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शुक्रवार, 7 अगस्त 2020

चौमासे के दिन

 बौछारों से गीले गीले ,चौमासे के दिन 

कपड़े जैसे सीले सीले ,चौमासे  के दिन .

कभी बादलों की छाया में , सोए सोए से ,

कभी धूप में चटकीले हैं ,चौमासे के दिन .

हरियाली के आँचल में मुँह ढाँपे सोजाते

धनक सिरहाने सपनीले से चौमासे के दिन .

धरती को ले आए हैं सौगातें हरी हरी ,

नदियों को तेवर गर्वीले  ,चौमासे के दिन 

मेघों के गर्जन से ,सोए बीज कुनमुनाए ,

पीके लाल और कुछ पीले   ,चौमासे के दिन .

बादल लुढ़का गिरा पेड़पर ,टूटा बिखर गया 

पत्तों के हैं नैन पनीले ,चौमासे के दिन .

सोमवार, 6 जुलाई 2020

बिन्नी की जीत



नौ साल की बिन्नी अपने तीन भाई-बहिनों में सबसे बड़ी है . पढ़ने में तो सबसे होशियार है ही पर खेलने में भी उसका कोई मुकाबला नही है .उसे सुन्दर चीजों का शौक है .उसने अपने गुड्डे-गुड़िया बहुत ही सुन्दर सलीके से सजा रखे हैं . उसे कई तरह के फूल और कचनार के बीज इकट्ठे करना बहुत पसन्द है . उसने अपने खिलौनों में गुड्डे गुड़ियों के अलावा सुन्दर चमकीले सीप-शंखों का भण्डार इकट्ठा कर रखा है .वह बच्चों के सवाल चुटकी में हल कर देती है इसलिये सारे बच्चे ‘बिन्नी जीजी, बिन्नी जीजी’ कहते हुए उसके आगे पीछे फिरते हैं . यह बिन्नी के लिये गर्व और खुशी की बात है लेकिन पहले बिन्नी की खुशी बहुत अधूरी थी क्योंकि उसका छोटा भाई रामेन्द्र यानी रमलू उसका कट्टर विरोधी था .
बिन्नी से लगभग पाँच साल छोटा रमलू दुबला-पतला और बड़ा ही जिद्दी लड़का है .पहले जरा सी बात पर रूठना और तुनकना उसकी आदत थी . वह छोटी छोटी बातों पर ही रोने लगता था . इसलिये अक्सर उसकी नाक बहती रहती थी जिसे वह ऊपर ही सुड़कता रहता था .
बिन्नी से उसका बैर बिल्ली और चूहे जैसा था . खास बात यह थी कि दोनों की लड़ाई में चूहा बिल्ली पर हमेशा ही भारी रहता था . हर बार , हर बात में . चाहे खाने-पीने की चीजों का बँटवारा हो , या धक्का-मुक्की और मारपीट का .बिन्नी हमेशा पीछे रह जाती थी .जैसे कि माँ उनके लिये खीर या सत्तू देती तब रमलू सबसे बड़ा कटोरा लाकर माँ के सामने रख देता .
“इसे पूरा भरो तभी खाऊँगा . ” रमलू अड़ जाता .
“इतना नहीं खा पाओगे बेटा और फिर जीजी को भी तो चाहिये . है न ?”—माँ कहती पर रमलू कहाँ मानने वाला था . बिन्नी यह सोचकर खुद को समझा लेती थी कि रमलू पूरा तो खा ही नहीं सकता इसलिये बचा हुआ उसी को मिलेगा . .
इसी तरह जब पिताजी आम काटते तो रमलू पहले ही कह देता – “गुठली वाला हिस्सा मैं लूँगा .”
बिन्नी भी गुठली वाला हिस्सा ही चाहती थी . माँ समझाती कि रमलू बेवकूफ है .गुठली वाला हिस्सा खट्टा होता है और गूदा भी ज्यादा दिखता है पर उतना होता नही है . बात तो यही सही थी पर सवाल मर्जी और जिद था जो रमलू अपनी ही रखता था . बिन्नी को हर जगह मन मारकर पीछे हटना पड़ता था .
बिन्नी के पीछे हट जाने का मतलब यह नही था कि वह डरती थी या उनमें झगड़ा नही होता था . रमलू पक्का लड़ाकू था .लड़ाई का कोई बहाना नही मिलता तो वह बहाने भी तैयार कर लेता था . जैसे बिन्नी कहीं बैठकर अपना सबक याद करती तो रमलू उसी जगह जाकर जोर जोर से पढ़ता— “अ से अनार ..क से ककड़ी ..ब से बिन्नी..” इससे बिन्नी की एकाग्रता टूट जाती .
“ रामेन्द्र तू मेरे कान पर ही क्यों चिल्ला रहा है कही और जाकर पढ़ ना .?”
“क्यों जाऊँ ? मैं यहीं बैठूँगा .”
“लेकिन मैं तो यहाँ पहले से ही बैठी हूँ .”
“ तो ...क्या यहाँ तेरा नाम लिखा है ?”
रमलू बड़ी बहन से ‘तू’ कहकर बात करने लगता  . ऐसा नही था कि बिन्नी उसे सबक नही सिखा सकती थी .कभी कभी ज्यादा गुस्सा आ जाता तो जमकर उसकी धुनाई कर भी देती थी लेकिन रमलू पिटकर भी हार नही मानता था और बराबर भिड़ने तैयार रहता था .और फिर वह बड़ी सी धमकी भी दे डालता था –
“अब मुझसे कहलवा लेना जीजी और बाँधना मुझे राखी ..”
तब बिन्नी को लगता कि वह रमलू से जीत कर भी हार जाती है . बिन्नी को हारने से नहीं बल्कि रमलू के विरोध-भाव से बुरा लगता है .रमलू उसका छोटा भाई है . छोटा और प्यारा भी .जब वह चलना सीख गया था तब भी कभी कभी रास्ते में बैठ जाता था ताकि जीजी उसे गोद में ले ले . तब जीजी हुलसकर भाई को गोद में उठाकर कमर पर टिका लेती थी .चाहे खुद एक तरफ तराजू के भारी पलड़े की तरह झुकजाती थी . अब भी रमलू के प्रति उसका वैसा ही लगाव था . उसकी समझ में नही आता था कि अपने छोटे जिद्दी भाई को कैसे समझाए .
फरवरी मार्च का महीना था .इस महीने में सर्दी उसी तरह अपने बोरिया-बिस्तर समेटने लगी थी जिस तरह सर्दी का मौसम जाते ही दुकानदार गर्म कपड़ों के स्टाक को समेटकर तहखानों में रखने लगते हैं .आम और नीबू के फूल हवा को महकाने लगे थे . उधर खेतों में गेहूँ, चना,और सरसों की फसल हरी से सुनहरी होचुकी थी .और इधर जहाँ-तहाँ लावारिस से खड़े बेर की कंटीली टहनियों में खटमिट्ठे बेर सुनहरे-लाल होने लगे थे . बिन्नी के घर के पिछवाड़े में भी बेर का एक पेड़ था जो ऐसे ही सुनहरे लाल और मीठी खुशबू वाले फलों से लदा-फदा था . फलों के बोझ से इतनी टहनियाँ झुक गयी थीं कि हाथ बढ़ाकर बेर तोड़ लो .
उस समय बिन्नी बेर तोड़ रही थी . वैसे रमलू को बेर पसन्द नही हैं और कभी उधर जाता भी नहीं है पर बिन्नी कोई काम करे और रमलू न करे यह तो हो नही सकता .बस रमलू भी बेर के पेड़ के नीचे पहुँच गया और पेड़ की ओर छोटे छोटे पत्थर फेंकने लगा .
“अरे रामेन्द्र ! यह मत कर रमलू , पत्थर किसी को लग जाएगा .” बिन्नी ने समझाया पर वह अकड़कर बोला—
“जिसको डर हो वह भाग जाए .” और पत्थर के टुकड़े फेंकता रहा . तभी एक बड़ा सा टुकड़ा बिन्नी के माथे से टकराया वह ‘उई..ई…’ कहती हुई जमीन पर बैठ गई . हथेली से दबाने के बाद भी माथे पर गूलर जैसा गूमड़ उभर आया .खून भी चिमचिमा आया था . रमलू की सिट्टी-पिट्टी गुम .आज बिन्नी नही छोड़ेगी .और बिन्नी कुछ न भी करे पर पिताजी जरूर उसकी हड्डी-पसली एक कर देंगे .वैसे भी बिन्नी उनकी लाड़ली बेटी है पर चोट देखकर तो माँ भी उसकी खूब खिचाई करेंगी .रमलू सोच ही रहा था कि माँ जिन्न की तरह प्रकट होगई
और कड़ककर पूछा---“ क्यों यह चीख बिन्नी की ही थी ना ?”
पर किसी को कुछ कहने की जरूरत नहीं पड़ी . उत्तर तो सामने ही था . बिन्नी माथा पकड़े बैठी थी . रमलू हल्के से अपराधबोध के साथ खामोश खड़ा था .
“अच्छा तो बात हाथापाई से आगे ईंट-पत्थर तक आ पहुँची है ! ”--- बिन्नी की माँ ने आँखों में ही सब समझ लिया और गुस्सा आसमान तक जा पहुँचा . आवेश में कुछ न सूझा तो पास ही खड़े पेड़ से एक टहनी की तोड़कर हाथ में लेकर तमतमाती हुई रमलू के करीब आई .
“आज तेरी सारी अकड़ निकाल देती हूँ .लड़की के पीछे पड़ा रहता है . नाक में दम करके रक्खा है .” इस वाक्य के साथ ही संटी हवा में लहराई— ‘सड़ाक् ‘.
रमलू बिलबिला उठा . यह देखकर बिन्नी का कलेजा बाहर निकलने को मुँह की तरफ आने लगा .झट से उठकर माँ का हाथ पकड़ लिया .
“उसे इस तरह क्यों मारती हो माँ ?”
“ इस तरह ! यह तू कह रही है ! ”...माँ ने अचरज के साथ बिन्नी को देखा और बोली ---“आज इसका फेवर मत करना बिन्नी . बहुत बिगड़ रहा है . जब देखो कोई न कोई हरकत करता ही रहता है . आज इसकी सारी हेकड़ी निकाल देती हूँ .”
माँ ने फिर संटी उठाई पर बिन्नी ने रमलू के आगे आकर कहा --
“पर माँ अभी उसकी कोई गलती नहीं है . वह तो मेरी फेंकी लकड़ी ही लौटकर मेरे माथे से आ टकराई थी .
“क्या कह रही है बिन्नी ! विश्वास तो नहीं होता .”—माँ ने सन्देह भरी नजर से बिन्नी को देखा फिर रमलू को .बिन्नी ने माँ को यकीन दिलाने के लिये बात पर जोर देकर कहा--
“तो क्या झूठ कह रही हूँ ? मेरी बात पर भरोसा तो करो माँ .
“ देख आज तू इसे छुड़वा रही है .कल मत कहना कि रमलू परेशान कर रहा है ...”
“नहीं कहूँगी .”
माँ ने एक गहरी नजर बिन्नी और रमलू पर डाली और फिर संटी को वहीं फेंककर चली गई . कुछ पल बाद बिन्नी भी जाने लगी . उसने एक बार भी रमलू को नहीं देखा .पर तभी रमलू दौड़कर आया और पीछे से दोनों हाथ बिन्नी की कमर से लपेट दिये . बिन्नी ने मुड़कर देखा .रमलू बिना कुछ बोले ही उसकी पीठ से मुँह सटाए खड़ा था जैसे अब वह कभी जीजी को छोड़ेगा नहीं .कुछ कहने की जरूरत भी नहीं थी . बिन्नी को विश्वास होगया कि उसने अपने भाई का दिल जीत लिया है और यह उसके लिये सबसे बड़ी जीत थी .

