मंगलवार, 16 अप्रैल 2013

दे दो बॅाल हमारी




बॅाल हमारी दे दो अम्मा ।

बात हमारी सुनलो अम्मा।

आँगन में, या छत पर होगी ।
अबकी बार और दे दोगी ,
फिर हम कभी नहीं आएंगे ।
कसम हमारी ले लो अम्मा ।
बाल हमारी दे दो अम्मा 

मंटू है उत्पाती पक्का ।

इसने ही मारा है छक्का ।
चाहो इसके कान खींचलो,
दरवाजा तो खोलो अम्मा ।
बॅाल हमारी दे दो अम्मा 


कहती हो तुम , यहाँ न खेलो।

फिर तुम कहो कहाँ हम खेलें ।
घर छोटे हैं गलियाँ सँकरी,
अब मैदान कहाँ हैं अम्मा ।
बॅाल हमारी दे दो अम्मा ।

6 टिप्‍पणियां:

  1. दीदी की कविता है न्यारी,
    सब बच्चों की प्यारी-प्यारी,
    बच्चे अपने बड़े हो गए,
    नहीं मानते बात हमारी,
    दीदी की कविता है न्यारी,
    सब बच्चों की प्यारी-प्यारी!!
    :)

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  2. बहुत सुन्दर व अच्छी शुरुआत ।

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  3. बहुत सुन्दर व अच्छी शुरुआत ।

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  4. बालपन के अहसास समेटे अच्‍छी कविता।

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