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गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

पापा तुम बस मेरे ही हो ...।

सहमे से बोले अप्पू जी
"पाप जरा बताओ ।
क्या तुम दादी के बेटे हो ?
साफ-साफ समझाओ ।"

"हाँ..हाँ वह मेरी माँ हैं-"-

कहकर पापा मुस्काए ।
"बेशक मैं उनका बेटा हूँ ।"
सुन अप्पू घबराए ।

"और बुआ के भैया भी हो ?

दीपा के भी मामा भी...??"
"हाँ"---बोले पापा तो ,उनका 
खिसका पाजामा भी ।

कोई पापा को या ,

पापा अपना कहें किसी को।
नहीं गवारा बिल्कुल-बिल्कुल 
अपने अप्पू जी को ।

डाल गले में बाँह ,

ठुनक कर बोले चढा पाजामा
"पापा तुम बस मेरे ही हो ,
बेटा, हो या मामा....।"

सोमवार, 30 दिसंबर 2013

नई सुबह

नीम की सबसे ऊँची टहनी पर किट्टू ने देखा । अभी तो चारों तरफ अँधेरा था ।आसमान में थरथराते हुए से तारे और धुन्ध में डूबे हुए पेड-पौधे अभी रात शेष होने की सूचना दे रहे थे ।
वह दिसम्बर की आखिरी रात थी । कडकडाती सर्दी में पत्ता-पत्ता काँप रहा था । किट्टू का सारा शरीर बर्फ हुआ जारहा था । लेकिन नई सुबह का विचार उसके मन में ऊष्मा पैदा कर रहा था । 