रविवार, 28 जून 2020

छोटी चिड़िया


उस समय पूरब के आसमान में लालिमा फैल गई थी . चिड़ियाँ भी अपने अपने नीड़ छोड़कर दाने की तलाश में उड़ गईँ थीं . बिरज माँ घर-आँगन बुहार चुकी थी और पिता गाय बैलों को चारा-पानी डाल चुके थे पर बिरज और मुन्नी अभी भी गहरी नींद में सोये पड़े थे .
"बिरज ! ओ बेटा बिरजू ! उठ ,रखवाली के लिये खेतों पर नही जाना क्या ?"

बिरज के पिता ने उसे झकझोर कर जगाया .
“जाता हूँ बापू .”–कहकर बिरज ने उठने का बहाना किया और बापू के वहाँ से जाते ही फिर सोगया . नींद का भी गज़ब हाल है कि ऐन जागने के समय ज्यादा गहरी और मीठी होजाती है . सपने भी खास तौरपर इसी समय आते हैं .चलते फिरते जागते से सपने जिन्हें बिस्तर में पड़े-पड़े देखना अच्छा लगता है .बिरज भी जरूर ऐसे ही कुछ सपने देख रहा होगा . लेकिन वह इस तरह सोते हुए ज्यादा देर तक खटिया में पडा न रह सका । दूसरी बार तो उसकी माँ ने आकर उसे उठाकर बिठा ही दिया और मुँह पर पानी के चार छींटे मारकर बोली ---"अभी तक नींद नही खुल रही तेरी ‘कुम्भकरन ! जब चिड़ियाँ आधा खेत चौपट कर देंगी तब जाएगा क्या ?"
“जब देखो हर काम के लिये सब मुझे ही रगेदते रहते हैं . मुन्नी महारानी से तो कोई कुछ कहता ही नहीं . मैडम जी चाहे जब तक सोती रहें . न खेतों पर जाना पडे और न स्कूल का झंझट । कितना अच्छा होता कि मैं मुन्नी की जगह होता और मुन्नी मेरी जगह ---बिरज आँखें मलते--मलते भनभनाया ।
“बेटा तू बड़ा है और जिम्मेदार भी . मुन्नी तेरी उमर की होगी तब देखना उसे भी ऐसे ही काम करने पड़ेंगे . मेरा राजा बेटा ..सारे काम तो मेरा बिरजू ही करता है .” ..माँ ने लाड़ दिखाया तो बिरज ने उठकर जल्दी से हाथ-मुँह धोया , कपड़े में अचार के साथ दो रोटियाँ लपेटीं और खेतों की ओर दौडा ।

