सोमवार, 22 अगस्त 2022

बताओ वह कौन

(1990 में लिखी गई एक बाल कविता) 


दे दी सूरज को छुट्टी .

तो धूप ने करली कुट्टी .

पीला सा हुआ उजाला ,

गुम उसकी सिट्टी-पिट्टी .


हुई पश्चिम दिशा सलौनी ,

अब खेले आँख मिचौनी .

पर्वत ,मैदान ,किनारे ,

छुप गये पक्षी भी सारे .

 

था अम्बर नीला निर्मल   

ओढे अब काला कम्बल ।

छाया है धुँधली काली

छुप गई वहीं हरियाली .

 

वे इमली , बरगद ,पीपल  ,

पलभर में होगये ओझल .

रख पलक नीद की पट्टी  ,

आँखों को दे दी छुट्टी ।

 

फिर और विहँस कर बोली ,

, बबलू ,मोलू, भोली ।

होगये कहाँ ये ओझल,

इमली बरगद और पीपल ।

पंछी पर्वत और नदिया,

नीला-नीला नभ निर्मल।


इन सबको ढूँढो आओ,

या हार मान सोजाओ ।

 

सब खोज -खोज कर हारे ,

नभ में झाँके कुछ तारे ।

निंदिया का लगा बिछौना

फिर सबने पाँव पसारे ।

 

पलकों पर काली-काली,

चुपके चादर डालेगी ।

नयनों में रंग छुपाकर,

सपनों में ले जाएगी



बुधवार, 3 अगस्त 2022

आती रोज गिलहरी


 

आती जैसे धूप सुनहरी ,

आती रोज गिलहरी ।

करने शैतानी, मनमानी ,

बिल्कुल जानी मानी ।

आँखें चंचल कोमल

ऊपर खिंची लकीरें गहरी,

आती रोज गिलहरी .

 

उतर नीम की डाली से ,

चढकर खिडकी की जाली से ,

सीधी कमरे में आती .

और रसोईघर से ,

रोटी चुनचुन कर ले जाती .

कुछ खाती कुछ बिखराती .

पकडूँ तो हाथ न आती

बस बैठी दूर रिझाती .

लगती है बड़ी गुनहरी

आती है रोज गिलहरी .

 

कपडे चादर पडे सुखाने ,

नटखट कुतरे बिना न माने.

धूप दिखाने जो भी रक्खूँ,

आजाती है खाने .

कुतरा अनार वो टपका,

अमरूद खोखला लटका .

जब भी कुछ खाने आयें,

मिट्ठू जी खायें झटका .

वे अपना मन बहलायें,

केवल खाकर मिर्च हरी .

आती है रोज गिलहरी ..

 

अगर न वह आये तो क्या हो !

अदा न दिखलाये तो क्या हो !

सूनी होगी डाली-डाली ,

जाली खाली खाली .

आँगन होगा सूना सूना .

समय लगेगा दूना-दूना.

ज्यों गुब्बारे वाले की फेरी

आती रोज गिलहरी ।

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सोमवार, 11 अप्रैल 2022

करूँ मैं क्या ?

 पूसी पहुँची पटना जबसे ,

अपने पूरे घर में तबसे ,

है चुहियों का राज,

करूँ अब क्या ?

 

पहले-पहल एक ही आई .

एक और फिर पडी दिखाई .

अब पूरा का पूरा कुनबा ,

दिन भर खेले छुआ-छुलाई .

और कबड्डी रात ,

करूँ अब क्या ?

 

ऊपर -नीचे सरपट दौडें ,

जैसे किसी रेस के घोडे ।

आलू-प्याज पुलाव पकौडे ,

फल भी नहीं अछूते छोडे ।

चिन्दी, कागज, डिब्बी-डिब्बे.

सभी कुतर कर थोडे-थोडे ,

कर डाले बेकार ,

करूँ अब क्या ?

 

पिंजरे को पहचान गई है .

टिकियों को ये जान गईं हैं .

देख सूँघ हिल-मिल जाती हैं

बच कर निकल-निकल जाती हैं .

कितनी खटपट करो डरालो ,

नाली बिल सब बन्द करालो .

कितना छका-थका लेती हैं .

कैसे राह बना लेती हैं .

करती हैं बेहाल ,

करूँ मैं क्या ...

 

करती रहती किट्..किट्..कुट्..कुट् ...

चुभती रहती चीं..चीं..चुक्..चुक्..

मचे रात-दिन धमा-चौकडी

अपनी सारी गई हेकडी

जमीं ठाठ से घर में ऐसे ,

घर इनके पुरखों का जैसे

सोपाते हैं जैसे-तैसे ..,

कैसे-कैसे हाल ...

करूँ अब क्या ?

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रविवार, 6 मार्च 2022

सबसे प्यारा घर

 

एक था गौरा और एक थी गौरैया । खूब आसमान की सैर करते और साथ साथ दाना-दुनका चुगते । कुछ समय बाद पहली बार गौरैया के अण्डे देने का अवसर आया .गौरा ने फुदकते हुए कहा कि अब हमें अपना घर बना लेना चाहिये ।

"हाँ ,एक खूबसूरत और प्यारा घर ।"---गौरैया भी चहककर बोली--- "हमारा घर दुनिया का सबसे निराला और प्यारा होगा .