इस सुबह का किट्टू को बेसब्री से इन्तजार था । अपनी माँ सोना गिलहरी और कई चिडियों से उसने महीनों पहले सुन रखा था कि पहली जनवरी की सुबह नई और अनौखी होगी क्योंकि इस बार पहली जनवरी को केवल साल ही नया नही होगा बल्कि सदी भी नई होगी । साल या सदी का बदलना किट्टू के लिये एकदम नई बात थी । इसलिये वह सबसे अदिक उत्साहित था । अपने सारे क्रियाकलाप छोड कर वह मुँडेर पर धूप का आनन्द लेता हुआ उत्सव की उन तैयारियों के बारे में सुनता रहता जो नववर्ष के स्वागत के लिये की जारहीं थी ।
हरियल ,मैना पंडुकी,बया, कबूतर और नीलकण्ठ ने गीतों का कार्यक्रम तैयार किया था ,कुछ इस तरह कि गाते-गाते सबेरा हो और नए साल का स्वागत मधुर गीतों से हो । वे सबको यह भी दिखा देना चाहते थे कि गीत गाना केवल कोयल, पपीहा, या श्यामा को ही नही ,उन्हें भी आता है और बेशक उनसे अच्छा ।
गौरैया, बुलबुल, फुदकी ,हुदहुद ,कठफोडवा, आदि ने नृत्य प्रस्तुत करने का जिम्मा लिया । उन्होंने मोर के परम्परागत नृत्य से अलग एक नई शैली का नृत्य तैयार किया था जिसमें उछलना, कूदना ,दौडना, खदेडना, और भिडना ,सब शामिल था । उनके विचार से खुशी जाहिर करने का यह एक बेहतर और मौलिक तरीका था ।
चींटू चूहे और छुटकी छछूँदर ने शानदार दावत रखी थी और उल्लू व चमगादड ने रोशनी का बढिया इन्तजाम किया था । 
अरे मुझको भी तो कोई काम दो...मुझे भी तो नई सुबह का स्वागत करना है ...। किट्टू इन तैयारियों को देख उत्साह से भर जाता । गौरैया कहना चाहती कि , अभी उँगली भर के हो बच्चे । क्या काम करोगे । लेकिन उसने चहक कर कहा----"बिल्कुल ,और तुम्हें जो करना है वह यह कि अपनी खूबसूरत पूँछ को सम्हाले मूँगफली के दाने कुतरते रहो और हम सबके काम की निगरानी करो ।"
दिसम्बर की उस आखिरी रात अपने वशभर कोई नही सोया । लेकिन रात ढलते-ढलते सबको नींद के झोंके आने लगे । अकेला किट्टू ही था जिसने एक पल भी झपकी नही ली । उसे फिक्र थी कि सोजाने पर हो सकता है कि नई सुबह के आने का पता ही न चले । और इस तरह तो वह सुबह का स्वागत कर ही नही सकेगा । इसलिये जैसे ही कुक्कू मुर्गे ने पहली बाँग दी--" कुकडू.....कूँ " वह फुर्ती से पेड की सबसे ऊँची टहनी पर जाकर बैठ गया । वहाँ से नई सुबह को सबसे पहले अभिवादन किया जा सकता था ।
लेकिन आसपास घिरे अँधेरे को देख उसे कुक्कू की जल्बाजी पर अचरज हुआ ।
"तुम्हारी अक्ल को क्या हुआ है कुक्कू ? क्या अब भी तुम्हें किसी ने टार्च दिखादी ,जो रात में ही सुबह का एलान कर बैठे ?"
"अरे नही किट्टू जी,"---कुक्कू झेंप कर बोला---"वह तो टी.वी. वालों ने टार्च का विज्ञापन जो करवाया था । कमाई वाली बात थी न । लेकिन अब तो मैंने यकीनन सही समय पर ही बाँग दी है । क्या है कि सर्दियों में सूरज सर रजाई से निकलने में अलसाते हैं इसलिये उजाला नही होपाता । बाँग सुन कर पहले चिडियाँ जागतीं हैं फिर वे सूरज जी को जगातीं हैं तब कहीं आराम से बाहर निकलते हैं जनाब इसीलिये तो....। सब्र करो ,कुछ ही देर में उजाला होने लगेगा ।"
सचमुच कुछ देर बाद पेड-पौधे धुन्ध की चादर उतारने लगे । तारे भी एक-एक कर गायब होने लगे । और फिर पूरब में क्षितिज पर लालिमा बिखरने लगी ।
बस अब नई सुबह आने को ही है---किट्टू ने खुश होकर देखा । जैसे झाँझी के सूराखों से दीपक की रोशनी फूटती है वैसे ही प्राची के क्षितिज से सुनहरी किरणें फूटने लगीं थीं । और कुछ ही पलों में पहाड के पीछे से किसी ने जैसे बडी लाल गेंद को उछाल दिया हो , सूरज उभर कर ऊपर उठने लगा।