सितम्बर का महीना था । आसमान साफ था । चिड़ियाँ चहचहाती हुई कहीं उडी जारही थी। आम के पेड के पीछे से सूरज धीरे धीरे 
ऊपर उठ रहा था जैसे किसी ने बडी लाल गेंद लुढ़का दी हो । सुबह-सुबह घास पर ओस की बूँदें झिलमिला रहीं थीं। बाडों पर तोरई की बेलों में पीले फूल मुस्करा रहे थे । तिल के सफेद फूलों की जगह छोटी छोटी फलियों ने ले ली थी . आसपास गन्ने के खेतों से मीठी सुगन्ध आ रही थी। सुबह की ठण्डी हवा में ज्वार और बाजरे की रुपहली सी दूधिया बालें झूमती हुई बहुत सुन्दर लग रहीं थीं । रज्जू के मन में अपने खेतों की शोभा पर बडा प्यार उमडा। यह शोभा बापू जैसे ही दूसरे कई लोगों की दिन-रात की मेहनत का नतीजा है।रज्जन खुद अपने बापू के साथ खेतों में काम करता है । बापू कहते हैं किधरती अपनी मैया जैसी है . एक बीज के पचास बीज तक करके लौटा देती है .बिना स्वाभव की तासीर ,रंग और स्वाद बदले .
इस तरह चारों ओर देखते और खुद से बतियाते बिरज कब अपने खेत पर पहुँच गया पता ही न चला . उस समय झुण्ड की झुण्ड काली ,भूरी, तोतिया ,पीली ,नीली चिड़ियाँ बाजरे की बालों पर झूल रहीं थीं और मजे में दूधिया दाने निकाल रही थीं .चारों ओर चहचहाहट और कल्लोल मची हुई थी .
"अच्छा ! तो यह बात है । अम्मा की नाराजी सही थी . देखो तो महारानियाँ खेत में ऐसे जमी हैं जैसे हमने इनके लिये ही तो जोत-बोकर फसल तैयार की है .—बिरज ने सोचा फिर चेतावनी के लहजे में कहा --लेकिन समझलो कि यह कोई मुफ्त का माल नहीं जो तुमने लूट मचा रखी है भुक्खड़ो!"–यह कहकर उसने अपनी ‘गोफिन’ को सम्हाला और बहुत सारे कंकड पत्थर के छोटे टुकड़े और मिट्टी के ढेले समेटकर मचान पर चढ गया। जो उसने गोफिन में कंकड रखकर गोफिन को घुमाते हुए गोली की तरह कंकड छोडा तो 'फुर्र' की तेज आवाज के साथ ही बेशुमार चिड़ियाँ एक साथ उडीं।
“देखो तो ...बापू सही बोल रहे थे . ये तो सचमुच फसल को चौपट कर देतीं .”-- बिरज ने कहा और फिर बैठकर पास ही रखा पुराना कनस्तर बजाने व गाने लगा --"ओ हरी हरी अमियां हरिया कुतर गए ...।"
कुछ देर गाने के बाद वहचुप होगया और मचान पर बैठे बैठे शान्त होकर चारों ओर धरती पर टिके गोल कटोरा जैसे आसमान को देखने लगा . सोच रहा था कि वह जगह कैसी होगी जहाँ यह नीला आसमान टिका होगा धरती वहीं तक तो होगी . बापू कहते हैं कि धरती का कोई छोर नही है .कैसे नही है .
“अरे बिरजू !कौनसी दुनिया में खोया है ?”—मेड़ पर जाते हुए सुन्दर काका ने टोका .
“रखवाली खेत की हो रही है कि चिरैयों की ?समझ ले ,आज शाम को तेरी अच्छी धुनाई होने वाली है .”
“हें.!! ”..बिरज जैसे एकदम जागा .उसे सचमुच अपनी भूल का अहसास हुआ . सारा खेत फिर चिड़ियों से भर गया था .बाजरे के दूधिया दानों को बड़ी तल्लीनता के साथ लगीं थीं मजे में खाने ..
“अरी बेशरमो ! मेरी बात एक बार समझ में नहीं आई तुम्हें ? तो लो फिर से खेत में आने का मजा चखो .”--उसने मारे गुस्सा के फिर गोफिन उठाई और घुमा-घुमाकर तीन-चार बार चारों तरफ कंकड़ और ढेले फेंके । कंकड़ तीर की तरह सनसनाते हुए चारों तरफ गिरे और उसके साथ ही चिड़ियों का झुण्ड फुर्र् से फिर उड़ा.इससे पहले कि शरारती बच्चों की तरह बिरज को चिढ़ाती हुई वे फिर पौधों पर आकर झूलें .वह भी देर लगातार कंकड़ फेंकता रहा .इसके बाद चिड़ियाँ आसपास मँडराती रहीं पर खेत में नहीं आईं .लेकिन एक छोटी सी चिड़िया वहीं पास दाना चुनने में तल्लीन थी . मचान के पास होने के कारण कंकड़ की मार उस तक नहीं पहुँच रही थी . पहुँच भी रही होगी तो उस पर खास असर नही हो रहा होगा या फिर उसे परवाह ही नहीं होगी । बिरज का ध्यान उस पीले-मटमैले रंग की एक छोटी सी चिड़िया पर अटककर रह गया .वह उड़-उड़ाकर जल्दी ही फिर से बाजरे की किसी बाली पर आ बैठती थी . बिरज ने एक बार उसी पर कंकड़ फेंका . वह उड़ तो गई लेकिन उड़ने का बहाना सा करके फिर कच्चे दूधिया दानों वाली रुपहली बालपरआ बैठी .
“बड़ी ढीठ और बेसरम चिड़िया है . क्या अभी तक इसका पेट नही भरा होगा ?जरा सा पेट ,और कितना खाएगी ?.”–बिरज को खीज हुई वह एक बार और बड़ा सा कंकड़ फेंकने ही जा रहा था कि कुछ सोचकर रुक गया और ध्यान से उसे देखने लगा . वह बहुत जल्दी जल्दी चोंच चलाकर कुछ दाने लेकर उड़ जाती और कुछ ही देर में वापस आकर किसी बाल पर बैठ जाती .
देखना चाहिये कि आखिर सारा दाना कहाँ लेकर जा रही है?और किसके लिये? ---बिरज की जिज्ञासा तेज हुई तो वह चिड़िया का पीछा करता हुआ खेत के कोने पर खड़े नीम के पेड़ तक पहुँच गया .उसने देखा कि चिड़िया पास ही खड़े एक शीशम के पेड़ की टहनियों के झुरमुट में कहीं किसी टहनी पर बैठ गई है । इसके साथ ही घोंसला में चींचीं..चींचीं की आवाजें उभरीं ।
"अरे वाह ! वहाँ तो घोंसला है और उसमें बच्चे भी हैं शायद. इसे तो देखना होगा ."
वह नीम की डाली पर चुपचाप दबे पाँव चढ गया और वहाँ से झाँककर देखा कि शीशम के झुरमुट में बने छोटे से घोंसले में तीन-चार चोंचें खुलीं हैं और बेसब्री के साथ माँ से दाना माँग रहीं हैं । आगे बढ बढ़कर , चोंच खोल खोलकर ।
"आ हा "—बिरज का मन खिल उठा .
" अच्छा तो बाजरे के दूधिया दाने यह अपने बच्चों के लिये ला रही थी ! ये बच्चे भी तो हमारी तरह ही खाने की चीजों पर झपट रहे हैं । हमारी तरह ही शिकायत करते हैं कि माँ तुमने मुन्नी को ज्यादा दिया है। माँ तुम मुझे हमेशा बाद में देती हो। और कम भी..."
बिरज को लगा कि चिड़िया माँ की तरह ही उन्हें समझा रही है--"धीरज रखो मेरे बच्चो! हमारे पास इस समय खूब सारा भोजन है ।पास ही खेत में स्वादिष्ट दूधिया दानों का भण्डार है । तुम जितना चाहो खा सकते हो।"
इसके साथ ही बिरज को महसूस हुआ कि चिड़िया अफसोस भी कर रही है--"लेकिन एक लड़का है न ,बार-बार भगा देता है । ठीक से दाना निकाल भी नही पाती कि चिल्ला उठता है । कंकड़ मारता है ।"
बिरज को यह सोच कर ग्लानि का अनुभव हुआ । उसने चिड़ियों को बिल्कुल दाना चुगने नहीं दिया . चिड़ियाँ अपना पेट कहाँ से भरें और कैसे भरें । उनके कोई खेत या नौकरी तो है नही। और उनका नन्हा सा पेट । आखिर कितना खाएंगी!
इसके बाद उसने सारे कंकड़ फेंक दिये औरदेर तक उस छोटी चिड़िया का चुगना-चुगाना देखता रहा । 
चकमक नवम्बर 1988 में प्रकाशित
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मंगलवार, 5 मई 2020