इसके लिये क्यों न हम कुछ मित्रों से सलाह ले लें इससे हम घर बनाने के नए तरीके जान सकेंगे ।"

"अरे वाह यह तो बहुत अच्छा और नया विचार है ."--गौरैया ने कहा .वह इस विचार से इतनी उत्साहित हुई कि अकेली ही कबूतर से मिलने जा पहुँची .उस समय कबूतर एक छज्जे पर बैठा अपने पंख साफ कर रहा था । "गुटकू दादा नमस्ते-"--गौरैया ने बड़े अदब से कहा---"मुझे अपने होने वाले बच्चों के लिये एक बढ़िया घोंसला बनाना है इसके लिये मुझे आपकी सलाह चाहिये ।"

"खुशी की बात है लेकिन मेरे विचार से घोंसला बनाने की मेहनत करना बेकार है ।" --कबूतर अपनी घंघुची जैसी आँखें घुमाते हुए कुछ देर रुका फिर बोला---"क्या है कि घोंसला की जरूरत अधिक से अधिक महीना भर के लिये ही होती है जब तक कि बच्चे उडने लायक नही होजाते । इसलिये मेरी मानो तो मेरी तरह ही कहीं भी चार तिनके जमाओ और काम चलाओ ."

"यह क्या बात हुई !—कबूतर की इस बात पर गौरैया हैरान हुई .

ये गुटकू जी तो पक्के आलसी मालूम पड़ते हैं . इससे तो अच्छा था कि हम मिट्ठू मामा से पूछ लेते ..सुना है कि उनके घर में बिल्ली तक का खतरा नहीं है."

जब गौरा-गौरैया मिलने पहुँचे , मिट्ठू जी अपने कोटर में आराम कर रहे थे । गौरैया की आहट पाकर लेटे लेटे ही बोले –आ जाओ वैसे यह मेरे आराम का समय है .

"मिट्ठू मामा आप और दिन में आराम ?मैंने तो ऐसा कभी नहीं सुना .

क्या है कि दिन में तो माली किसी टहनी पर बैठने तक नहीं देता पर रात में आम-अमरूद खूब खाने मिल जाते हैं इसलिये जागना पड़ता है ..खैर वह सब जाने दो ..तुम लोग कैसे आए बताओ .

हमें जल्दी ही एक घर बनाना है . मजबूत और शानदार घर . इस बारे में आप कुछ बताएं ."

घर की योजना के लिये मुझसे राय माँगना तो बेकार है भई .”---गौरैया की बात सुन कर मिट्ठू जी ने कोटर से गर्दन बाहर निकाली और अपनी लाल नुकीली चोंच को पंखों से साफ करते हुए बोले---

"शायद तुम्हें नहीं मालूम कि मैं घर बनाने में भरोसा नहीं करता . क्यों नहीं तुम भी मेरी तरह पेड के कोटर को ही अपना घर बनालेते ! न कोई मेहनत न झंझट..जरूरत न रहने पर छोड़दो और जब चाहो फिर से इस्तेमाल करलो ।"

कोटर !!”..गौरैया ने मिट्ठू की ओर हैरानी से देखा .

कोटर का नाम सुनकर मुँह न बनाओ गौरैया जी . अन्दर बहुत आरामदायक होता है .

"हो सकता है ." गौरैया ने सोचा और कोटर में झाँक कर देखा ---"...अरे...बाप रे !यह घर है या अँधेरा कुँआ ! इसमें तो मेरे नन्हे-मुन्नों का दम घुट जाएगा ."

क्या मेरा घर पसन्द नहीं आया .?”

न न..ही घर तो अच्छा है पर ..

" नापसन्द हो तब भी कोई बात नहीं .—मिट्ठू ने गौरैया का संकोच दूर किया .

मैं इसमें कुछ भी बुरा नहीं समझता . मेरे विचार से तुम कालू के पास चले जाओ . उसका घोंसला काफी खुला होता है और बड़ा भी ." तब वे दोनों कालू के पास पहुँचे ।

एक नन्ही सी चिड़िया माँ बनने जा रही है और घर के बारे में उससे सलाह लेने आई है यह जान कर कालू कौवा बहुत खुश हुआ । बडे उल्लास के साथ उसने अपना घर दिखाया और गर्व से बताया--

मेरे घोंसले तक बाज भी झपट्टा नहीं मार पाता . मजबूत इतना है कि तोड़ने वालों को नानी याद आजाए ..

"ऐसा कठोर-कंटीला घोंसला बनाते हैं कालू जी -–गौरा ने मन ही मन कहा –ऐसा घर हमारे नाजुक नन्हे-मुन्नों के कोमल शरीर में चुभेगा नहीं . उनके लिये तो छोटा सा आरामदेह घर चाहिये ।"

लेकिन ऐसा कहना काफी कठोर और अहंकारभरा होगा .यह सोचकर गौरा नम्रता के साथ कहा--

शुक्रिया दादा, हम विचार करते हैं .”    

मेरी मदद चाहो तो मैं घर की मजबूती के लिये खुशी-खुशी तुम्हें तिनके काँटे तार वगैरा ला दूँगा .—कालू कहता रहा .जब तक कि गौरैया का जोड़ा ओझल न होगया .

उन्ही दिनों वे दोनों एक बगीचे में अमरूद की टहनी पर बैठे घर की योजना पर ही विचार कर रहे थे कि तभी उन्हें एक चिड़िया दिखी जो पत्तों को जोड़कर घोंसला बना रही थी । सरपत के रेशों को धागे और अपनी नुकीली चोंच को सुई की तरह बखूबी इस्तेमाल कर रही थी । गौरा-गौरैया फुदकते हुए उसके पास गए .

वाह , इतनी सुन्दर सिलाई तो कोई दर्जी मतलब टेलर ही कर सकता है .—गौरा ने उस चिड़िया की तारीफ करके अपनी बात की भूमिका बनानी चाही पर वह चिड़िया जरा भी प्रभावित हुई नहीं लगी . गर्व से बोली –क्या तुम पहली बार देख रहे हो मेरा घोंसला ? क्या तुम यह नहीं जानते कि मेरा नाम दर्जिन यानी टेलर वर्ड ही है जो बहुत सोच-समझकर ही रखा होगा किसी ने ?"

