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रविवार, 30 मई 2021

यों लगती है प्यास

 

गर्मी रानी ,क्यों लगती है ,

तुमको इतनी प्यास ?

पी जाती हो गटक् गटागट,

दिन भर कई गिलास ।

 

मटके रीते ,रीत चले हैं ,

कूप ,नदी और ताल ।

इन्हें रोज भरते--भरते ,

धरती नानी बेहाल ।

 

कभी चाहिये शरबत तुमको ,

कभी शकंजी ,लस्सी ।

आइसक्रीम तो , अरे बाप रे...,

पूरी..... सत्तर...अस्सी ।

एक न छोड़ी बोतल फ्रिज में,

कोल्ड-ड्रिन्क खल्लास ....

गर्मी रानी क्यों लगती है ,

तुमको इतनी प्यास ।

 

"क्यों लगती है प्यास ?

न पूछो मुझसे छुटकूलाल ।"

कहते--कहते गर्मी जी का ,

चेहरा होगया लाल ।

"सर्दी ने गुड ,गजक ,बाजरा ,

 उड़द मखानी दाल ,

 तिल की टिक्की गरम मँगौड़े,

 परसे भर-भर थाल ।

मैथी के चटपटे पराँठे ,

और कचौरी खस्ता ।

भजिये ,आलू-बड़े ,समोसे,

सब कुछ कितना सस्ता ।

इतना खाया.... ,इतना खाया

पिया गया ना पानी

अब लगती है प्यास ,तभी तो ,...

पानी ,..पानी...,पानी....

और ..और ..बस पानी

रविवार, 18 अप्रैल 2021

एक अनौखी माँग

विहान अपने माता पिता की इकलौती सन्तान है . पिता विनीत बैंगलोर में एक बड़ी कम्पनी में मैनेजर हैं और माँ नीलिमा एक पत्रिका में सम्पादक है .उनका छोटा सा सुखी व सम्पन्न परिवार है .अपने पांच साल के इकलौटे बेटे के लिये उन्हों ने हर तरह की सुविधा जुटाई है . ढेर सारे नए नए किलौने , शानदार कपड़े , मनपसन्द खाना पीना , अलग कमरा तमाम किताबें , गेम्स .यानी कोई कमी नहीं . वह जो भी माँगता पापा या मम्मी ऑनलाइन मँगाकर या शनिवार रविवार को खुद बाजार जाकर तुरन्त हाजिर कर देते . विहान के लिये किसी सामान या सुविधा की कमी न थी .

एक दिन कोलकाता से विहान के मामा-मामी आए . दो-तीन दिन बैंगलोर में नीलिमा के पास रुककर उन्हें कन्याकुमारी जाना था . उनके साथ एक उनकी दो साल की प्यारी सी बेटी भी थी लिली . दो-तीन दिन घर में खूब चहल पहल रही . मामा ने विहान को कई कहानियां व चुटकुले सुनाए . मामी ने सबको रसगुल्ले बनाकर खिलाए . एक दिन लाल बाग घूमने गए और एक दिन बाजार भी गए . वे दो तीन दिन बहुत ही आनन्दमय रहे . पर विहान को सबसे ज्यादा आनन्द लिली के साथ आया . लिली भैया भैया कहती उसके आगे पीछे घूमती रहती और वह उसे कभी अपने घोड़े पर बिठाता तो कभी रिमोट वाली कार चलाकर दिखाता . लिली भी विहान के साथ खूब हिल मिल गई थी . तीन दिन बाद विहान के मामा मामी चले गए .

आज घर कितना खाली खाली सा लग रहा है .”—विनीत ने कहा .

आप कमली दीदी को बुला लें न. विहान को बुआ के साथ अच्छा लगेगा और.......”    

नीलिमा अपनी बात पूरी करती उससे पहले ही पास ही अपने चित्रों में रंग भरने बैठा विहान अचानक बोला –“मुझे एक बहन चाहिये .”

हें !! हें !!...----नीलिमा और विनीत एक साथ चौंके .

यह कौनसी नई धुन सवार होगई विहान बाबू .?”

मुझे बहन चाहिये .आपने सुना नहीं .? ” —इस बार विहान जोर से बोला यह देख विनीत और नीलिमा दोनों ही हक्के बक्के रह गए . यह तो ऐसी माँग थी जिसे न ऑनलाइन मँगाया जा सकता था न ही बाजार से खरीदा जा सकता था . पहले तो विहान ने कभी ऐसी बात नहीं कही थी . जरूर लिली के कारण उसके दिमाग में यह बात आई है .

