शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014

रात-रात में ही !!


कल तक थीं टहनी पर ,
कलियाँ जोई-मोई सी ।
अभी-अभी जन्मे शिशु जैसी 
सोई--सोई सी ।
लेकिन देखा सुबह सभी मिल ,
पलक खोल हँसतीं थीं 
खिल--खिल ।
झिलमिल तितली से 
घुलमिल कर
बतियाना भी सीख गईं लो !
रात-रात में ही ...।

हमने देखा ,सूरज पश्चिम

शाम किले के पीछे ।
बाँध पोटली धूप ,
और फिर....
 उतर गया वह नीचे ।
अरे ..सुबह पूरब में कैसे ,
झाँके पीपल के पीछे से ।
इतना चलकर आया कैसे ,
रात-रात में ही ...।

गोल-गोल अमरूद एक ,

जो टहनी में लटका था ।
गदराया था ,
पक जाने तक 
मन उसमें अटका था ।
देखा सुबह लगा वो झटका ,
आँखों में काँटा सा खटका ,
था अमरूद खोखला लटका ।
"कौन कुतर कर इसे खागया ,
रात--रात में ही ..।"

5 टिप्‍पणियां:

  1. रोज़ रात को स्वप्न सजाकर
    और नई योजना बनाकर
    सुबह उन्हें पूरा कर लेंगे
    सोच के हम सो जाते हैं
    , पर
    सुबह सामने नई समस्या
    स्वप्न पुराने धरे रह गए
    कौन कुतर कर उन्हें खा गया
    रात-रात में???
    /
    दीदी! बहुत अच्छी कविता.. मन प्रफुल्लित हो गया और यह तुकबन्दी निकल गई दिल से!!

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  2. आपकी इस बढिया तुकबन्दी को अपनी कविता में जोडने का मन हो रहा है लेकिन वह कुछ बडों के लिये ज्यादा उपयुक्त है लेकिन है बहुत ही दमदार..।

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  3. रात में रूप सजा कर आयी प्रकृति। सुन्दर कविता।

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  4. बुआ...आपकी कविता तो शानदार है ही, ऊपर से सलिल चचा के मन से निकली ये पंक्तियाँ...इसको कहते हैं आम के आम, गुठलियों के दाम...दिल खुश हो गया...|

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