दर्जिन जी !सचमुच हमने इससे पहले किसी में यह कलाकारी नहीं देखी . तुमने कितनी सफाई से पत्तों की सिलाई करदी है !" ----गौरैया दर्जिन के पास आकर बोली .--- " क्या अपने बच्चों के लिये मैं भी ऐसा ही सुन्दर घोंसला बना सकती हूँ ।" 

दर्जिन ने तारीफ की खुशी और कुछ गर्व के साथ गौरैया को देखते हुए कहा------" वह तो मुश्किल है क्योंकि तुम देख ही रही हो ,तुम्हारे पास मेरे जैसी लम्बी नुकीली चोंच नहीं है .. हाँ तुम कहो तो मैं तुम्हारे लिये ऐसा घोंसला बना सकती हूँ .

बहुत बहुत शुक्रिया ,लेकिन हम अपना घर खुद बनाना चाहते हैं .

अच्छी बात है .”-- दर्जिन बोली –क्या तुमने पंडुकी और बुलबुल के घोंसले देखे? वे आसान भी हैं और तुम्हारे लायक भी ।"

" हाँ लेकिनवे सब बहुत मामूली हैं और छोटे भी . वैसा बनाना होता तो कबका बना चुके होते पर हमें तो कुछ खास डिजाइन का आरामदायक घर चाहिये ताकि मेरे बच्चे उसमें रहते हुए खुशी और गर्व महसूस करें ।"—गौरैया बोली ।

"तब तो तुम्हें बया का घर देखना चाहिये । वह दुनिया का सबसे सुन्दर घोंसला माना जाता है।"---दर्जिन ने गौरैया को बताया ।

बया की तलाश में उन्होंने अनगिन बाग-बगीचे देख डाले .कहीं बया या उसके घोंसले का नामो-निशां नही मिला . अन्त में एक नदी के किनारे खड़े बबूल के पेड़ पर उनकी भेंट बया से होगई । वह भी अपना घोंसला बना रही थी . उसका साथी नर बया जो अपने पीले रंग के कारण मादा से अलग दिख रहा था ,सरपत के रेशे ला लाकर घोंसला बनाने में बराबर मदद कर रहा था .घोंसला सचमुच बहुत सुन्दर था जो लगभग पूरा होने को ही था .

गौरा-गौरैया को देखते ही बया चहक उठी —

मैंने सुना है तुम दोनों नया घर बसाने जा रहे हो . बहुत बहुत मुबारक . तो बताओ इसमें मैं तुम्हारे लिये क्या कर सकती हूँ ?”

"बया जी,अपने आनेवाले नन्हे-मुन्नों के लिये मुझे तुम्हारे जैसा घर बनाना है । मुझे इसकी तरकीब बताओगी?"—गौरैया ने खुशी में फुदककर कहा .

"मेरा घोंसला जितना शानदार और खूबसूरत है उतना ही बनाने में कठिन भी . इसे बनाने के लिये बहुत समय ही नही हुनर भी चाहिये ."- बया बोली ।

"शायद तुम ठीक कह रही हो .”—गौरैया ने कहा . पर वास्तव में बया घोंसला देखकर उसे बहुत निराशा हुई थी .सुन्दर है तो क्या हुआ , घर में खिड़कीतो एक भी नही है. अन्दर जाने के लिये नीचे से सुरंग जैसा सँकरा दरवाजा है .ऐसे घर मेंबच्चे उजाले और धूप के लिये तो तरस ही जाते होंगे .

इस तरह गौरैया के जोड़े ने कई घोंसले देखे पर एक भी उनकी कसौटी पर खरा नहीं उतरा . समय बीतता जारहा था ।

"आखिर हमें अच्छा घर बनाने का तरीका नही मिला । अब क्या करें !कैसा घोंसला बनाएं !" गौरैया के जोड़े की चिन्ता बढ़ रही थी .

" अरे चार लोग चार तरह की बातें करते हैं . अच्छा वही है जो अपने लिये तुम सोचते हो ."---नीम की सूनी टहनी पर बैठी एक बूढ़ी गौरैया ने कहा .वह इस नए जोड़े को घर बनाने के लिये रोज यहाँ वहाँ जाते देखती रहती थी .

मेरे विचार से तो तुम्हें अपना घर अपने तरीके से और जल्दी बना लेना चाहिये .वही सबसे सुन्दर घर होगा .

गौरैया के उस जोड़े को बूढ़ी चिड़िया की बात अच्छी लगी .

उन्होंने तिनका चुन चुनकर अपने तरीके से ही अपना घोंसला बनाया .

अहा कितना प्यारा और आरामदायक घर है .—अपने अण्डों को सेती हुई गौरैया अपने आपसे ही कहे जारही थी .

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सोमवार, 27 दिसंबर 2021

एक पतंग के कारण


सूरज मन में पतंगों की जितनी रंगीन और मीठी कल्पनाएं संजोये रहता था , उसके पिता उतनी ही कड़वाहट के साथ पतंग उड़ाने वाले लड़कों की आलोचना किया करते थे .कहते थे कि यह निरे उजड्ड और बैठे-ठाले लोगों का काम है . यही नहीं वे पतंगबाज लड़कों की पढ़ाई का भविष्य निन्यानवे प्रतिशत अंधकार में डूबा हुआ मानते थे .

हमारा सूरज ऐसे फालतू शौक नहीं पालता . उसे अच्छा विद्यार्थी बनना है .”-–वे अक्सर अपने आपसे भी कहते थे और लोगों से भी कहा करते थे . पिता के मुँह से यह सब सुनकर सूरज अपनी पतंग-विषयक इच्छा को दबा देता था . पिता की नजरों में अच्छा बच्चा बनने का दबाब जो था लेकिन जैसा कि होता है कि किसी इच्छा को दबाओ तो वह और प्रबल होजाती है ,सूरज के मन में पतंग का मोह बढ़ता जा रहा था .

