सोमवार, 6 जुलाई 2020

बिन्नी की जीत



नौ साल की बिन्नी अपने तीन भाई-बहिनों में सबसे बड़ी है . पढ़ने में तो सबसे होशियार है ही पर खेलने में भी उसका कोई मुकाबला नही है .उसे सुन्दर चीजों का शौक है .उसने अपने गुड्डे-गुड़िया बहुत ही सुन्दर सलीके से सजा रखे हैं . उसे कई तरह के फूल और कचनार के बीज इकट्ठे करना बहुत पसन्द है . उसने अपने खिलौनों में गुड्डे गुड़ियों के अलावा सुन्दर चमकीले सीप-शंखों का भण्डार इकट्ठा कर रखा है .वह बच्चों के सवाल चुटकी में हल कर देती है इसलिये सारे बच्चे ‘बिन्नी जीजी, बिन्नी जीजी’ कहते हुए उसके आगे पीछे फिरते हैं . यह बिन्नी के लिये गर्व और खुशी की बात है लेकिन पहले बिन्नी की खुशी बहुत अधूरी थी क्योंकि उसका छोटा भाई रामेन्द्र यानी रमलू उसका कट्टर विरोधी था .
बिन्नी से लगभग पाँच साल छोटा रमलू दुबला-पतला और बड़ा ही जिद्दी लड़का है .पहले जरा सी बात पर रूठना और तुनकना उसकी आदत थी . वह छोटी छोटी बातों पर ही रोने लगता था . इसलिये अक्सर उसकी नाक बहती रहती थी जिसे वह ऊपर ही सुड़कता रहता था .
बिन्नी से उसका बैर बिल्ली और चूहे जैसा था . खास बात यह थी कि दोनों की लड़ाई में चूहा बिल्ली पर हमेशा ही भारी रहता था . हर बार , हर बात में . चाहे खाने-पीने की चीजों का बँटवारा हो , या धक्का-मुक्की और मारपीट का .बिन्नी हमेशा पीछे रह जाती थी .जैसे कि माँ उनके लिये खीर या सत्तू देती तब रमलू सबसे बड़ा कटोरा लाकर माँ के सामने रख देता .
“इसे पूरा भरो तभी खाऊँगा . ” रमलू अड़ जाता .
“इतना नहीं खा पाओगे बेटा और फिर जीजी को भी तो चाहिये . है न ?”—माँ कहती पर रमलू कहाँ मानने वाला था . बिन्नी यह सोचकर खुद को समझा लेती थी कि रमलू पूरा तो खा ही नहीं सकता इसलिये बचा हुआ उसी को मिलेगा . .
इसी तरह जब पिताजी आम काटते तो रमलू पहले ही कह देता – “गुठली वाला हिस्सा मैं लूँगा .”
बिन्नी भी गुठली वाला हिस्सा ही चाहती थी . माँ समझाती कि रमलू बेवकूफ है .गुठली वाला हिस्सा खट्टा होता है और गूदा भी ज्यादा दिखता है पर उतना होता नही है . बात तो यही सही थी पर सवाल मर्जी और जिद था जो रमलू अपनी ही रखता था . बिन्नी को हर जगह मन मारकर पीछे हटना पड़ता था .
बिन्नी के पीछे हट जाने का मतलब यह नही था कि वह डरती थी या उनमें झगड़ा नही होता था . रमलू पक्का लड़ाकू था .लड़ाई का कोई बहाना नही मिलता तो वह बहाने भी तैयार कर लेता था . जैसे बिन्नी कहीं बैठकर अपना सबक याद करती तो रमलू उसी जगह जाकर जोर जोर से पढ़ता— “अ से अनार ..क से ककड़ी ..ब से बिन्नी..” इससे बिन्नी की एकाग्रता टूट जाती .
“ रामेन्द्र तू मेरे कान पर ही क्यों चिल्ला रहा है कही और जाकर पढ़ ना .?”
“क्यों जाऊँ ? मैं यहीं बैठूँगा .”
“लेकिन मैं तो यहाँ पहले से ही बैठी हूँ .”
“ तो ...क्या यहाँ तेरा नाम लिखा है ?”
