निकल घोंसले से सूरज के ,
चुगने
आई दाने- दुनके।
लगी
चहकने डाली-डाली ,
गौरैया
सी धूप ।
रात
गुजारी जैसे-तैसे ,
करके
पहरेदारी ।
सर्दी
सोयी है अब जाकर ,
ठिठुरी
थकी बेचारी ।
बिछी
हुई आँगन में ,
नरम
बिछैया जैसी धूप .
मौसम
के मेले में ,
छाये
ज्यों खजूर और पिस्ता ।
धूप
हुई है भुनी मूँगफली ,
गजक
करारी खस्ता ।
सूरज
के बटुआ से गिरी ,
रुपैया
जैसी धूप ।
किलक
दूधिया दाँत दिखाती ,
है गुडिया
सी धूप ।
खट्टी-मीठी चटपट चूरन की ,
पुडिया
सी धूप ।
दूर
तलैया की लहरों पर ,
है
नैया सी धूप ।
अपने गबरू को दुलारती ,
गैया जैसी धूप ।
दूध
पिलाती ,लोरी गाती ,
मैया
जैसी धूप ।
दबे
पाँव आँगन में चले ,
बिलैया
जैसी धूप ।
फुदक
रही है डाली-डाली ,
गौरैया सी धूप ।
आहा , अति मनमोहक अभिव्यक्ति।
जवाब देंहटाएंजाड़े की धूप का इतना सुंदर विश्लेषण अनूठा है।
सादर।
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नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार ६ जनवरी २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
हार्दिक धन्यवाद श्वेता जी
हटाएंनव वर्ष मंगलमय हो | सुंदर |
जवाब देंहटाएंआपको हार्दिक धन्यवाद , प्रणाम । नववर्ष आपको निरामय मंगलमय और आनन्दमय हो
हटाएंगौरैया सी धूप ----
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर
हार्दिक धन्यवाद वर्मा जी
हटाएंगिरिजा जी, मनमोहक बिंब..बहुत-बहुत प्यारी अभिव्यक्ति । धूप के उपहार के लिए धन्यवाद।
जवाब देंहटाएंनूपुरम् जी दिल से धन्यवाद
हटाएंनूपुरम् जी दिल से धन्यवाद
हटाएंबहुत सुहाती है ये गौरैया के नर्म परों सी कच्ची धूप !
जवाब देंहटाएंबड़ी प्यारी सी अभिव्यक्ति है दी, सादर .
गौरक्षा के नरम परों सी , वाह और भी मोहक उपमा । हार्दिक धन्यवाद मीना जी
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