एक दिन आसमान में लहराती एक रंग-बिरंगी पतंग कटकर उसकी छत से लगे बरगद की टहनियों में आकर अटक गई तो उसने जैसे सूरज की इच्छा को बल दे दिया .

पापा मुफ्त में मिली पतंग के लिये तो मना नहीं करेंगे . फिर पापा को बताना क्या जरूरी है .विशू अपने घरवालों से छुपकर मोरपंख ढूँढ़ने जाता है … डम्पी पापा से छुपकर पिल्लों को बिस्किट खिलाता है .रज्जी डाकबँगला से कई बार गुलाब के फूल लाया है तो फिर वह छोटी सी बात नहीं छुपा सकता क्या ? वह खरीदकर तो पतंग लाया नहीं है . वह खुद उसके पास आई है तो उसकी क्या गलती ?’--उसने खुद को समझाया और पतंग को छत पर एक पाट के पीछे छुपा दिया . तभी शेरू आगया . पतंग उसी की थी .

शेरू सूरज का पड़ोसी है और कई बातों में सूरज से बहुत आगे है . अपने मम्मी पापा की तरफ से उसे हर तरह की छूट है . वह कहीं भी खेलने जा सकता है . नदी में घंटों तैर सकता है . जब तक चाहे साइकिल चला सकता है और वक्त पड़े पर एक तमाचे का जबाब दो तमाचों से दे सकता है . घरवालों का कोई प्रतिबन्ध नहीं है उसपर . जबकि सूरज पर पापा की कड़ी नजर रहती है. वे उसे हर बात पर टोकते ही रहते हैं . किसी से झगड़ा होजाए तो पापा गलती न होने पर भी सूरज को ही डाँटते हैं ..

सूरज को यकीन है कि पापा-मम्मी दोनों ही उसके पक्ष में नहीं बोलने वाले . शेरू को पतंग दिलवा कर ही मानेंगे. और यही हुआ . मम्मी ने कहा ---पतंग तुम्हारे पास हो तो बेटा दे दो . तुम क्या करोगे उसका ? पापा तुम्हारे लिये कितनी सारी चीजें लाते रहते है .

कितनी का क्या मतलब ?”-–सूरज के अन्दर एक उबाल सा उठा--–उसे यही पतंग चाहिये , अपनी छत पर आई हुई .वह शेरू से छुड़ाकर तो नहीं लाया . इस तरह शेरू को पतंग मिलती तो क्या वह लौटा देता . मम्मी ने बिना जाने समझे ही कह दिया दे दो बेटा ..पर बेटा नही देगा तो नहीं देगा...करो जो चाहो ..”---सूरज यही कहने वाला था कि उसे ध्यान आया कि सच्चाई और वीरता की शान में राजपूतराजा जान तक दे डालते थे . पर विदेशियों ने शब्दों की हेराफेरी से ही कितने ही देशों पर कब्जा कर लिया था .क्या वह जरा सी पतंग पर कब्जा नहीं कर सकता ? सो अनजान बनकर बोला--

कौनसी पतंग मम्मी ? मैंने तो कोई पतंग नहीं देखी ..मुझे पतंग पसन्द भी नहीं ..

माँ को सूरज की बात पर यकीन होगया .वह कई बार सच बोलने का प्रमाण तो दे ही चुका था .एक बार उसने मिठाई के डिब्बे से लड्डू निकालकर खाने की बात स्वीकार की थी .जबकि माँ को रिंकी और संजू पर शक था .नकल से उत्तर लिख लाने की बात भी उसने पापा को बतादी थी ..

शेरू मुँह लटकाकर चला गया . पर जाते जाते नजरों से ही सूरज के साथ अपनी दोस्ती की समाप्ति की सूचना देगया . सूरज ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया .वैसे भी कॉपियों के लेन देन से अधिक उनका मेलजोल था भी नहीं .उस समय तो वह अपनी कामयाबी पर खुश था . और उसे रखने के लिये सही जगह के बारे में सोचने लगा .कुछ दिन बाद जब सब भूल जाएंगे तब वह पतंग को निकाल सकेगा .

दूसरे दिन शेरू दूसरी पतंग ले भी आया और सूरज को दिखा दिखा कर उड़ाने भी लगा पर सूरज अभी तक पतंग के लिये कोई सुरक्षित गोपनीय स्थान की तलाश में था .छत पर रखे पाट सुरक्षित जगह नहीं थी . नीटू किलकिल काँटे की लकीर खींचने कभी भी उसका उपयोग कर सकता था . अपने इस नटखट भाई पर सूरज भरोसा नहीं कर सकता था .

काफी सोच विचार के बाद उसे बैठक में लगी बड़ी तस्वीर के पीछे पतंग के लिये सही जगह लगी .वहाँ न नीटू के शरारती हाथ पहुँच सकते थे न पापा की तेज नजर .गुलकी उसके कामों में न दखल देती है न ही ज्यादा छानबीन करती है .पर सूरज को पहला मोर्चा उसी से लेना पड़ा .पतंग को अखबार में लपेटकर जैसे ही बैठक मैं पहुँचा गुलकी जैसे उसी का इन्तजार कर रही थी .

भैया लो ये कागज . मेरे लिये फूल बना दो .कल गुलदस्ता बनाकर स्कूल ले जाना है .

वैसे सूरज गुलकी का हर काम खुशी खुशी करता है . फूल बनाना उसका शौक भी है पर उस समय गुलकी की माँग उसे बेवक्त की रागिनी लगी .