रमलू बड़ी बहन से ‘तू’ कहकर बात करने लगता  . ऐसा नही था कि बिन्नी उसे सबक नही सिखा सकती थी .कभी कभी ज्यादा गुस्सा आ जाता तो जमकर उसकी धुनाई कर भी देती थी लेकिन रमलू पिटकर भी हार नही मानता था और बराबर भिड़ने तैयार रहता था .और फिर वह बड़ी सी धमकी भी दे डालता था –
“अब मुझसे कहलवा लेना जीजी और बाँधना मुझे राखी ..”
तब बिन्नी को लगता कि वह रमलू से जीत कर भी हार जाती है . बिन्नी को हारने से नहीं बल्कि रमलू के विरोध-भाव से बुरा लगता है .रमलू उसका छोटा भाई है . छोटा और प्यारा भी .जब वह चलना सीख गया था तब भी कभी कभी रास्ते में बैठ जाता था ताकि जीजी उसे गोद में ले ले . तब जीजी हुलसकर भाई को गोद में उठाकर कमर पर टिका लेती थी .चाहे खुद एक तरफ तराजू के भारी पलड़े की तरह झुकजाती थी . अब भी रमलू के प्रति उसका वैसा ही लगाव था . उसकी समझ में नही आता था कि अपने छोटे जिद्दी भाई को कैसे समझाए .
फरवरी मार्च का महीना था .इस महीने में सर्दी उसी तरह अपने बोरिया-बिस्तर समेटने लगी थी जिस तरह सर्दी का मौसम जाते ही दुकानदार गर्म कपड़ों के स्टाक को समेटकर तहखानों में रखने लगते हैं .आम और नीबू के फूल हवा को महकाने लगे थे . उधर खेतों में गेहूँ, चना,और सरसों की फसल हरी से सुनहरी होचुकी थी .और इधर जहाँ-तहाँ लावारिस से खड़े बेर की कंटीली टहनियों में खटमिट्ठे बेर सुनहरे-लाल होने लगे थे . बिन्नी के घर के पिछवाड़े में भी बेर का एक पेड़ था जो ऐसे ही सुनहरे लाल और मीठी खुशबू वाले फलों से लदा-फदा था . फलों के बोझ से इतनी टहनियाँ झुक गयी थीं कि हाथ बढ़ाकर बेर तोड़ लो .
उस समय बिन्नी बेर तोड़ रही थी . वैसे रमलू को बेर पसन्द नही हैं और कभी उधर जाता भी नहीं है पर बिन्नी कोई काम करे और रमलू न करे यह तो हो नही सकता .बस रमलू भी बेर के पेड़ के नीचे पहुँच गया और पेड़ की ओर छोटे छोटे पत्थर फेंकने लगा .
“अरे रामेन्द्र ! यह मत कर रमलू , पत्थर किसी को लग जाएगा .” बिन्नी ने समझाया पर वह अकड़कर बोला—
“जिसको डर हो वह भाग जाए .” और पत्थर के टुकड़े फेंकता रहा . तभी एक बड़ा सा टुकड़ा बिन्नी के माथे से टकराया वह ‘उई..ई…’ कहती हुई जमीन पर बैठ गई . हथेली से दबाने के बाद भी माथे पर गूलर जैसा गूमड़ उभर आया .खून भी चिमचिमा आया था . रमलू की सिट्टी-पिट्टी गुम .आज बिन्नी नही छोड़ेगी .और बिन्नी कुछ न भी करे पर पिताजी जरूर उसकी हड्डी-पसली एक कर देंगे .वैसे भी बिन्नी उनकी लाड़ली बेटी है पर चोट देखकर तो माँ भी उसकी खूब खिचाई करेंगी .रमलू सोच ही रहा था कि माँ जिन्न की तरह प्रकट होगई
और कड़ककर पूछा---“ क्यों यह चीख बिन्नी की ही थी ना ?
पर किसी को कुछ कहने की जरूरत नहीं पड़ी . उत्तर तो सामने ही था . बिन्नी माथा पकड़े बैठी थी . रमलू हल्के से अपराधबोध के साथ खामोश खड़ा था .