सबसे सुन्दर


एक छोटी सी नदी के किनारे एक बड़ा सा बगीचा फैला हुआ था .बगीचे में कई तरह के पेड़ थे .आम, कटहल, अमरूद ,सन्तरा ,कचनार ,गुलमोहर,चम्पक ,मौलश्री ,नीम आँवला आदि ..बीच-बीच में मोगरा गुलाब ,हरसिंगार, गेंदा ,रातरानी जैसे सुन्दर और सुगन्धित फूलों वाले पौधों की कतारें करीने से सजी हुईं थीं . इसी बगीचे के एक कोने में ठीक नदी के किनारे एक बबूल का पेड़ जाने कब उगा और चुपचाप बड़ा होने लगा .जब तक वह छोटा ,एक झाड़ी की शक्ल में था तब तक तो उस तरफ किसी का ध्यान नही गया लेकिन जैसे ही वह चाँदनी और गुड़हल से ऊँचा उठकर अमरूद की बराबरी करने लगा तो बगीचे के तमाम पेड़ों को वह अखरने लगा .हर कोई सोचने लगा --इतने शानदार बगीचे में यह फालतू सा पेड़ कहाँ से आगया .
“अरे यह देखने में भद्दा सा है बल्कि खास काम का भी नही है .”--आम का पेड़ बोला .उसे अपने पत्तों ,बौर ,फल और घनी छाँव पर बड़ा गर्व था . 
नीम के पेड़ ने आम की बात का समर्थन किया .बोला—
"हमारा इसका कोई मुकाबला ही नही है .हमारे साथ न इसके पत्ते गिरते हैं न ही नए पत्ते आते हैं. और न ही हमारे जैसी छाँव है . भरी गर्मियों में बिना पत्तों के किसी जिद्दी बच्चे सा लगता है जिसे कपड़े पहनना पसन्द नहीं."
“ और नहीं तो क्या, इसके पत्तों का रंग तो देखो ,जैसे रंग कम पड़ने पर चित्रकार ने चित्र में फीका ही रंग भर दिया हो .”--कचनार अपनी कल्पना पर खुद ही खुश होकर बोला . तब गुलमोहर कैसे चुप रहता .अपने लाल-नारंगी खूलों के खूबसूरत गुच्छों पर इतराते हुए बोला—
”इसके फूल देखे हैं . छोटी-छोटी बुँदकियों जैसे पीले फूलों के नाम 
पर एकदम मजाक हैं .”
“तो फिर सबसे मजेदार बात मुझसे सुनो  .”—अमरूद के पेड़ ने कुछ इस तरह कहा कि सबका ध्यान उसी की तरफ खिंच गया .
" हम सब जहाँ फूलों के साथ ही फलों की तैयारी करते हैं ,ये महाशय फूलकर फूले रहते हैं , फलने का ध्यान आता है कम से कम छह-सात महीने बाद .लोग इसी के बारे में तो कहते हैं--सावन फूलै चैत फलै . 
इस बात पर सबने तालियाँ बजाईं .
तो फल कौनसे मीठे या रस भरे होते हैं .--सन्तरा बोला --फलों के नाम रूखी बेस्वाद फलियाँ आतीं हैं जिन्हें बकरियों के अलावा जो बेचारी अचरा-कचरा सब खा लेतीं हैं ,कोई पसन्द नही करता .
बबूल का पेड़ अभी तक इन सारी बातों से अनजान था और आसपास की दुनिया को देखकर बहुत खुश था .नीचे बहती छोटी नदी उसके फूलों को पसन्द करती थी ,जो सीधे गिरकर उसकी धारा में बहते थे .लेकिन धीरे-धीरे उसे महसूस होने लगा कि वह इन सबसे अलग है . बदसूरत और बेकार .कोई चिड़िया उसके पास नहीं आती थी . एक दिन जब उसने गौरैया को पुकारा तो उसने टका सा जबाब दिया --
"मैं नही आ सकती . मुझे तुम्हारे काँटों से डर लगता है ."

बुलबुल ने कहा—"मुझे तुम्हारे फूल पसन्द नही हैं ."
कोयल बोली --"मैं हमेशा बड़े और सुन्दर पत्तों के झुरमुट में बैठकर गाती हूँ ,तुम समझ रहे हो न ?"
तोतों ने कहा--" दोस्त अगर तुम मुझे खट्टे-मीठे फल खिलाओ तो मैं जरूर आजाऊँ ."
फिर आम के पेड़ ने तो साफ कह ही दिया—"तुम्हें इस बगीचे में होना ही नही था मेरे भाई ." 
'कुदरत ने मुझे कुछ भी अच्छा नही दिया .'—बबूल का पेड़ उदास होगया .

