गुरुवार, 28 नवंबर 2013

जाडे आए भैया ।

सहमे -सिकुडे लगते हैं दिन ,
रातें बडी लडैया ...
जाडे आये भैया  ।

खीच-खीच सूरज की चादर,
रजनी पाँव पसारे ।
काना फूँसी करें उघारे ,
थर्..थर्..चन्दा -तारे ।
धूप बिचारी ...हारी ,
जल्दी करती  गोल बिछैया ...
जाडे आये भैया ।

लदे फदे कपडों में निकलें ,
चुन्नू-मुन्नू भाई,।
मम्मी के हाथों में नाचे ,
दिन भर ऊन-सलाई।
किट्-किट्..करते दाँत,
 कंठ से सी...सी दैया--दैया ।
जाडे आये भैया ।

ठण्डे पानी से है कट्टी,
साथी धूप सुनहली .
देर रात बैठे अलाव पर ,
करते यादें उजली ।
अनजाने से लगते हैं अब ,
नदिया ताल तलैया ।
जाडे आए भैया ।

अमरूदों ने मीठी-मीठी 
खुशबू है फैलाई।
गोभी गाजर मटर टमामर ने
बारात सजाई ।
गन्ने होगये रस की गागर ,
सरसों भूल-भुलैया ...
जाडे आये भैया ।

खेलो, खालो ,पढलो सो लो ,
अब तुम जी भर-भऱ के ।
कोई काम करो मत भैया ,
घबरा के डर-डर के ।
"सर्दी लग जायेगी"--कहते ,
हारे बेशक मैया ।
जाडे आये भैया ...।
(सन् 1994 के आसपास रचित व चकमक के सौ वे अंक में प्रकाशित)

3 टिप्‍पणियां:

  1. मेरा तो हँसते-हँसते बुरा हाल हो गया था.. आदतन मैं ज़ोर-ज़ोर से पढ़ रहा था.. और मुझे लगा कि कोई सुनेगा तो कहेगा कि ये बुढ़ापे में बच्चे बनने का शौक कहाँ से पाल लिया मैंने!! बहुत सुन्दर!!

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    1. यहाँ आपकी बात पढकर मुझे जितनी खुशी हुई है उतनी तो तब भी नही हुई थी जब इस कविता की स्वीकृति का पत्र मिला सम्पादक जी का ।

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