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सोमवार, 5 जनवरी 2026

चिरैया जैसी धूप


निकल घोंसले से सूरज के ,

चुगने आई दाने- दुनके।

लगी चहकने डाली-डाली ,

गौरैया सी धूप ।

 

रात गुजारी जैसे-तैसे ,

करके पहरेदारी ।

सर्दी सोयी है अब जाकर ,

ठिठुरी थकी बेचारी ।

बिछी हुई आँगन में ,

नरम बिछैया जैसी धूप .

 

मौसम के मेले में ,

छाये ज्यों खजूर और पिस्ता ।

धूप हुई है भुनी मूँगफली ,

गजक करारी खस्ता ।

सूरज के बटुआ से गिरी ,

रुपैया जैसी धूप ।

 

किलक दूधिया दाँत दिखाती ,

है गुडिया सी धूप ।

खट्टी-मीठी चटपट चूरन की ,

पुडिया सी धूप ।

दूर तलैया की लहरों पर ,

है नैया सी धूप ।

 

अपने गबरू को दुलारती  ,

गैया जैसी धूप ।

दूध पिलाती ,लोरी गाती ,

मैया जैसी धूप ।

दबे पाँव आँगन में चले ,

बिलैया जैसी धूप ।

फुदक रही है डाली-डाली ,

गौरैया सी धूप ।