ऋतुएं आईं और चलीं गईं .आषाढ़ सावन की काली घटाओं ने उसे फूल दिये . उसे खुशी नही हुई .वसन्त के अन्त में उसे फलियाँ भी मिलीं लेकिन उसकी उदासी दूर नही हुई .मार्च-अप्रैल में हवा खुश्क होने के बावजूद चम्पक-शिरीष और कदम्ब के फूलों की महक से बोझिल होगई थी .कचनार की डालियाँ बेशुमार फूलों से लद गईं थीं . गुलमोहर की कलियों ने हरे सन्दूकों में से लाल-नारंगी चुन्नियाँ निकाल लीं थीं . नीबू के पेड़ ने टहनियों में अनगिन सितारे टाँक लिये थे और पलाश फूलों का गुदस्ता नजर आने लगा था . तब बबूल का पेड़ बड़ी हसरत से उन सबकी साज-सज्जा देख सोच रहा था—'काश वह भी ऐसा ही एक खूबसूरत पेड़ होता .'
उन्ही दिनों बगीचे में गौरैया जैसी ही चिड़ियों का एक जोड़ा चक्कर लगा रहा था . वह बया का जोड़ा था जिसे अपने होने वाले अण्डों और फिर बच्चों के लिये घोंसला बनाना था और इसके लिये उसे उपयुक्त पेड़ की तलाश थी .नर बया जो पीले रंग के कारण मादा से अलग दिख रहा था ,मादा को एक एक कर बगीचे के सारे पेड़—आम कटहल जामुन अमरूद नीम शीशम ..दिखा चुका था पर मादा को कोई पेड़ नही जँचा अन्त में उनका ध्यान कोने में शान्त खड़े उस बबूल की ओर गया . उन्होंने बबूल की टहनियों की ऊँचाई और मजबूती देखी . छोटे विरल पत्ते और काँटे देखे .
"आहा ,यही तो पेड़ है जिसकी हमें तलाश थी ."-मादा बया चहककर बोली .
"हम इसी पर अपना घोंसला बनाएंगे ."
बूबल ने चकित होकर देखा कि वहाँ के बया और भी जोड़े आगए थे .यही नही कास और सरकंडे के रेशों से उन्होंने जल्दी ही घोंसला बनाना भी शुरु कर दिया .
कुछ ही दिनों में बबूल की टहनियों में कई सुन्दर घोंसले झूलने लगे . बगीचे के सारे पेड़ों ने अचरज के साथ बबूल के पेड़ देखा .
एक दिन घोंसलों में कई नन्ही-नन्ही आवाजें गूँजने लगीं तो बबूल का पेड़ जैसे प्यारा सा झुनझुना बन गया . उसकी पत्तियाँ खुशी से थिरक उठीं .बगीचे के सारे पेड़ कह उठे--
"बबूल का पेड़ कितना खुशनसीब है .काश हमारी टहनियों में भी ऐसे घोंसले झूलते ."
बबूल के पेड़ को अब आम या कचनार बनने की जरूरत नही थी .

गुरुवार, 14 नवंबर 2019

तनु को रोना क्यों आगया ?