गुलकी अभी मैं कुछ व्यस्त हूँ . तू मिनी के पास चली जा वह तुझे बुला भी रही थी .

मिनी ..वह तुम्हें कहाँ मिली भैया .वह तो कल ही बुआ के घर चली गई .

तो परसों मिली होगी ..तू अभी जरा माँ को बुला ला .

माँ से क्या काम है ?”

बताऊँगा पहले बुलाने जा तो सही ...

पहले बताओ .”---गुलकी अड़ गई . सूरज ने बेवशी के साथ देखा .जानता था कि गुस्सा करने से तो वह और फैल जाने वाली थी इसलिये प्यार से समझाया कि वह कहना मानेगी तो ऐसे फूल बनाकर देगा कि सब देखते रह जाएंगे . नहीं तो फिर नहीं... यह सुनते ही गुलकी चली गई . सूरज ने पलंग पर चढ़कर पतंग को तस्वीर के पीछे छुपाया ही था कि नीटू जी आ धमके और आते ही सीधा सवाल ठोक दिया—

तुमने वहाँ क्या छुपाया है भैया ?”

हद होगई .”–सूरज ने सोचा . हर कोई उसके पीछे जासूस की तरह लगा है .गुलकी से पीछा छूटा तो ये महाशय..झल्लाकर बोला –--“हाँ छुपाए हैं बड़े बड़े लड्डू ..

लड्डू !!”-–नीटू की आँखें बिल्ले की तरह चमकीं –--“तब तो मैं जरूर लूँगा . यह कहकर वह पलंग पर चढ़ गया और तस्वीर तक हाथ बढ़ाने लगा . सूरज परेशान होकर नीटू को देखा .यह उसकी सीमा का अतिक्रमण था .वह अपनी कोई चीज इससे बचाकर नहीं रख सकता . छोटा होकर भी उस पर हावी रहता है . पापा का समर्थन जो मिला हुआ है इसे . पर वह भी किसी से कम नहीं . वह किसी से नहीं डरता . पापा से भी नहीं.....नीटू क्या है .इतना सोचते ही उसने नींटू के दोनों हाथ पकड़कर झटका तो वह नीचे गिर गया और चीख मारकर रोने लगा . चोट के कारण नहीं , सूरज के अपराध को गंभीर बनाने के लिये ताकि उसे बड़ी सजा मिले .पर सूरज को कोई परवाह नहीं थी .

शाम को पापा ने सूरज की खूब खिचाई की . कहा –-“इतना बड़ा होगया है पर इतना तमीज नहीं कि अपने छोटे भाई बहिन के साथ कैसा बर्ताव किया जाता है .

सूरज को मालूम था कि पापा उसी को दोष देंगे इसलिये चुपचाप सुनता रहा . मन में एक सवाल जरूर उठा कि अपने हिसाब से पापा उसे जब चाहे क्यों बड़ा बना देते हैं और क्यों छोटा . जब खाने की चीजें बाँटने या नीटू गुलकी की मदद की बात हो तो पापा उसे बड़ा कहते हैं और साइकिल चलाने , बाजार जाने या अपनी कोई राय देने की बात हो तो पापा उसे छोटा कहते हैं . पता नहीं क्यों उसकी इतनी खींचतान होती है .

उस दिन के बाद नीटू उसका खुलेआम विरोधी होगया . गुलकी को उसने अपने साथ कर लिया . दोनों साथ खाते और खेलते . सूरज को सुना सुनाकर बड़ी बड़ी योजनाएं बनाते . सूरज बहुत अकेला पड़ गया .अब उसे पतंग भी बोझ लगने लगी . पतंग छुपाने से उसे क्या मिला . न किसी को दिखा सकता है न उड़ा सकता है शेरू को तो लौटाने से रहा और घर में बताना उनका विश्वास खोना होगा . उसे छुपाना भी एक समस्या है . फाड़कर फेंकने या जलाने से सारी कहानी खत्म की जा सकती है .पर ऐसा करना बुज़दिली होगा. सूरज बुजदिल नहीं है . अब वह पतंग को सुरक्षित जगह पर छुपाएगा भी और एक दिन उड़ाएगा भी .

मौका पाकर वह पतंग को लेकर अन्दर वाले कमरे में गया . कमरे में अँधेरा था जो बाहर से ज्यादा सघन लगता था .पर उसे परवाह नहीं थी . वैसे भी अभ्यस्त आँखों के आगे अँधेरा खुद ही कमजोर होजाता है .कमरे में एक बड़ा और पुराना सन्दूक ईँटों पर रखा था . उसके नीचे खाली जगह में सूरज ने पतंग को सरका दिया . यहाँ पतंग पूरी तरह सुरक्षित थी .माँ झाडू लगाने जरूर आती थी पर सन्दूक के नीचे तो हाथ नही न डालती होगी . सूरज ने पतंग रख तो दी पर अनायास ही साँप बिच्छू की आशंका हुई और जल्दी से हाथ खींचा तो सन्दूक की तली में निकली धारदार पत्ती कलाई को चीरती हुई निकल गई . खून की धार फूट पड़ी . वह पीड़ा से तड़फ उठा . जल्दी से जो कपड़ा मिला बाँध लिया . पर जो जमीन पर गिरी लाल बूँदें दिखीं तो पीड़ा को भूल गया . पापा को पता चलेगा तो सान्त्वना की जगह डाँटेंगे . एक बार पेड़ से गिरने पर पाँव में मोच आगई तब पापा ने दिलासा देने की बजाय दो थप्पड़ मारे कि ऐसे ऊधमी लड़कों को इससे भी ज्यादा दण्ड मिलना चाहिये . बिस्तर में पड़े पड़े उसे चिन्ता सता रही थी कि कलाई के घाव को कैसे छुपाए . पीठ पेट में होता तो कोई चिता न थी . तभी उसे पूरी बाँह की शर्ट पहन लेने का विचार सूझा . चादर ओढ़े ही उसने माँ को पुकारा फुल शर्ट की क्या जरूरत पड़ गई सूरज ?”

