निकल घोंसले से सूरज के ,
चुगने
आई दाने- दुनके।
लगी
चहकने डाली-डाली ,
गौरैया
सी धूप ।
रात
गुजारी जैसे-तैसे ,
करके
पहरेदारी ।
सर्दी
सोयी है अब जाकर ,
ठिठुरी
थकी बेचारी ।
बिछी
हुई आँगन में ,
नरम
बिछैया जैसी धूप .
मौसम
के मेले में ,
छाये
ज्यों खजूर और पिस्ता ।
धूप
हुई है भुनी मूँगफली ,
गजक
करारी खस्ता ।
सूरज
के बटुआ से गिरी ,
रुपैया
जैसी धूप ।
किलक
दूधिया दाँत दिखाती ,
है गुडिया
सी धूप ।
खट्टी-मीठी चटपट चूरन की ,
पुडिया
सी धूप ।
दूर
तलैया की लहरों पर ,
है
नैया सी धूप ।
अपने गबरू को दुलारती ,
गैया जैसी धूप ।
दूध
पिलाती ,लोरी गाती ,
मैया
जैसी धूप ।
दबे
पाँव आँगन में चले ,
बिलैया
जैसी धूप ।
फुदक
रही है डाली-डाली ,
गौरैया सी धूप ।