“तनू ! ए तनू !”----उर्वशी बाहर खडी अपनी चार साल की बेटी तनु के बाहर निकलने का इन्तजार करती पुकार रही थी । और तनु माँ की हर आवाज पर कह रही थी ---“आ रही हूँ मम्मी बस दो मिनट...।“
सुबह के साढे नौ बजने जा रहे थे । उसे ऑफिस के लिये देर हो रही थी । तनु बाहर निकले तो ताला लगाए । फिर उसे बडी बहन के पास छोडे तब कही ऑफिस के लिये बस पकडे । वैसे उर्वशी की कोशिश रोज यही रहती है कि तनु को स्कूल छोडती हुई ऑफिस निकल जाए पर अक्सर ही ऐसा नही हो पाता । स्कूल के लिये निकलते वक्त ही तनु के पेट में कुछ-कुछ होने लगता है और वह लैट्रिन में जाकर बैठ जाती है । जब कभी यह नही होता तो फिर यूनिफॅार्म पर दूध गिर जाता है या बहुत जरूरी होमवर्क की कापी जो मेम को दिखानी होती है , नही मिलती । या फिर रबर ,पेंसिल ढूँढने में ही सारा घर सिर पर उठा लेती है ।
मैं इसके नाटक समझ रही हूँ । --उर्वशी ने उसे उसी तरह झिंझोड डालती है जिस तरह पके बेर झराने के लिये लोग पेड को झिंझोड डालते हैं । कभी-कभी तो तनु पिट भी जाती है । पर तनु उन बच्चों में से नहीं है जो जरा--जरा सी बात पर रोने लगते हैं ।
“बडी ढीठ होगई है । कोई असर ही नही होता डाँट-फटकार का । सचमुच इसकी आदतें बिगड रहीं है .”---पापा भी माँ की बात की बात को सहारा देते हुए कहते हैं । पर तनु सख्ती से होंठ बन्द किये चुपचाप खडी रहती है उसे जरा भी रोना नहीं आता । बल्कि जब माँ और पापा का गुस्सा दूध की तरह उफन कर बाहर निकल जाता है ,तब तनु दौड--दौड कर माँ के साथ बर्तन धुलवाने या झाडू लगाने जैसे काम करने की कोशिश करती है । उर्वशी फिर निरुपाय सी हो जाती है । एडमीशन को दो महीने होने आगए ,होता यही है कि तनु का स्कूल जाना टल ही जाता है
आज भी उसकी मंशा स्कूल जाने की नही थी । पर आज उर्वशी ने तय कर लिया था कि तनु को स्कूल पहुँचा कर ही दम लेगी यही नही उसकी टीचर्स से भी बात करेंगी । पर लडकी है कि निकलने का नाम ही नही ले रही । आखिर कर क्या रही है वहाँ ।
“तनू....!”-- उर्वशी चिल्लाने को हुई पर विचार आया कि वहीं जाकर उसे खींचकर लाना चाहिये  । पर अन्दर जो सीन था उसे देख उर्वशी हैरान रह गई । तनु ड्रेसिंग-टेबल के सामने खडी तौलिया से चेहरे को रगड रही थी । क्रीम पाउडर से पुते चेहरे पर काजल व लिस्टिक बुरी तरह फैल गई थी ।
“अच्छा , तो मैडम यहाँ मेकअप कर रहीं हैं । चल आज मैं तेरा मेकअप कर देती हूँ अच्छी तरह ..।“ उर्वशी ने खींच कर दो तमाचे तनू के गाल पर जड दिये । चेहरे को ऐसे रगड-रगड कर साफ करने लगी जैसे पीतल के बर्तन को चमकाने के लिये रगडा जाता है । पर वह जरा भी टस से मस नही हुई । जैसे कि इस सजा के लिये वह पहले से ही पूरी तरह तैयार हो । चाहे माँ गुस्से में उसके गालों को आम की तरह निचोड डालने की हसरत पूरी करे या बालों को खरपतवार की तरह जड से उखाड डालने के उपाय अपना ले । वह गुमसुम और बेअसर बनी रहती है ।
“मम्मी तुम भी तो लगाती हो यह सब फिर...।“ तनु ने मम्मी के गुस्से का उफान थोडा कम हुआ देख पूछ लिया ।
“तू मेरी बराबरी करले मेरी नानी..।“ माँ ने झल्ला कर कहा पर तनु को माँ की बात जरा भी समझ नही आई । बस माँ की ओर देखती रह गई ।
“मम्मी ,तुम रोज--रोज ऑफिस क्यों जाती हो ?”
“तू रोज--रोज ऐसे नाटक क्यों करती है ?” --माँ ने तनु के सवाल का जबाब देने की बजाय दूसरा ही सवाल किया जो बेशक तनु को चुप करने के लिये था ।
 “तुझे आज भी स्कूल नही जाना था न । पहले ही बता देती तो मेरा सामान व समय तो खराब न होता । मुझे देर हो रही है । चल मौसी के यहाँ छोडदूँ ।  तू उन्ही के हाथ आती है ।“
यह कह कर उर्वशी तनु को लगभग घसीटती हुई लेगई जैसे कोई बच्चा अपनी खिलौनागाडी को गली में लापरवाही से ढरकाता हुआ ले जाता है ।
अपनी बहन रेवा के दरवाजे के भीतर उर्वशी ने तनु को जल्दी से अखबार की तरह फेंका और जोर से सुनाते हुए कि ,”दीदी मैं जा रही हूँ .” --तेजी से चली गई । दीदी के बाहर आने का भी इन्तजार नही किया । यहाँ तक कि तनु को भी -बाय नही कहा । लेकिन वह दूसरे तमाम बच्चों की तरह मम्मी के ऑफिस जाने पर रोती नही बल्कि सोचती है कि मम्मी को जाने क्यों इतनी जल्दी रहती है । हर काम घडी की सुइयों को देखती हुई करतीं हैं । एक मिनट मुस्कराने की भी फुरसत नही होती । गीत और कहानी तो मम्मी ने जाने कब सुनाए होंगे । 