तुम्हें बहन क्यों चाहिये विहान .

क्योंकि मुझे बहन बहुत अच्छी लगती है . मैं उसके साथ खेलूँगा ..उसे पार्क में झूला झुलाऊँगा ...बीनू , गोलू , पवन सबकी बहनें हैं . वे उनको राखी बाँधती है . टीका लगातीं हैं .मुझे भी राखी बँधवानी है .

तुम्हें बुआ वाली रौनक दीदी रखी भेजती तो है .

पर बाँधती तो नहीं ना ?”

मैं बाँध तो देती हूँ . टीका भी करती हूँ ..

तुम कोई मेरी बहन हो ..इतनी बड़ी .?

विहान थोड़ा मुस्कराया पर अगले ही पल चिल्लाकर बोला . 

मुझे बहन चाहिये अभी ..."

उसके गले की नसें फूल गईँ .आवाज भर्रा गई और आँखें भी कुछ गीली सी लगने लगीं .

विनीत और नीलिमा अब सचमुच विहान की माँग को लेकर गंभीर होगए . अचानक विनीत को अपनी ऑफिस के माली का ध्यान आया जिसकी पत्नी चार माह पहले दो साल की बच्ची को छोड़ चल बसी थी . माली खुद काफी बीमार रहता था और बच्ची को पालने में खुद को बहुत असहाय अनुभव कर रहा था .

इस तरह हुआ यह कि कुछ दिन ही बाद वे उस बच्ची को अपने साथ घर ले आए .

लो विहान बाबू आपकी बहन आ गई .

आहा , यह तो बहुत प्यारी है पापा ! क्या सच्ची में यह मेरी बहन है ?

हाँ बेटा , यह आपकी ही बहन हैं  .”

 “क्या हमारे साथ ही रहेगी हमेशा ?

और नहीं तो क्या ! यह तुम्हारी बहन है और बेशक तुम्हारे साथ ही रहेगी  ,

ओहो !...तब तो मैं इसका नाम लिली रख दूँ मम्मी ?” –विहान खुश होकर बोला .

जरूर रखो बेटा .”--- विनीत और नीलिमा ने एक साथ कहा और हँस पड़े  .

  

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

आया वसन्त

सर्दी का अन्त हुआ ,आया वसन्त .

लम्बे अब दिन हुए .उजले हैं अनछुए .

धूप नई निखरी है .पात पात बिखरी है .

उत्सव दिगन्त हुआ आया वसन्त.

 

भोर ने उतारी कुहासे की शाल अब

गुलमोहर मुट्ठी भर लाया गुलाल अब.

वैभव अनन्त हुआ ,आया वसन्त .

 

पात पात सिन्दूरी वन वन पलाश हुआ

फूली है कचनार जैसे कोई दुआ .

कविता लिखी पन्त , आया वसन्त.

 

झौर झौर बौर खिला ,पोर पोर रूप मिला

सरसों को वासन्ती , बहुरंगी सेवन्ती .

रूप आभ बेअन्त ,आया वसन्त .

 

भोर गुनगुनाती सी ,साँझ कुनमुनाती सी ,

कोयलिया तान छेड़ , हवा झनझनाती सी .

अनबन का हुआ अन्त ,आया वसन्त .

 

रूप का ही राज है , राग रंग साज है

तितली हैं फूल हैं ,फूल के दुकूल हैं .

ऋतुओं का कन्त हुआ आया वसन्त .

 

 

 

रविवार, 29 नवंबर 2020

सर्दी के दिन

 दादाजी की पगडी जैसी लम्बी रातें हैं

चुन्नू जी के चुनमुन चड्डी ,झबलों जैसे दिन

लम्बी और उबाऊ,
जटिल सवालों सी रातें
उछल-कूद और मौज-मजे की
छुट्टी जैसे दिन

जाने कब अखबार धूप का
सरकाते आँगन
जाने कब ओझल होजाते
हॅाकर जैसे दिन

जल्दी-जल्दी आउट होती
सुस्त टीम जैसे
या मुँह में रखते ही घुलती
आइसक्रीम से दिन

ढालानों से नीचे पाँव उतरते हैं जैसे
छोटे स्टेशन पर ट्रेन गुजरते जैसे दिन।

कहीं ठहर कर रहना
इनको रास नहीं आता
हाथ न आयें उड-उड जायें
तितली जैसे दिन ।

पूरब की डाली से
जैसे-तैसे उतरें भी
सन्ध्या की आहट से उडते
चिडिया जैसे दिन ।

सोमवार, 14 सितंबर 2020

अपनी खड़ी बोली

 

मिसरी की गोली

अपनी  खडी बोली ।

माँ ने दूध में है घोली

अपनी खडी बोली ।

 

सरस है ,सक्षम है

सरल और शुद्ध है

अनुभूतियों का सागर

अभिव्यक्ति में प्रबुद्ध है

संस्कृति के द्वार पर

जैसे रंगोली .

