछल-कूद और मौज-मजे की
छुट्टी जैसे दिन

जाने कब अखबार धूप का
सरकाते आँगन
जाने कब ओझल होजाते
हॅाकर जैसे दिन

जल्दी-जल्दी आउट होती
सुस्त टीम जैसे
या मुँह में रखते ही घुलती
आइसक्रीम से दिन

ढालानों से नीचे पाँव उतरते हैं जैसे
छोटे स्टेशन पर ट्रेन गुजरते जैसे दिन।

कहीं ठहर कर रहना
इनको रास नहीं आता
हाथ न आयें उड-उड जायें
तितली जैसे दिन ।

पूरब की डाली से
जैसे-तैसे उतरें भी
सन्ध्या की आहट से उडते
चिडिया जैसे दिन ।

सोमवार, 14 सितंबर 2020

अपनी खड़ी बोली

 

मिसरी की गोली

अपनी  खडी बोली ।

माँ ने दूध में है घोली

अपनी खडी बोली ।

 

सरस है ,सक्षम है

सरल और शुद्ध है

अनुभूतियों का सागर

अभिव्यक्ति में प्रबुद्ध है

संस्कृति के द्वार पर

जैसे रंगोली .

मिसरी की गोली

अपनी खडी बोली ।

 

झरना ज्यों झरता है

पवन जैसे बहता है

धरती में नमी पाकर

बीज जैसे उगता है

आता वसन्त भरे

फूलों की झोली .

मिसरी की गोली

अपनी खडी बोली ।

 

शिशु की है किलकारी .

अलकें ज्यों गभुआरी .

अन्तर की बातों सी

हिन्दी मनोहारी .

इससे ही सजती है

सपनों की डोली .

मिसरी की गोली

अपनी खड़ी बोली .