“अच्छा तो बात हाथापाई से आगे ईंट-पत्थर तक आ पहुँची है ! ”--- बिन्नी की माँ ने आँखों में ही सब समझ लिया और गुस्सा आसमान तक जा पहुँचा . आवेश में कुछ न सूझा तो पास ही खड़े पेड़ से एक टहनी की तोड़कर हाथ में लेकर तमतमाती हुई रमलू के करीब आई .
“आज तेरी सारी अकड़ निकाल देती हूँ .लड़की के पीछे पड़ा रहता है . नाक में दम करके रक्खा है .” इस वाक्य के साथ ही संटी हवा में लहराई— ‘सड़ाक् ‘.
रमलू बिलबिला उठा . यह देखकर बिन्नी का कलेजा बाहर निकलने को मुँह की तरफ आने लगा .झट से उठकर माँ का हाथ पकड़ लिया .
“उसे इस तरह क्यों मारती हो माँ ?”
“ इस तरह ! यह तू कह रही है ! ”...माँ ने अचरज के साथ बिन्नी को देखा और बोली ---“आज इसका फेवर मत करना बिन्नी . बहुत बिगड़ रहा है . जब देखो कोई न कोई हरकत करता ही रहता है . आज इसकी सारी हेकड़ी निकाल देती हूँ .”
माँ ने फिर संटी उठाई पर बिन्नी ने रमलू के आगे आकर कहा --
“पर माँ अभी उसकी कोई गलती नहीं है . वह तो मेरी फेंकी लकड़ी ही लौटकर मेरे माथे से आ टकराई थी .
“क्या कह रही है बिन्नी ! विश्वास तो नहीं होता .”—माँ ने सन्देह भरी नजर से बिन्नी को देखा फिर रमलू को .बिन्नी ने माँ को यकीन दिलाने के लिये बात पर जोर देकर कहा--
“तो क्या झूठ कह रही हूँ ? मेरी बात पर भरोसा तो करो माँ .
“ देख आज तू इसे छुड़वा रही है .कल मत कहना कि रमलू परेशान कर रहा है ...”
“नहीं कहूँगी .”
माँ ने एक गहरी नजर बिन्नी और रमलू पर डाली और फिर संटी को वहीं फेंककर चली गई . कुछ पल बाद बिन्नी भी जाने लगी . उसने एक बार भी रमलू को नहीं देखा .पर तभी रमलू दौड़कर आया और पीछे से दोनों हाथ बिन्नी की कमर से लपेट दिये . बिन्नी ने मुड़कर देखा .रमलू बिना कुछ बोले ही उसकी पीठ से मुँह सटाए खड़ा था जैसे अब वह कभी जीजी को छोड़ेगा नहीं .कुछ कहने की जरूरत भी नहीं थी . बिन्नी को विश्वास होगया कि उसने अपने भाई का दिल जीत लिया है और यह उसके लिये सबसे बड़ी जीत थी .

8 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार
    (10-07-2020) को
    "बातें–हँसी में धुली हुईं" (चर्चा अंक-3758)
    पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है ।

    "मीना भारद्वाज"

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  2. बचपन की खट्टी मीठी यादें
    बहुत सुंदर

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  3. वाह !दी...मर्मस्पर्शी कहानी बिन्नी की ..बालपन निश्छल होता है बिन्नी का संवेदनशील होना भाई के हृदय में संवेदना के अंकुर अँकुरित कर गया.शिक्षा परक कहानी .
    सादर

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  4. सादर नमस्कार गिरिजा दी 🙏
    आपकी ऊर्जावान और अपनत्व भरी प्रतिक्रिया के लिए असीम आभार । आपकी लेखनी का जादू खींच लाता है आपके ब्लॉग तक ..नमन आपकी लेखनी को जिससे निसृत सृजन सदैव प्रेरक होता है ।


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