मिसरी की गोली

अपनी खडी बोली ।

 

झरना ज्यों झरता है

पवन जैसे बहता है

धरती में नमी पाकर

बीज जैसे उगता है

आता वसन्त भरे

फूलों की झोली .

मिसरी की गोली

अपनी खडी बोली ।

 

शिशु की है किलकारी .

अलकें ज्यों गभुआरी .

अन्तर की बातों सी

हिन्दी मनोहारी .

इससे ही सजती है

सपनों की डोली .

मिसरी की गोली

अपनी खड़ी बोली .

शुक्रवार, 7 अगस्त 2020

चौमासे के दिन

 बौछारों से गीले गीले ,चौमासे के दिन 

कपड़े जैसे सीले सीले ,चौमासे  के दिन .

कभी बादलों की छाया में , सोए सोए से ,

कभी धूप में चटकीले हैं ,चौमासे के दिन .

हरियाली के आँचल में मुँह ढाँपे सोजाते

धनक सिरहाने सपनीले से चौमासे के दिन .

धरती को ले आए हैं सौगातें हरी हरी ,

नदियों को तेवर गर्वीले  ,चौमासे के दिन 

मेघों के गर्जन से ,सोए बीज कुनमुनाए ,

पीके लाल और कुछ पीले   ,चौमासे के दिन .

बादल लुढ़का गिरा पेड़पर ,टूटा बिखर गया 

पत्तों के हैं नैन पनीले ,चौमासे के दिन .