जरा सर्दी लग रही है मम्मी .

सर्दी !...सर्दी का मौसम तो नहीं है . कहीं बुखार तो नहीं है ?”

नहीं मम्मी बुखार उखार कुछ नहीं बस यूँ ही .

हूँ होगा तो भी तू क्या बताएगा ?”---यह कहकर माँ ने बुखार देखने के लिये वही हाथ पकड़ लिया . सूरज की कराह निकल गई .

अरे क्यों क्या हुआ ?”माँ ने कपड़ा खोलकर देखा .

अरे राम !खून ..! सूरज यह कैसे लगी .

कुछ नहीं मम्मी ,जरा सी तो चोट है .ठीक हो जाएगी .

ठीक होगी बाद में . पहले यह बता कि लगी कैसे .

छोड़ो भी मम्मी , लग तो गई ही है ना . पूछने से क्या फायदा . प्लीज पापा को मत बताना ..

माँ घाव पर मरहम लगाती ध्यान से सूरज की बात सुनती रही . बोली कुछ नहीं .

दो तीन दिन बाद सूरज को उसके पापा ने अपने पास बुलाया . सूरज पिता के सामने जाने से कुछ डर रहा था वे ज्यादातर गलती पर डाँटने या समझाने पर ही बुलाते हैं . कलाई के घाव का उन्हें पता चल ही गया होगा . नहीं तो अब चल जाएगा .अब  होगा देखा जाएगा .

लेकिन पापा के सामने जाते ही सारी आशंकाएं मिट गई . उन्होंने सूरज को प्यार से पास बिठाया . हालचाल पूछा . सूरज चकित था . डाँट-फटकार से मन विद्रोह के बिगुल बजा देता है पर प्यार के दो बोल सब कुछ पिघला देते हैं .कुछ पल बाद पापा ने सूरज के सिर पर हाथ फेरकर पूछा –

पतंग उड़ाना बहुत अच्छा लगता है न ?”

यह कैसा सवाल है ? किस घटना की भूमिका है .?’–सूरज का दिमाग चकराया . शायद पापा मन की थाह ले रहे हैं . इसलिये वह मजबूती से बोला --

न ..न..नही तो मैं पतंग का नाम भी नहीं लेता .

नाम नहीं लेते हो पर पतंग के लिये कोई भी खतरा लेने तैयार रहते हो .

न..नही तो पापा ..

डरपोक कहीं के .” --पापा ने हल्की सी चपत लगाई  . सूरज और भी हैरान . पापा ने उसे डरपोक किस आधार पर कहा . अँधेरा तो क्या...वह तो साँप-बिच्छुओं से भी नहीं डरता . तभी माँ उसी पतंग को लेकर आगई . देखकर सूरज की समझ में सब कुछ आगया . सिर झुकाकर अपनी गलती मान लेने के अलावा कोई चारा न था .

यह वही पतंग है न जिसे छुपाने तुम अँधेरे कमरे में गए . बिना किसी खतरे की परवाह किये हुए ..

जी ..नहीं ..

तभी तो मैंने डरपोक कहा .जो अपनों से अपने मन की बात भी नहीं कह पाए उसे और क्या कहा जाए .

बेटा कोई सुने या ना सुने, समझे या ना समझे ,सच कहने में कोई हर्ज नहीं . बल्कि कहना ही चाहिये . कुछ कारण हैं कि मैं पतंगबाजी का विरोध करता हूँ पर इतना भी नहीं कि मेरे बेटे में सच बोलने का हौसला ही जाता रहे ..

यह कहकर पापा ने थैले में से दो सुन्दर पतंगें निकालकर सूरज को दे दीं .सूरज ने पापा के चेहरे को देखा .आँखों में नाराजी की जगह स्नेह था . उसने दोनों पतंगें एक तरफ सरकादीं और पापा से लिपट गया अब उसे पतंग की जरूरत नहीं थी . उसे पतंगों से भी अच्छी चीज मिल गई थी –पापा का प्यार ... 










शनिवार, 23 अक्तूबर 2021

रद्दी सामान

 दीपावली पर विशेष

वरुण भैया ने आँगन में बिखरे सामान को ऐसे देखा जैसे कोई मरे हुए जानवर को देखता है । फिर उससे ही जल्दी छुटकारा पाने की आतुरता दिखाते हुए उन्होंने अपना आदेश मेरी तरफ गुलेल की गोली की तरह फेंका---"राजन् ! जा जल्दी से किसी रद्दीवाले को पकड़ ला । कहीं भी मिल जाएगा । आजकल रद्दीवाले गली-मोहल्लों में ऐसे घूम रहे हैं जैसे बरसात में मेंढक-केंचुए घूमते हैं ।"

यह कहते-कहते उन्होंने अपनी नाक ऊपर खींच कर होठों को कुछ इसतरह सिकोड़ा कि नाक के दोनों तरफ नालियाँ सी बन गईं । ऐसी जटिल मुद्रा वे किसी के प्रति गहरी उपेक्षा दिखाने के लिये करते हैं । पर उस समय उनकी उपेक्षा रद्दी के लिये थी या रद्दी खरीदने वाले के लिये कहना मुश्किल था ।

लेकिन मुझे खुशी हुई । भैया उस ढेर सारे पुराने सामान को अलविदा कहने वाले थे जो बेकार ही था और जिसके कारण हम घर में कभी नयापन महसूस नही कर पाते थे । हर साल दीपावली पर सफाई--पुताई होती और वह सामान इधर से उधर सरका दिया जाता था । पर कचरे में हरगिज नही फेंका जाता था ।

हमारे पिताजी को पुरानी चीजें जोड़ते रहने का विशेष चाव है । घर की कोई चीज उनसे बिना पूछे बाहर नही जासकती । चाहे वे फटे-पुराने जूते-चप्पलें ही क्यों न हों ।

"किसी जरूरतमन्द को ही दे देंगे ।"--इस संग्रह के पीछे पिताजी का यही तर्क रहता था ।

"लेकिन पिताजी जो चीज हमारे काम की नही उसे दूसरों को देना क्या ठीक होगा ?"--भैया कभी-कभी पूछते तो पिताजी एक ही बात कहते ---"कुतर्क करना तो सीख गए हो, कुछ अच्छी बातें भी सीख रहे हो कि नही !"