तनू की मौसी रेवा अकेली रहती है । उनके बच्चे बाहर चले गए हैं । काफी सख्त स्वभाव की हैं ।खास कर उन बच्चों के लिये जो पढाई से जी चुराते हैं । तनु को मौसी भी कभी--कभी स्कूल की टीचर जैसी लगती हैं । पर तनु ने सब आसानी से स्वीकार कर लिया है । घर और स्कूल में कोई खास फर्क जो नही है ।
“अरे तनू ---आज स्कूल नही गई ?”---मौसी ने ऐसे अचरज प्रकट किया मानो स्कूल मम्मी का ऑफिस हो जहाँ न जाने के पीछे कोई न कोई कारण हो । और उसे बताना भी जरूरी हो । पर तनु को वह कारण बताना बिल्कुल जरूरी नही लगा । हँसते हुए बोली--
“नही गई तभी तो यहाँ आई हूँ मौसी ।“
“अच्छा---अच्छा--अन्दर आ जा ।“ मौसी ने जल्दी से किवाड लगाए । और चौका में आगईं ।
“देख ,अच्छे बच्चों की तरह यहाँ बैठ जा । मैं अपना काम कर रही हूँ ।“
“ठीक है मौसी .”--तनु पटरे पर बैठ गई ।
ऐसे में अक्सर तनु का ध्यान मौसी की हर गतिविधि पर होता है । चेहरे की हर लकीर को पढती है । मौसी की भौंहें तनीं-तनी सी क्यों रहती हैं । नाक भी कुछ खिंची हुई सी लगती है । आँखें ऐसी रूखी क्यों हैं --एकदम हैं । एकदम सूखी ब्रेड जैसी । मुसकराएं तो कितनी सुन्दर लगें । वह जब रोटी बनाती है तो तनु बडे ध्यान से देखती है ।
“मौसी तुम्हारी रोटी इतनी सुन्दर और गोल कैसे बन जाती है ?”
“इसमें पूछने की क्या बात है ? वह तो बनाते--बनाते आ ही जाती है ।“  
“मैं बनाऊँ ?”---तनु मौसी से बेलन लेने का मौका चाहती है । पर मौसी डाँट देती है ।
“नहीं । चुपचाप बैठो ।“-- तनु कुछ देर के लिये चुप होगई । फिर पूछा--
“मौसी , रोटी फूल क्यों जाती है ?”
मौसी ने फिर डाँट दिया ---“अरे पागल सेकने पर रोटी फूलेगी नही तो क्या होगा ?”
“पर मौसी सभी रोटी तो नही न फूल रहीं । ऐसा क्यों ?”
“ऐसा तेरा सिर .”--मौसी झल्ला उठी ।
“पढने लिखने की बजाय बेसिरपैर के सवालों में दिमाग उलझाए रखती है । तेरे साथ के बच्चे दूसरी कक्षा में आगए । और तू है कि अभी यूकेजी में अटकी है .”
मौसी भी मम्मी की तरह ही पढाई की बात करके उसे चुप कर देती है पर उसका दिमाग कही चुप रहता है । दिमाग में ऐसे ही ढेरों सवालों के बुलबुले से उठते रहते हैं जैसे कि  देखो रोटी दबाते हुए चिमटा गीला कैसे होगया ? मौसी की बनाई सब्जी मम्मी की सब्जी से ज्यादा स्वादिष्ट क्यों लगती है ? रोटियों की महक से पेट खाली--खाली सा क्यों लगने लगता है ? मौसी दिन भर क्या पढतीं रहती हैं ? पढते हुए भी तनु की हर बात पर नजर कैसे रख लेती हैं .जरा कुछ करो तुरन्त टोक देती हैं कि ---‘अरे तनु छत पर मत जा । कौवे सिर में चोंच मार देंगे । ए वो पतंग मत लेना । भैया की है । तनु बेटा साइकिल से दूर रहो । लग जाएगी । दिन भर कुछ न कुछ खाते रहना ठीक नही होता । तनु बच्चे मुँह खुला नही रखना चाहिये । और इतना बडा ग्रास क्यों लेती है तनु । ग्रास को कम से कम बत्तीस बार चबाना चाहिये । बाप रे...। मौसी इतनी सारी बातें कैसे याद रखती हैं ।    
“मौसी में भैया का बैट देखलूँ ?” तनु को क्रिकेट का खेल बहुत पसन्द है । 
“लडकियों वाले काम नही करेगी कभी तू हाँ..कभी बैट, कभी पतंग तो कभी पिस्तौल...।“---मौसी झिडकतीं हैं । तनु टुकर--टुकर मौसी को देखती है । वह अभी तक नही समझ पाई है कि उसे कौनसे काम करने चाहिये और कौनसे नही । कुछ सोच कर वह बडा झाडू लेकर आँगन झाडने लगी ।
“अरे छोड ,तनु वह तेरे मतलब का काम नही है । देख कूड़ा उधर ही उड रहा है ।“
“तो बर्तन माँजलूँ ?”
“तू ऐसा कर तनु कि भैया से कुछ पढले ।“
“भैया से ! तनु घबराई –‘भैया से तो स्कूल में दीदी ही अच्छी है । वो पढाते कम हैं सवाल ज्यादा करते हैं । कि चल सी से बनने वाले पाँच शब्द लिख कर ला । कि बता इस पेड में कितनी शाखाएं हैं । पर भैया अभी सो रहे हैं । अच्छा है । लेकिन मौसी भैया को क्यों नही जगातीं । इतनी देर तक सोते हैं ।
“मौसी में कमरा एकसा करलूँ ?”
“अच्छा .” मौसी ने कह दिया । उसे कुछ तो काम चाहिये वरना दिन भर क्या करे । पर तभी एक साथ कुछ गिरने की आवाज आई । मौसी ने देखा कि पूरे कमरे में अखबार बिखरे हैं । तनु बीच में अपराध का बोझ लादे ऐसी सूरत बनाए खडी थी कि मौसी को दया आगई । पुचकारते हुए बोली ---“अरे इसमें दुखी होने की क्या बात है ? ऐसा तो होता ही रहता है । आ मेरे पास आ .”
यह कह कर मौसी ने तनु को गले लगा लिया पर यह क्या ! तनु तो रोने लगी . क्यों ?
क्या आप बता सकते हैं ?