"नई सुबह मुबारक हो ! मुबारक हो "---पेडों की टहनियों पर बैठीं चिडियाँ चहकने लगीं । पेड किसी झुनझुने की तरह बज उठे । तभी सोना ने पुकारा----"किट्टू , मुबारक़ नई सुबह । तुम वहाँ अकेले क्या कर रहे हो ? हमारे साथ आकर खुशियाँ मनाओ ।"
"नई सुबह ?" किट्टू ने आश्चर्य से पूछा ।
"कहाँ है नई सुबह ?" मैं तो उसके आने का रात से ही इन्तजार कर रहा हूँ ।"   
"तुम्हें नई सुबह नहीं दिखाई देती ?"---कालू कौवे का छोटा बच्चा बोल पडा जो दिखने में कालू जैसा ही बडा होने पर भी सूरत से काफी बचकाना और भोला लगता था----"तुम्हारी आँखें तो दुरुस्त हैं न ?" 
"मेरी आँखों को छोडो, पहले यह बताओ कि नई सुबह है कहाँ ?"--किट्टू ने तेजी से पूछा ।
"यही तो है नई सुबह ।" कौवा के बच्चे ने कहा और अपनी माँ से उसकी पुष्टि करवाने बोला----"है न माँ ?" 
"बिल्कुल " उसकी माँ विश्वास के साथ बोली --"यही तो है नई सुबह ।"
नन्हा किट्टू बडा हैरान हुआ । उसने फिर से चारों ओर गौर से देखा । सब कुछ रोज जैसा ही तो है 
सूरज रोज की तरह ही लाल रंग का उगा है । आसमान नीला ही है । सामने का पहाड आज भी सुरमई रंग का है । नदी उसी तरह पश्चिम की ओर बह रही है । खेत ,मैदान,पेड-पौधे फूल-पत्ते, सब जैसे कल थे वैसे ही तो आज भी हैं । यहाँ तक कि हवा भी उतनी ही ठण्डी है वैसी ही खुशबू वाली । आखिर नयापन है भी तो कहाँ ??
"मैं क्या जानूँ ?" कौवे का बच्चा किट्टू के तर्कों से उलझन में पड गया --" मेरी माँ कहती है , कैलेण्डर ,टी.वी., रेडियो, अखबार और सारी दुनिया कह रही है ,वह क्या गलत है ?"
लेकिन किट्टू के गले यह बात नही उतरी कि सिर्फ अखबार में छपने या कैलेण्डर के अंक बदलने से ही कोई सुबह नई कैसे हो सकती है जबकि सब कुछ वैसा ही हो ।
"तुम्हारा सोचना अपनी तरह से बिल्कुल सही है "----सोना ने किट्टू को प्यार से समझाया --"केवल कैलेण्डर से नई सुबह नही हो सकती क्योंकि जितने कैलेण्डर उतने ही नए साल । कोई पहली जनवरी को नये साल का आरम्भ बताता है कोई बाईस मार्च को ,कोई गुडी पडवा को तो कोई मोहर्रम की पहली तारीख को ....। दरअसल वह नयापन अखबार कैलेण्डर मे नही हमारे अपने मन में है ।"
किट्टू यह सुनकर और भी उलझ गया । 'नयापन ? विचारों में ? कैसे ?..।
सोना समझाती रही ---"हाँ मेरे बच्चे ,नयापन हमारे अपने विचारों से आता है । मान लो कि पूरे साल कोई त्यौहार न आए । कोई होली, दिवाली ,दशहरा ,ईद ,क्रिसमस आदि त्यौहार न मनाए जाएं तो पूरा साल कितना लम्बा और उबाऊ लगेगा । न आनन्द होगा न उल्लास । त्यौहार हमें खुशी ही नही उम्मीदें व हौसले भी देते हैं । नई सुबह को भी तुम नए एहसास का नाम दे सकते हो । नए विचारों व नए संकल्पों का नाम । नए साल के बहाने हम मन में उल्लास उमंग और ताजगी लाते हैं । उल्लास के साथ बिताए कुछ पल हमें नई ऊर्जा देते हैं । मेरे विचार से तो नई सुबह का यही मतलब है ।"
"फिर तो माँ "....किट्टू माँ की बात को और ज्यादा समझने के लिये थोडा रुका फिर बोला--" हम हर सुबह को भी एक नई सुबह मान कर एक खुशहाल दिन की शुरुआत कर वसकते हैं ।" 
"क्यों नही ?" तमाम चिडियाँ चहक उठीं---"यह तो और भी अच्छी बात होगी ।" और फिर वे किट्टू को नववर्ष के उत्सव में खींच ले गईँ ।
(जनवरी सन् 2000 चकमक में प्रकाशित )

