गुरुवार, 23 अगस्त 2018

बादल बरसे रे ...



उमड-घमड ,घिर आये बादल,
रिमझिम बरसे रे ..
चप्पा-चप्पा भीगा ,
पत्ता-पत्ता हरसे रे ...

कल ही बोली थीं अम्मा---
लो , चिडियाँ धूल नहातीं ।
और फौज की फौज चींटियाँ,
अण्डे लेकर जातीं ।
बरसेगा अब मेह
समेटो  ,कपडे--लत्ते रे .
बादल बरसे रे ....

लगी झमाझम झडी ,
होगई लो सूरज की छुट्टी ।
मौज पेड-पौधों की होगई ,
लगी महकने मिट्टी ।
बूँदें दस्तक देतीं ,
अंकुर आँखें मलते रे.....
बादल बरसे रे .

हिलमिल बूँदें चलीं गली में ,
गलबहियाँ डाले ।
आगे चल कर मिलीं नालियाँ ,
उमड उठे नाले ।
कलकल- छलछल चले मचल,
नदिया से मिलने रे ,....

टप् टप् टप् ..औलाती ,
छप् छप् छप्...नटखट उछले ।
चम् चम्...चमके बिजली ,
तड्..तड्...तड़ बजते तबले ।
गड्-गड् गरजे मेह ,
कि जैसे सिंह दहाडे रे .....

धूम-धुँआरे कजरारे ,
प्यारे,  पावस के राजा ।
गरज-तरज तूने गर्मी का ,
ठोक बजाया बाजा ।
नाचे मोर ,पपीहा गाये ,
पीपल हरसे रे ...
उमड-घुमड घिर आये बादल ,
रिमझिम बरसे रे ..

गुरुवार, 1 मार्च 2018

खेलो ऐसी होली

रंग-उमंग
गुलाल प्रेम का ,
भरलो अपनी झोली ।
खेलो ऐसी होली .

भरो भरोसे के गहरे रंग,
अपने निश्छल मन में ।
दुश्मन को भी आज डुबादो ,
भैया अपनेपन में ।
गली-गली में धूम मचाओ,
साथ लिये हमजोली ।
खेलो ऐसी होली .

गाओ हिलमिल गीत सुरीले,
रचे प्रेम के रंग में ।
अविचल हो विश्वास आस ,
मचले उमंग अंग-अंग में ।
खुशबू बिखरे आँगन-आँगन,
बोलो ऐसी बोली।
खेलो ऐसी होली .

अपने रूठे हैं तो जाओ ,
जाकर उन्हें मनालो ।
छोड दुराग्रह ,सन्देहों की
होली चलो जलालो ।
शब्द नहीं भाषा केवल
भावों से जाए तोली ।
खेलो ऐसी होली .

पकी बालियाँ गेहूं की ,
और बौराई अमराई।
टहनी-टहनी पल्लव पीके ,
किंशुक फाग रचाई।
सुबह-शाम चुपके से,
मुस्काईं बिखेरकर रोली ।

तुम खेलो ऐसी होली .

सोमवार, 3 जुलाई 2017

बुलबुल रानी


"सुनो-सुनो ओ बुलबुल रानी
नहीं करेंगे हम शैतानी ।
जरा हमें घोंसला दिखादो,
समझो नहीं इसे मनमानी।"

"बोलो कहाँ-कहाँ से चुन कर
तिनके तुम लाती हो ।
उनको जाँच परख कर ही तुम ,
नीड़ बनाती हो ।
कितने दिन में पूरा कर लेती हो
इसे सयानी ।"

बुलबुल बोली----" देखो ,
लेकिन घर है अभी अधूरा।
तिनके बस दो-चार लगेंगे
हो जायेगा पूरा ।
फिर इसमें अण्डे सेयेंगे
हफ्ता भर दिन-रात लगेंगे
नन्हे-नन्हे प्यारे मुन्ने फिर
इसमें चहकेंगे
तब तुम सुन पाओगे उनकी
चीं..चीं.चींss---सुहानी ।"

"बुलबुल जी यह घर प्याली सा
होगा कहाँ गुजारा ।
नन्हे कैसे खेलेंगे
गायेंगे तुन-- तुन तारा
धक्का-मुक्की कर झगड़ेंगे
याद करोगी नानी ।"

बुलबुल बोली-"उन्हें घोंसले में 
रहना है तब तक ।
खुद उड़ने चुगने लायक बस
हो ना जाते जब तक ।
फिर बोलो ---क्या मुझे पड़ी जो
याद करूँगी नानी ।"
"समझ गये हम बुलबुलरानी

तुम हो बड़ी सयानी ।"

बुधवार, 4 जनवरी 2017

झरना

झर् झर् झर् झरता है झरना .
सर् सर् सर् बहता है झरना ,
पर्वत के अन्तर में पिघली ,
करुण-कथा कहता है झरना .

रात और दिन झरे निरन्तर .
धरती को जल देता भर भर.
पत्तों को हँसना सिखलाता ,
बंजर को भी करता उर्वर .
खुद ही अपनी राह बनाता ,
अपनी धुन रहता है झरना .
झर् झर् झर् झरता है झरना .

वर्षा ऋतु में इतराता है .
शरद फुहारें बिखराता है.
शीत सिकुड़ता थर् थर् थर् थर् ,
वेग जरा सा थम जाता है .
गर्मी में व्यय को सीमित कर ,
सूझ-बूझ गहता है झरना .
झर् झर् झर् झरता है झरना.