शुक्रवार, 1 नवंबर 2019

अपना मध्यप्रदेश



भारत माँ का ह्रदय-प्रदेश
अपना मध्य प्रदेश ।
गौरवमय देता सन्देश
अपना मध्यप्रदेश ।

विन्ध्य, सतपुडा ,शिखर यहाँ
हरियाली है मुखर यहाँ ।
सिन्ध, बेतवा, क्षिप्रा चम्बल
ताप्ती और नर्मदा यहाँ ।
कण-कण जिसके बसे महेश
अपना मध्य-प्रदेश ।

साँची ,उदयगिरि माँडवगढ
भीमबैठका और ककनमठ
खजुराहो,सोनागिरि भी हैं
धुँआधार की सुनलो आहट
नैसर्गिक मनोहारी वेश
अपना मध्यप्रदेश ।

कालीदास माघ से कवि
और दुर्गावती अहिल्या सी ।
और अवन्तीबाई रानी
मातृभूमि की गरिमा सी ।
'विक्रम' थे विक्रम के वेश
अपना मध्यप्रदेश

विश्व-विरासत किला ग्वालियर
गालव ऋषि की तपोभूमि है
वीरांगना लक्ष्मीबाई की
यह अन्तिम कर्मभूमि है ।
शौर्य शक्ति के ये अवशेष
अपना मध्यप्रदेश ।

तानसेन की तानें गूँजी
स्वर कोकिल ने आँखें खोली ।
विस्मिल ने अवतार लिया
और गूँजी 'सरल' 'सुमन' की बोली ।
बैर घृणा का यहाँ न लेश
अपना मध्यप्रदेश ।

शस्य श्यामला धरती माँ
कृषक सरलता की सीमा
सृष्टि रही अनुकूल सदा
भूले कभी न हम गरिमा ।
विविध कलाओं का उन्मेष
अपना मध्यप्रदेश ।

बुधवार, 26 जून 2019

बादल बदलो ना ..


बादल भैया बदले तुम
कबसे देख रहे हैं हम ।

कभी-कभी तो आते हो
नखरे बीस दिखाते हो ।
पानी भी लाते हो कम ।।
बादल भैया बदले तुम ।

जब जी चाहे आते हो
सौ तूफान उठाते हो ।
करते खूब नाक में दम ।।
बादल भैया बदले तुम ।

जहाँ कहीं भी जम जाते
पाँव जमी पर थम जाते
फिर हफ्तों होती रिमझिम
बादल भैया बदले तुम ।

करो न इतनी मनमानी
चाहें जितना दो पानी ।
भेद करो मत ,रक्खो सम ।
भैया यों ना बदलो तुम ।