सोमवार, 6 जुलाई 2020

बिन्नी की जीत



नौ साल की बिन्नी अपने तीन भाई-बहिनों में सबसे बड़ी है . पढ़ने में तो सबसे होशियार है ही पर खेलने में भी उसका कोई मुकाबला नही है .उसे सुन्दर चीजों का शौक है .उसने अपने गुड्डे-गुड़िया बहुत ही सुन्दर सलीके से सजा रखे हैं . उसे कई तरह के फूल और कचनार के बीज इकट्ठे करना बहुत पसन्द है . उसने अपने खिलौनों में गुड्डे गुड़ियों के अलावा सुन्दर चमकीले सीप-शंखों का भण्डार इकट्ठा कर रखा है .वह बच्चों के सवाल चुटकी में हल कर देती है इसलिये सारे बच्चे ‘बिन्नी जीजी, बिन्नी जीजी’ कहते हुए उसके आगे पीछे फिरते हैं . यह बिन्नी के लिये गर्व और खुशी की बात है लेकिन पहले बिन्नी की खुशी बहुत अधूरी थी क्योंकि उसका छोटा भाई रामेन्द्र यानी रमलू उसका कट्टर विरोधी था .
बिन्नी से लगभग पाँच साल छोटा रमलू दुबला-पतला और बड़ा ही जिद्दी लड़का है .पहले जरा सी बात पर रूठना और तुनकना उसकी आदत थी . वह छोटी छोटी बातों पर ही रोने लगता था . इसलिये अक्सर उसकी नाक बहती रहती थी जिसे वह ऊपर ही सुड़कता रहता था .
बिन्नी से उसका बैर बिल्ली और चूहे जैसा था . खास बात यह थी कि दोनों की लड़ाई में चूहा बिल्ली पर हमेशा ही भारी रहता था . हर बार , हर बात में . चाहे खाने-पीने की चीजों का बँटवारा हो , या धक्का-मुक्की और मारपीट का .बिन्नी हमेशा पीछे रह जाती थी .जैसे कि माँ उनके लिये खीर या सत्तू देती तब रमलू सबसे बड़ा कटोरा लाकर माँ के सामने रख देता .
“इसे पूरा भरो तभी खाऊँगा . ” रमलू अड़ जाता .
“इतना नहीं खा पाओगे बेटा और फिर जीजी को भी तो चाहिये . है न ?”—माँ कहती पर रमलू कहाँ मानने वाला था . बिन्नी यह सोचकर खुद को समझा लेती थी कि रमलू पूरा तो खा ही नहीं सकता इसलिये बचा हुआ उसी को मिलेगा . .
इसी तरह जब पिताजी आम काटते तो रमलू पहले ही कह देता – “गुठली वाला हिस्सा मैं लूँगा .”
बिन्नी भी गुठली वाला हिस्सा ही चाहती थी . माँ समझाती कि रमलू बेवकूफ है .गुठली वाला हिस्सा खट्टा होता है और गूदा भी ज्यादा दिखता है पर उतना होता नही है . बात तो यही सही थी पर सवाल मर्जी और जिद था जो रमलू अपनी ही रखता था . बिन्नी को हर जगह मन मारकर पीछे हटना पड़ता था .
बिन्नी के पीछे हट जाने का मतलब यह नही था कि वह डरती थी या उनमें झगड़ा नही होता था . रमलू पक्का लड़ाकू था .लड़ाई का कोई बहाना नही मिलता तो वह बहाने भी तैयार कर लेता था . जैसे बिन्नी कहीं बैठकर अपना सबक याद करती तो रमलू उसी जगह जाकर जोर जोर से पढ़ता— “अ से अनार ..क से ककड़ी ..ब से बिन्नी..” इससे बिन्नी की एकाग्रता टूट जाती .
“ रामेन्द्र तू मेरे कान पर ही क्यों चिल्ला रहा है कही और जाकर पढ़ ना .?”
“क्यों जाऊँ ? मैं यहीं बैठूँगा .”
“लेकिन मैं तो यहाँ पहले से ही बैठी हूँ .”
“ तो ...क्या यहाँ तेरा नाम लिखा है ?”
रमलू बड़ी बहन से ‘तू’ कहकर बात करने लगता  . ऐसा नही था कि बिन्नी उसे सबक नही सिखा सकती थी .कभी कभी ज्यादा गुस्सा आ जाता तो जमकर उसकी धुनाई कर भी देती थी लेकिन रमलू पिटकर भी हार नही मानता था और बराबर भिड़ने तैयार रहता था .और फिर वह बड़ी सी धमकी भी दे डालता था –
“अब मुझसे कहलवा लेना जीजी और बाँधना मुझे राखी ..”
तब बिन्नी को लगता कि वह रमलू से जीत कर भी हार जाती है . बिन्नी को हारने से नहीं बल्कि रमलू के विरोध-भाव से बुरा लगता है .रमलू उसका छोटा भाई है . छोटा और प्यारा भी .जब वह चलना सीख गया था तब भी कभी कभी रास्ते में बैठ जाता था ताकि जीजी उसे गोद में ले ले . तब जीजी हुलसकर भाई को गोद में उठाकर कमर पर टिका लेती थी .चाहे खुद एक तरफ तराजू के भारी पलड़े की तरह झुकजाती थी . अब भी रमलू के प्रति उसका वैसा ही लगाव था . उसकी समझ में नही आता था कि अपने छोटे जिद्दी भाई को कैसे समझाए .