गिरिवर की कोमलता है यह
अन्तर की शीतलता है यह .
बाधाओ से ऊपर ,
आगे बढ़ने की आकुलता है यह .
कोई कितना रोके टोके ,

कब किसकी सुनता है झरना .

रविवार, 13 नवंबर 2016

पीछे-पीछे सब डिब्बों से......



आठ माह की मान्या 
नन्ही मान्या घुटनों-घुटनों
चलती किलक-किलककर!
उसे पकड़ने दौड़ पड़ा है
पीछे सारा घर!

चश्मा रखकर दौड़ीं दादी,
पुस्तक रख दादाजी,
हड़बड़-गड़बड़ पापा-मम्मी,
काम छोड़ आधा जी ,
चकराए चाचा चिल्लाए --
"रोको, अरे, सँभलकर!"
नन्ही मान्या घुटनों-घुटनों
चलती किलक-किलककर!
सबको पीछे देख, और
वह भागी तेज़ किलककर!
फूट पड़े दूधिया हँसी के
कितने प्यारे निर्झर!
उठा लिया गोदी में तो,
फिर उतरी मचल-मचलकर!
नन्ही मान्या घुटनों-घुटनों
चलती किलक-किलककर!
चटपट-चटपट गई किचन में,
सरपट-सरपट आँगन!
पीछे-पीछे सब डिब्बों से,
मान्या हो गयी इंजन!
चलती जाती ऐसे, जैसे --
घूमेगी दुनिया-भर!
नन्ही मान्या घुटनों-घुटनों
चलती किलक-किलककर!


शनिवार, 29 अक्तूबर 2016

जगमग दीप जले


गिरी अँधेरे की दीवारें ,
जगमग दीप जले .
झिलमिल झिलमिल सजी कतारें
जगमग दीप जले .

गया दशहरा जैसे ही ,
तन मन आई दीवाली .
द्वार द्वार दीवारों घर-
आँगन आई दीवाली .
हास और उल्लास ,
बीस दिन कब कैसे निकले .
गिरी अँधेरे की दीवारें,
जगमग दीप जले .

खील-बतासे पकवानों
मिष्ठान्नों के मेले हैं .
लड़ी-पटाखों नए नए
उपहारों के रेले हैं .
महल झोपड़ी क्या है ,
सबके चेहरे खिले-खिले .
गिरी अँधेरे की दीवारें ,
जगमग दीप जले .

नन्हे दीपों ने ही तम को ,
हाथों हाथ लिया है .
छुट्टी आज तुम्हारी कहकर
उसको विदा किया है .
आज उदासी और हताशा 
अपने हाथ मले .
गिरी अँधेरे की दीवारें ,
जगमग दीप जले .

पर्व और त्यौहार साल में
यों ही सभी मनाएं .
क्रिसमस ईद दिवाली होली
भर-भर खुशियाँ लाएं .
हिलमिलकर रहने हँसने का
अवसर खूब मिले .

गिरी अँधेरे की दीवारें ..
.जगमग दीप जले .  

मंगलवार, 27 सितंबर 2016

मुझको तो गाना है .

था एक अँधेरा कमरा 
कमरे में थी अलमारी .
अलमारी में रक्खे थे ,
कुछ डिब्बी-डिब्बे भारी .

डिब्बी डिब्बों के पीछे .
बैठा था आँखें मीचे .
एक काला वाला झींगुर,
सबकी नजरों से बचकर .
मन उसका था गाने का
जीभरकर झन्नाने का .

जैसे ही उसने गाया ,
चुहिया ने शोर मचाया
यह कौन बेसुरा गाता ?
कानों पर ही झन्नाता .”
चुप हो जा –चींटी बोली.”
करती छिपकली ठिठोली .
मकड़ी ने मारे ताने
यह जगह मिली है गाने ?”
बेवक्त लगे हो क्योंकर ,
मेरे भाई टन्नाने .

सुनकर खामोश हुआ वह
दो पल अफसोस हुआ यह
संगीत नही ये जानें
सुरताल नही पहचानें
पर सुझको तो गाना है .
मन सुर का दीवाना है .
यों झींगुर लगा सुनाने
अपने ही लिखें तराने.

सुनकर शन्नो घबराई
अम्मा अम्मा !”-चिल्लाई .
अम्मा की निंदिया टूटी
हाथों से पंखी छूटी .
वह झाड़ू लेकर आई
करती हूँ अभी सफाई
क्यों कहाँ छुपा झन्नाता
कानों पर ही टन्नाता .

देखा डिब्बों के पीछे
बैठा था आँखें मींचे
वो काला वाला झींगुर
सबकी नजरों से बचकर .
चिमटा से पकड़ा फेंका .
कूड़ेदानी में झौंका .
कैसे तो आजाते हैं .
कानों पर टन्नाते हैं .
यों अम्मा बोली कुढ़कर
कुछ कूड़ा डाला उसपर
ले और और ले गा ले.
बेसुरे और टन्नाले .

अम्मा फिर आकर सोगई
शन्नो सपनों में खोगई .
पर कूड़े में भी दबकर
गाता जाता था झींगुर .
हर हाल उसे गाना था .
वह सुर का दीवाना था .