गुरुवार, 28 नवंबर 2013

जाडे आए भैया ।

सहमे -सिकुडे लगते हैं दिन ,
रातें बडी लडैया ...
जाडे आये भैया  ।

खीच-खीच सूरज की चादर,
रजनी पाँव पसारे ।
काना फूँसी करें उघारे ,
थर्..थर्..चन्दा -तारे ।
धूप बिचारी ...हारी ,
जल्दी करती  गोल बिछैया ...
जाडे आये भैया ।

लदे फदे कपडों में निकलें ,
चुन्नू-मुन्नू भाई,।
मम्मी के हाथों में नाचे ,
दिन भर ऊन-सलाई।
किट्-किट्..करते दाँत,
 कंठ से सी...सी दैया--दैया ।
जाडे आये भैया ।

ठण्डे पानी से है कट्टी,
साथी धूप सुनहली .
देर रात बैठे अलाव पर ,
करते यादें उजली ।
अनजाने से लगते हैं अब ,
नदिया ताल तलैया ।
जाडे आए भैया ।

अमरूदों ने मीठी-मीठी 
खुशबू है फैलाई।
गोभी गाजर मटर टमामर ने
बारात सजाई ।
गन्ने होगये रस की गागर ,
सरसों भूल-भुलैया ...
जाडे आये भैया ।

खेलो, खालो ,पढलो सो लो ,
अब तुम जी भर-भऱ के ।
कोई काम करो मत भैया ,
घबरा के डर-डर के ।
"सर्दी लग जायेगी"--कहते ,
हारे बेशक मैया ।
जाडे आये भैया ...।
(सन् 1994 के आसपास रचित व चकमक के सौ वे अंक में प्रकाशित)

बुधवार, 16 अक्टूबर 2013

एक रूप रुपहला तारा

Moon images: The moon's halo









एक रूप रुपहला तारा 

जैसे थाली भर पारा
या परी भुलक्कड भूली 
अपना सिंगार पिटारा 

एक झिलमिल सा आईना

टीका है जडा नगीना
नीले सरुवर में मानो
एक श्वेत कमल रसभीना

नभ की दीवार घडी है

बिन्दी जो रतन जडी है
खालो ,है बर्फ का गोला
खेलो वह बॅाल पडी है 

यह चाँदी का सिक्का है 

या ताश तुरुप इक्का है
कुरमुर पापड चावल का
या आलू का टिक्का है

क्या साइज है इडली का !

या प्याला भरा दही का 
मीठा लड्डू मावा का ?
या घेवर फीका-फीका ?

रबडी का भरा कटोरा 

बिखरा मिसरी का बोरा 
माँ धरती नीली-नीली 
पर मामा गोरा-गोरा ।
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चित्र-गूगल से साभार  

मंगलवार, 1 अक्टूबर 2013

बापू तुम्हें सलाम ।


पोरबन्दर 
दो अक्टूबर,
करमचन्द और पुतली के घर
जन्मे थे अभिराम 
बापू तुम्हें सलाम ।

दुबला तन 
पर ताकतवर मन ,
सत्य ,अहिंसामय था जीवन ।
सुख-साधन आराम,
लिखा सब आजादी के नाम ।
बापू तुम्हें सलाम ।

भारत हो या हो अफ्रीका ,
बहुत दुखा दिल बापू जी का ।
भारत -वासी जीते थे ,
बन कर मजदूर गुलाम ।
बापू तुम्हें सलाम ।

गोरे क्रूर कुटिल अभिमानी ,
याद करादी उनको नानी ।
सत्याग्रह के बल पर, 
उनको ,झटके दिये तमाम । 
बापू तुम्हें सलाम ।

नियमों के थे अविकल सच्चे ।
पर अन्तर के कोमल कच्चे ।
दुःखी, दलित ,निबलों विकलों की,
सेवा की अविराम ।
बापू तुम्हें सलाम ।

करुणा का लहराता सागर ,
पूँजी थी बस लकुटी चादर ।
सादा जीवन ऊँचा चिन्तन ,
था आराम हराम ।
बापू तुम्हें सलाम ।

अस्त्र-शस्त्र निर्बल का सम्बल।
मन की शक्ति अपरिमित अविचल ।
पाकर ऐसी शक्ति बनें ,
हम भी अजेय अभिराम ।
बापू तुम्हें सलाम । 

भारत माँ के 'लाल 'बहादुर
उनका भी दिन दो अक्टूबर 
सूझ-बूझ नैतिक बल से  
जीते सारे संग्राम 
उनको मेरा सलाम । 