फरवरी मार्च का महीना था .इस महीने में सर्दी उसी तरह अपने बोरिया-बिस्तर समेटने लगी थी जिस तरह सर्दी का मौसम जाते ही दुकानदार गर्म कपड़ों के स्टाक को समेटकर तहखानों में रखने लगते हैं .आम और नीबू के फूल हवा को महकाने लगे थे . उधर खेतों में गेहूँ, चना,और सरसों की फसल हरी से सुनहरी होचुकी थी .और इधर जहाँ-तहाँ लावारिस से खड़े बेर की कंटीली टहनियों में खटमिट्ठे बेर सुनहरे-लाल होने लगे थे . बिन्नी के घर के पिछवाड़े में भी बेर का एक पेड़ था जो ऐसे ही सुनहरे लाल और मीठी खुशबू वाले फलों से लदा-फदा था . फलों के बोझ से इतनी टहनियाँ झुक गयी थीं कि हाथ बढ़ाकर बेर तोड़ लो .
उस समय बिन्नी बेर तोड़ रही थी . वैसे रमलू को बेर पसन्द नही हैं और कभी उधर जाता भी नहीं है पर बिन्नी कोई काम करे और रमलू न करे यह तो हो नही सकता .बस रमलू भी बेर के पेड़ के नीचे पहुँच गया और पेड़ की ओर छोटे छोटे पत्थर फेंकने लगा .
“अरे रामेन्द्र ! यह मत कर रमलू , पत्थर किसी को लग जाएगा .” बिन्नी ने समझाया पर वह अकड़कर बोला—
“जिसको डर हो वह भाग जाए .” और पत्थर के टुकड़े फेंकता रहा . तभी एक बड़ा सा टुकड़ा बिन्नी के माथे से टकराया वह ‘उई..ई…’ कहती हुई जमीन पर बैठ गई . हथेली से दबाने के बाद भी माथे पर गूलर जैसा गूमड़ उभर आया .खून भी चिमचिमा आया था . रमलू की सिट्टी-पिट्टी गुम .आज बिन्नी नही छोड़ेगी .और बिन्नी कुछ न भी करे पर पिताजी जरूर उसकी हड्डी-पसली एक कर देंगे .वैसे भी बिन्नी उनकी लाड़ली बेटी है पर चोट देखकर तो माँ भी उसकी खूब खिचाई करेंगी .रमलू सोच ही रहा था कि माँ जिन्न की तरह प्रकट होगई
और कड़ककर पूछा---“ क्यों यह चीख बिन्नी की ही थी ना ?
पर किसी को कुछ कहने की जरूरत नहीं पड़ी . उत्तर तो सामने ही था . बिन्नी माथा पकड़े बैठी थी . रमलू हल्के से अपराधबोध के साथ खामोश खड़ा था .
“अच्छा तो बात हाथापाई से आगे ईंट-पत्थर तक आ पहुँची है ! ”--- बिन्नी की माँ ने आँखों में ही सब समझ लिया और गुस्सा आसमान तक जा पहुँचा . आवेश में कुछ न सूझा तो पास ही खड़े पेड़ से एक टहनी की तोड़कर हाथ में लेकर तमतमाती हुई रमलू के करीब आई .
“आज तेरी सारी अकड़ निकाल देती हूँ .लड़की के पीछे पड़ा रहता है . नाक में दम करके रक्खा है .” इस वाक्य के साथ ही संटी हवा में लहराई— ‘सड़ाक् ‘.
रमलू बिलबिला उठा . यह देखकर बिन्नी का कलेजा बाहर निकलने को मुँह की तरफ आने लगा .झट से उठकर माँ का हाथ पकड़ लिया .
“उसे इस तरह क्यों मारती हो माँ ?”
“ इस तरह ! यह तू कह रही है ! ”...माँ ने अचरज के साथ बिन्नी को देखा और बोली ---“आज इसका फेवर मत करना बिन्नी . बहुत बिगड़ रहा है . जब देखो कोई न कोई हरकत करता ही रहता है . आज इसकी सारी हेकड़ी निकाल देती हूँ .”
माँ ने फिर संटी उठाई पर बिन्नी ने रमलू के आगे आकर कहा --
“पर माँ अभी उसकी कोई गलती नहीं है . वह तो मेरी फेंकी लकड़ी ही लौटकर मेरे माथे से आ टकराई थी .
“क्या कह रही है बिन्नी ! विश्वास तो नहीं होता .”—माँ ने सन्देह भरी नजर से बिन्नी को देखा फिर रमलू को .बिन्नी ने माँ को यकीन दिलाने के लिये बात पर जोर देकर कहा--
“तो क्या झूठ कह रही हूँ ? मेरी बात पर भरोसा तो करो माँ .
“ देख आज तू इसे छुड़वा रही है .कल मत कहना कि रमलू परेशान कर रहा है ...”
“नहीं कहूँगी .”
माँ ने एक गहरी नजर बिन्नी और रमलू पर डाली और फिर संटी को वहीं फेंककर चली गई . कुछ पल बाद बिन्नी भी जाने लगी . उसने एक बार भी रमलू को नहीं देखा .पर तभी रमलू दौड़कर आया और पीछे से दोनों हाथ बिन्नी की कमर से लपेट दिये . बिन्नी ने मुड़कर देखा .रमलू बिना कुछ बोले ही उसकी पीठ से मुँह सटाए खड़ा था जैसे अब वह कभी जीजी को छोड़ेगा नहीं .कुछ कहने की जरूरत भी नहीं थी . बिन्नी को विश्वास होगया कि उसने अपने भाई का दिल जीत लिया है और यह उसके लिये सबसे बड़ी जीत थी .