एक बार चाचाजी ने कह दिया कि 'पुरानी बेकार चीजों को तो निकाल ही देना चाहिये ।' बस पिताजी उनके पीछे पड़ गए । दादी से बोले----"सुन लो माँ ! पुरानी चीजें इनके लिये बेकार हैं । कल को हम-तुम पुराने हो जाएंगे तो ...।"

"अरे भाईसाहब !"---चाचाजी कुछ झेंप कर बोले---"मैं तो घर की फालतू और बेजान चीजों के लिये कह रहा था ।"

"क्यों भाई, इन फालतू बेजान चीजों से क्या तुमने कभी काम नही लिया ?"--पिताजी किसी काबिल वकील की तरह अपने प्रतिपक्षी को पछाड़ने के लिये ढेरों दलीलें जेब में रखते हैं ।

"तुम इन्हें फालतू कह रहे हो वे क्या हमेशा से ही फालतू थीं । इन चप्पलों को ही देखो ,जब खरीदीं थी तब तो नई थीं न ?"

"जी हाँ नई थीं ।"

"इनकी यह हालत इसलिये हुई कि तुमने खूब घसीट कर पहनीं । है न ?"

"हाँ ।"

"बस" --पिताजी विजयी भाव से बोले ---"यही तो मैं तुम्हें समझाना चाहता था कि किसी चीज से हम काम लें और काम की न रहने पर फालतू करार दे दें क्या यही इन्सानियत है ?"

"ओफ् ओ भैया !"---चाचाजी अधीर हो जाते पर पिताजी क्या किसी को बोलने का मौका देते हैं । कहने लगे --"सवाल बेजान या जानदार का नही है हमारी सोच का है । आज हम जो बात इन चीजों के लिये कह रहे हैं कल इनसानों के लिये भी सोचेंगे । क्या मैं गलत कह रहा हूँ ?"

अपनी हर बात के पीछे पिताजी यह सवाल जरूर लगाते हैं --क्या मैं गलत कह रहा हूँ । जाहिर है कि इसका जबाब सबको 'नही' में ही देना होता है चाहे उनके तर्क कितने ही बेतुके क्यों न हों ।

आप समझ सकते हैं कि क्यों हमारे घर से अब तक कोई इस सामान को चाह कर भी नही निकाल पाया ।

इधर दीपावली का त्यौहार दस्तक देने लगा । चारों तरफ सफाई-धुलाई पुताई और रंगाई का काम युद्ध-स्तर पर होने लगा । हमारे सामने हमेशा की तरह वही सवाल खड़ा था कि पुराने बेकार सामान का क्या करें ।

संयोगवश पिताजी को तीन-चार दिन के लिये बुआ के यहाँ जाना पड़ गया ।माँ ने जाते-जाते वरुण भैया के कान में चुपचाप एक वाक्य सरका दिया-- "सारे रद्दी सामान को निकाल फेंकना । लौट कर पिताजी थोड़ा बहुत बखेड़ा करेंगे और कुछ नही । बाद में सब ठीक हो जाएगा।"

भैया यह विशेषाधिकार पाकर खुश होगए । पर मैं उनसे ज्यादा खुश था । सो पूरे उत्साह के साथ पुराने सामान को निकलवाने व छँटवाने में उनके साथ लग गया । पूरे दो दिन की मेहनत के बाद आँगन में ढेर सारी पुरानी चीजें----लोहा--पीतल के टूटे-फूटे सन्दूक और बर्तन,पेटियाँ,कुर्सियाँ,बैग,चरखा ,लालटेन,डिब्बे-डिब्बियाँ किताबें ,खिलौने कुछ पुराने कपड़े आदि बिकने के लिये तैयार थीं ।    

"लोहा..प्लास्टिक वाला...टीन-टप्परवाला ,रद्दी अखबार वाला ".--मैंने देखा गली में चार पहियोंवाला ठेला धकेलता हुआ एक आदमी आँखें बन्द कर आसमान की ओर पूरा मुँह खोले चिल्ला रहा था ।

"ओ रद्दी वाले भैया । रद्दी खरीदोगे ?"

मेरी बात सुन वह लपककर हमारे द्वार पर आ खड़ा हुआ ।

"भैया, भैया मैं उसे ले आया ।" मैंने उल्लास के साथ कहा पर भैया ने जाने क्यों मेरी बात जैसे सुनी ही नही ।

"भैया ,चलो न !" मैंने कहा तो कुछ खीजकर बोले----"रुक जा यार ।"

पाँच साल बड़े भैया जब मुझे इस दोस्ताना सम्बोधन से पुकारते हैं तो मैं समझ जाता हूँ कि वे किसी असमंजस में हैं और उन्हें मेरी मदद की जरूरत है ।

"क्या बात है भैया ?" मैंने पूछा तो भैया बड़े विचारशील व्यक्ति की तरह बोले--

"राज ,हमें एक बार फिर से देख लेना चाहिये कि इनमें कोई जरूरी सामान तो नही है !"