मंगलवार, 3 सितंबर 2013

मिट्टी की बात

एक था नन्हा पौधा गुलू । बहुत ही कोमल ,प्यारा और खूबसूरत । उसके हरे-भरे पत्ते बडे उल्लासमय लगते थे मानो आकाश से जान-पहचान करना चाहते हों ।
सब उसे प्यार करते थे । सूरज की पहली किरण बगिया में आकर सबसे पहले उसी का 'गुडमार्निंग' (सुप्रभात )कहती थी । हवा उसे हल्की सी थपकियाँ देकर सुलाती और कोयल बुलबुल मीठी लोरियाँ सुनातीं । हरी घास उसे नई-पुरानी कहानियाँ सुनाती थी तो बडे-बडे पेड उसे अक्सर प्यार से छेडते---"अरे गुलू मास्टर जरा जल्दी बढो न । देखो तो तुमसे बात करते हुए हमें कितना झुकना पडता है ?"
"देखा छोटा होने का लाभ ?"---गुलू चहक उठता---"मैं सबसे सिर उठा कर बात कर सकता हूँ । है न । इसलिये बडा होने में मेरी कोई दिलचस्पी नही है ।"
यह सुन कर सब हँस पडते थे । बगीचे की रौनक बढ जाती थी । इतनी खूबसूरत दुनिया, इतना प्यार पाकर गुलू को लगने लगा जैसे उसके पंख उग आए हों । 
तभी एक दिन दो लडके बगीचे में आए । उनकी नजर जैसे ही उस नन्हे पौधे पर पडी तो उसे अपने घर लगाने के लिये उखाड कर ले गए । और उसे एक क्यारी में रोप दिया । खूब पानी भी डाल दिया पर नन्हे पौधा उदास होगया । उसे यह नई जगह बिल्कुल अच्छी नही लगी । सब कुछ अनजाना और पराया सा लगा । उसे दुख हुआ कि उसे उसके घर से दूर कर दिया जहाँ वह पैदा हुआ । साथ ही गुस्सा भी बहुत आया । आखिर उसकी मर्जी जाने बिना लडकों को ऐसा करने की अनुमति दी किसने । यह तो मनमानी और दूसरों की आजादी छीनने की घटिया कोशिश । गुलू इसे क्यों  बर्दाश्त करे ? अपने साथ हुए अन्याय का विरोध करने का अधिकार सबको है । 
बस यही सब सोचा और गुलू उदास होगया । खाना-पानी लेना बन्द कर दिया । सुन्दर पत्ते मुरझा कर लटक गए । दो कोंपलें भी ,जो अभी पलकें खोल कर दुनिया देखने वालीं थीं सहम कर वहीं ठहर गई । अब कोई छोटी-मोटी बात होती तो कुछ नही था पर यह थी सबके चहेते नन्हे गुलू की उदासी व नाराजी वाली बात, सो चारों ओर बडा हडकम्प मचा । 
सबसे पहले हडबडाई--घबराई सी हवा आई । गुलू के लटके हुए पत्तों को सहला कर बोली---"क्या हुआ गुलू मास्टर । तुम्हारी हालत तो बडी खराब है । आखिर हुआ क्या है तुम्हें ?"
"क्या तुम्हें पता नही कि मुझे दो उड्डण्ड लडकों ने मेरी जगह से मुझे उखाड कर यहाँ लगा दिया है?"
"ओ...इतनी सी बात--हवा खिलखिलाई ---मैंने तो सुना कि तुम बडे बहादुर  हो । फिर क्या हुआ जो जरा सी बात पर मुँह लटका लिया । मुझे देखो न । दिनरात दुनिया का चक्कर लगाती हूँ । फूलों से भी गुजरती हूँ और सडी--गली चीजों के ढेर से भी । मैं तो दुखी नही होती । तुम्हें यों हिम्मत नही हारना चाहिये । जो कुछ हुआ उसे भूल जाओ और खुश रहो । बी हैप्पी । अच्छा चलती हूँ । मुझे तितलियों व मधुमक्खियों के फूलों का सन्देश देने जाना है ..।"
"मुझे देखो-"..--नन्हा पौधा हवा का वाक्य दोहराते हुए कहने लगा --"-जाने कहाँ--कहाँ आवारा जैसी फिरती रहती है । किसी की चिन्ता क्या करेगी । ..अरे खुशी क्या कोई बिजली का स्विच है कि दबाओ और फक् से उजाला हो जाए ।" 
