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सोमवार, 5 जनवरी 2026

चिरैया जैसी धूप


निकल घोंसले से सूरज के ,

चुगने आई दाने- दुनके।

लगी चहकने डाली-डाली ,

गौरैया सी धूप ।

 

रात गुजारी जैसे-तैसे ,

करके पहरेदारी ।

सर्दी सोयी है अब जाकर ,

ठिठुरी थकी बेचारी ।

बिछी हुई आँगन में ,

नरम बिछैया जैसी धूप .

 

मौसम के मेले में ,

छाये ज्यों खजूर और पिस्ता ।

धूप हुई है भुनी मूँगफली ,

गजक करारी खस्ता ।

सूरज के बटुआ से गिरी ,

रुपैया जैसी धूप ।

 

किलक दूधिया दाँत दिखाती ,

है गुडिया सी धूप ।

खट्टी-मीठी चटपट चूरन की ,

पुडिया सी धूप ।

दूर तलैया की लहरों पर ,

है नैया सी धूप ।

 

अपने गबरू को दुलारती  ,

गैया जैसी धूप ।

दूध पिलाती ,लोरी गाती ,

मैया जैसी धूप ।

दबे पाँव आँगन में चले ,

बिलैया जैसी धूप ।

फुदक रही है डाली-डाली ,

गौरैया सी धूप ।

 

 

 

 

11 टिप्‍पणियां:

  1. आहा , अति मनमोहक अभिव्यक्ति।
    जाड़े की धूप का इतना सुंदर विश्लेषण अनूठा है।
    सादर।
    ------
    नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना मंगलवार ६ जनवरी २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
  2. उत्तर
    1. आपको हार्दिक धन्यवाद , प्रणाम । नववर्ष आपको निरामय मंगलमय और आनन्दमय हो

      हटाएं
  3. गौरैया सी धूप ----
    बहुत सुंदर

    जवाब देंहटाएं
  4. गिरिजा जी, मनमोहक बिंब..बहुत-बहुत प्यारी अभिव्यक्ति । धूप के उपहार के लिए धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत सुहाती है ये गौरैया के नर्म परों सी कच्ची धूप !
    बड़ी प्यारी सी अभिव्यक्ति है दी, सादर .

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  6. गौरक्षा के नरम परों सी , वाह और भी मोहक उपमा । हार्दिक धन्यवाद मीना जी

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