"दो दिन से हम क्या बैठे-बैठे गीत गा रहे थे ?"---भाभी व्यंग्य से बोली---"बाहर आदमी इन्तजार कर रहा है बेचारा ।" 

"विनी तुम जरा शान्त रहोगी ?" भैया माथे का पसीना पौंछते हुए बोले । फिर मुझसे कहने लगे-----"देखो राज, सामान को बेचना जितना आसान है खरीदना उतना ही मुश्किल । तुम नही समझते कि जिन्दगी कैसे चलाई जाती है !"

भैया की बात सुन कर मेरी हँसी फूटते-फूटते रह गई । भला इस रद्दी सामान का जिन्दगी के चलने से क्या सम्बन्ध । लेकिन मैंने देखा कि भैया का जोश (सामान को निकालने का) उसी तरह धीमा होगया था जिस तरह सिग्नल न मिलने पर कारण गाड़ी की गति धीमी हो जाती है । रुक भी जाती है ।

हाँ मैंने भैया की बातों में एक खास बात देखी कि  न तो ये वाक्य भैया के थे न ही बोलने का लहजा । उनके मुँह से सरासर पिताजी बोल रहे थे । शरीर से सैकड़ों मील होने के बाबजूद पिताजी भैया के विचारों व शब्दों में बखूबी मौजूद थे । मैं हैरान रह गया । जाहिर है कि इसमें भैया का कोई दोष नही था । और तब जरूरी था कि हम उनकी बात समझते । वे कहे जा रहे थे--

"पुरानी चीजों की बड़ी अहमियत है राज । इस लकड़ी के सन्दूक को देखो । दादाजी के पिताजी ने मात्र तीन रुपए में खरीदा था । आज भी कितना मजबूत है !"

"इसे रहने देते हैं भैया "---मैंने उदार होकर कहा । हालाँकि मेरी हालत अच्छे भले उड़ते गुब्बारे में सूराख हो जाने जैसी होने लगी थी लेकिन...।

"यह लोहे का बक्सा देखो भले ही जंग खा रहा है पर मजबूती में कम नही है देखो--"--यह कह कर उन्होंने सन्दूक में दो-तीन मुक्के मार कर दिखाए---"पेंट करवा लेंगे तो नए को मात देगा । है कि नही ?"

मैंने लोहे का बक्सा भी एक तरफ सरका दिया । भैया को जैसे रास्ता मिल गया । चहक कर बोले---"विनी देखो यह गुड़िया और उसका सन्दूक । याद है तुम्हारी दादी ने जन्मदिन पर तुम्हें दिया था !"

भाभी बिना रुकावट के मुस्कराई और छोटी बच्ची की तरह झपट कर भैया से अपना सामान छीन लिया ।

"राजन् ये लकड़ी की पेटियाँ अलग रखदो ।" --भैया अब खुल कर आदेश देने लगे ।

"क्या है कि इनसे कई काम लिये जा सकते हैं । इनमें गैरजरूरी सामान भरा जा सकता है । चाहो तो टेबल का काम ले लो । कुछ नही तो मिट्टी भर कर गमले ही बना लो । देखो..यह लालटेन ..क्या हुआ जो बिजली के युग में कोई इसे पूछता नही पर बिजली भी तो चली जाती है कभी-कभी...। नही ?"

"भैया इसे भी रख लेते हैं "--भैया की बातें च्यूइंगम की तरह न खिचने लगें मैंने तुरन्त लालटेन उठा कर एक तरफ रखदी । फिर तो जादुई तरीके से सामान छँटने लगा ।सबके पीछे काफी दमदार दलीलें ---"ये कुर्सियाँ जरा सी मरम्मत कराके नई हो जाएंगी ।... यह चरखा व चक्की माँ के जमाने की यादगार हैं । और सिंगारदान चाचीजी के ब्याह की निशानी ये खलौने व झूला भैया के बचपन का है तो पीतल के बड़े भगौने दादी के दहेज की निशानी । ...किताबें तो सभी पढ़ने लायक हैं और पत्रिकाओं में बुनाई व व्यंजनों के बढ़िया नमूने । ...अखबारों को गला-कूट कर माँ बढ़िया टोकरी व मूर्तियाँ बना लेंगी और भाभी पालीथिन से दरी और आसन । बैग की केवल चैन खराब है और जूतों की जरा सिलाई होनी है । ये चप्पलें बरसात में अच्छा काम देंगी ......।"

पूरा नाटक पुराना था । कथानक ,संवाद सब कुछ वैसे ही । सिर्फ पात्र बदल गए थे । चूँकि मुझे अभी तक इसमें कोई भूमिका नही मिली थी सो असमंजस में खड़ा था तभी भाभी ने पुकारा---"अरे राज, ये पेंट शर्ट छोटे तो होगए हैं पर होली पर पहनना काफी मजेदार रहेगा ।तंग शर्ट चार्ली चैपलिन जैसी और यह हैट आवारा के हीरो जैसा । दादाजी की छड़ी और पिताजी की घड़ी । मजा आएगा न !"

भाभी की बात से मुझे समझ में आगया कि मुझे भी एक छोटी सी भूमिका अदा करनी है वह यह कि दरवाजे पर आधा--पौन घंटे से खडे रद्दी वाले को जो कई बार हमें जल्दी करने को उकसा चुका था ,किसी तरह चलता करना था । इसलिये मैंने इधर--उधर से कुछ शीशियाँ ,जिनके ढक्कन गायब थे कुछ चप्पलें जिनमें मरम्मत की गुंजाइश न थी ,कुछ कागज, फटी किताबें और कील-काँटे समेटे और रद्दीवाले को देने चल दिया । इससे ज्यादा देने को हमारे पास कुछ था ही कहाँ !  

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