"किस उजाले की बात कर रहे हो नन्हे बाबू ?"
किरण अपने रुपहले बालों को लहराती हुई आई । उसका चेहरा दिपदिपा रहा था । किसी महारानी की तरह । उसी रौब से बोली--"हमने सुना है कि आप उदास हैं । भई ये उदासी ,ये मायूसी हमें जरा भी पसन्द नही है । आप जानते हैं कि कमजोरों को दुनिया दबाती है । हमारी तरह मजबूत और ताकतवर बनो। हम एक दिन भी न दिखें या जरा नाराजी दिखादें तो हलचल मच जाती है । इसलिये  जिन्दादिल और बहादुर बनो ।खैर.., बताइयें कि हम आपके क्या काम आ सकते हैं ?"
"फिलहाल आप हमें अकेला छोड दीजिये प्लीज..।-"-गुलू ने किरण की  बातों से  उकता कर कहा ।
"जैसी आपकी इच्छा ।"---किरण लापरवाही से बोली--- "हम चलते हैं । जब जरूरी लगे बुलवा लेना । हम आपके के लिये खाना तैयार करवा देंगे ।"
"खाना तो वो खाए जिसे जीना हो --।" गुलू ने मन ही मन कहा । किरण की बातों से उसके पत्ते ज्यादा लटक गए थे । इससे तो अच्छी तो पानी की समझायश थी । उसकी बातों में कम से कम ठंडक तो थी ।  बातों में हमदर्दी  थी । बडे अपनेपन से  कहा---"अपने लिये न सही मेरे लिये ही कुछ खा लो बच्चे । ऐसे कैसे काम चलेगा ?"
लेकिन पानी की बातें  सुनकर भी गुलू को नही लगा कि यह नई जगह जीने लायक और खुश रहने लायक है ।
पास ही बरगद की डाली पर बैठी चिडियाँ कह रहीं थीं--"बेचारा गुलू ,ऐसे तो सचमुच ही मर जाएगा ।"
गुलू को भी यकीन होगया कि उसके सामने एक ही रास्ता है---मर जाना ।
यह सब देख कर मिट्टी को बडी चिन्ता हुई । उसके सामने ही एक प्यारा पौधा सूख जाए यह तो अफसोस की बात थी । उसने धीरे से पूछा---"क्या तुमने सचमुच मरने का फैसला कर लिया है गुलू ?"
"क्या तुम्हें कोई शक है ?"--- गुलू ने सवाल के जबाब में सवाल पूछा ।
"नही..नही शक तो बिल्कुल नही । पर क्या केवल इसी बात पर कि तुम्हें नई जगह लाया गया है ।
यह छोटी बात है कि कोई किसी को अपने तरीके से जीने पर मजबूर करे । क्या तुम इसे सहन कर सकती हो ?" 
"हाँ "...मिट्टी ने गहरी साँस ली । 
"हाँ यह सहन करने वाली बात होनी भी नही चाहिये ।पर किसी की ज्यादती से घबरा कर जिन्दगी को खतरे में डालना तो ठीक नही है न ।"
"मुझे कोई उपदेश नही सुनना । जाओ यहाँ से अपने काम करो । मुझे मेरे हाल पर छोडदो बस...।"
"हाय ,गुलू तुम तो बिगड रहे हो । मेरा उद्देश्य वह नही  है । मैं तो कुछ और ही बताने वाली थी ।"   
"क्या बताने वालीं थीं ? यही न कि खुश रहो । मजबूत बनो । तभी तुम बहुत से दोस्त बना सकोगे । और तभी यह दुनिया ज्यादा सुन्दर लगेगी ..। कह डालो, कह डालो ..।"
"ओफ्..ओ...मैं वह सब नही कहने वाली । मैं तो यह बताने आई हूँ कि कुछ ही दिनों में ऋतुरानी आने वाली है । हर ऋतु में वह एक बार जरूर आती है ।" 
"तो मैं क्या करूँ ?"--गुलू ने रुखाई से मिट्टी की बात काट दी ।
"अरे बाबा ,पूरी बात तो सुनो । वह खाली नही आती । साथ में रंग-बिरंगे फूलों का टोकरा भी लाती है "
"तो मुझे उससे क्या !"
"हाँ यही तो जानने वाली बात है ।"-- मिट्टी ने तसल्ली के साथ कहा---"दरअसल वह पेड--पौधों को फूल बाँटने आती है । ढेर सारे रंग -बिरंगे फूल--लाल ,पीले, नीले, सफेद ,गुलाबी, बैंगनी जोगिया....। सब उससे फूल माँगने तैयार रहते हैं । हाँ बिना माँगे वह किसी को फूल नही देती ।"
"फिर ?"---गुलू को यह जानकारी कुछ दिलचस्प लगी ।
"फिर ?..नही समझे ?" मिट्टी ने अपनेपन से कहा --"सुनो मेरा विचार था कि तुम भी अपने लिये ऋतुरानी से फूल माँग लेते । मेरी समझ में तुम पर गुलाबी फूल अच्छे लगेंगे । वही छोटी रेशमी पंखुडियों वाले..।"
फूलों का नाम सुन कर नन्हे पौधे के मन में एक लहर सी उठी । उसकी आँखों में गेंदा , गुलाब सेवन्ती और मोगरा के पौधे झूम उठे जो किस तरह खूबसूरत फूलों से लद जाते हैं । भौंरे गीत गाते हैं । मधुमक्खियाँ नाचतीं हैं । तितलियाँ उनके कानों में जाने कितनी गपशप करतीं कि फूल खिलखिलाते हुए से लगते । पौधे की जिन्दगी के सबसे खूबसूरत दिन होते हैं वे ।
"ओह ,..लेकिन मैं फूल कैसे माँग सकता हूँ । मेरी तो हालत ही खराब है ।"--नन्हे पौधे को अपनी भूल का अहसास हुआ ।
"बस यही तो मैं तुम्हें समझाने वाली हूँ । मिट्टी ने प्यार से समझाया "---ऋतुरानी हमेशा स्वस्थ व प्रसन्न पौधों को ही फूल देती है । तुम चाहो तो अब भी बात बन सकती है । अभी बिगडा ही क्या है । "
"पर कैसे ?" गुलू की आवाज में बेचैनी थी ।
"बडी आसानी से" --मिट्टी उल्लसित होकर बोली--
"दुख और गुस्सा छोडदो । और यकीनन तुम्हारे साथ ऐसा कुछ नही हुआ कि तुम जीने का ख्याल ही छोडदो । सच तो यह है कि ये लडके सुन्दर फूलों के लालच में ही तुम्हें यहाँ लाए हैं । इसलिये इनके स्नेह को स्वीकार करो । इस नई जगह पर तुम्हारा स्वागत है । जिस दिन तुम्हें फूल मिल जाएं मुझे जरूर बताना । मेरे लिये वह बेहद खुशी का दिन होगा ।"
अगली सुबह सबने देखा नन्हा गुलू खुल कर मुस्करा रहा था । मुरझाए पत्ते ताजे और प्रसन्न लग रहे थे । सहमी सोई हुई सी दो कोंपलें भी आँखें खोलने लगीं थीं ।
(एकलव्य से प्रकाशित 'मिट्टी की बात' कहानी संग्रह से ,जिसकी छह कहानियों में तीन मेरी हैं )

सोमवार, 19 अगस्त 2013

धरती गमक उठी है ।


पडी फुहारें वन आँगन में ,

भीगी धरती गमक उठी है ।

धूमिल काले कलश उठाये,

मेघराज पानी भर लाये ।
उमड--गरज कर खाली कर गये,
बीजुरिया ,लो चमक उठी है ।

आ, मयूर मतवाला नाचे ,

कोयल मीठी कविता बाँचे ।
भर-भर उमडी उफनी नदियाँ ,
इतराती सी झमक उठी हैं ।

बिछा मखमली हरा गलीचा ,

झूलों से है सजा बगीचा ।
मधुर मल्हार हवा गाती है,
हरियाली भी दमक उठी है ।

कीट-पतंगों का मेला सा ,

बीर-बहूटी का रेला सा  ।
मेंढक , झीगुर से झन्नाती ,
भीगी रातें बमक उठी हैं ।

सीले कपडे बिस्तर दादी ,

सेवईं पापड धूप दिखाती ।
जब लगता आकाश खुला है ,
सुस्त दुपहरी तमक उठी है ।