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मंगलवार, 3 सितंबर 2013

मिट्टी की बात

एक था नन्हा पौधा गुलू । बहुत ही कोमल ,प्यारा और खूबसूरत । उसके हरे-भरे पत्ते बडे उल्लासमय लगते थे मानो आकाश से जान-पहचान करना चाहते हों ।
सब उसे प्यार करते थे । सूरज की पहली किरण बगिया में आकर सबसे पहले उसी का 'गुडमार्निंग' (सुप्रभात )कहती थी । हवा उसे हल्की सी थपकियाँ देकर सुलाती और कोयल बुलबुल मीठी लोरियाँ सुनातीं । हरी घास उसे नई-पुरानी कहानियाँ सुनाती थी तो बडे-बडे पेड उसे अक्सर प्यार से छेडते---"अरे गुलू मास्टर जरा जल्दी बढो न । देखो तो तुमसे बात करते हुए हमें कितना झुकना पडता है ?"
"देखा छोटा होने का लाभ ?"---गुलू चहक उठता---"मैं सबसे सिर उठा कर बात कर सकता हूँ । है न । इसलिये बडा होने में मेरी कोई दिलचस्पी नही है ।"
यह सुन कर सब हँस पडते थे । बगीचे की रौनक बढ जाती थी । इतनी खूबसूरत दुनिया, इतना प्यार पाकर गुलू को लगने लगा जैसे उसके पंख उग आए हों । 
तभी एक दिन दो लडके बगीचे में आए । उनकी नजर जैसे ही उस नन्हे पौधे पर पडी तो उसे अपने घर लगाने के लिये उखाड कर ले गए । और उसे एक क्यारी में रोप दिया । खूब पानी भी डाल दिया पर नन्हे पौधा उदास होगया । उसे यह नई जगह बिल्कुल अच्छी नही लगी । सब कुछ अनजाना और पराया सा लगा । उसे दुख हुआ कि उसे उसके घर से दूर कर दिया जहाँ वह पैदा हुआ । साथ ही गुस्सा भी बहुत आया । आखिर उसकी मर्जी जाने बिना लडकों को ऐसा करने की अनुमति दी किसने । यह तो मनमानी और दूसरों की आजादी छीनने की घटिया कोशिश । गुलू इसे क्यों  बर्दाश्त करे ? अपने साथ हुए अन्याय का विरोध करने का अधिकार सबको है । 
बस यही सब सोचा और गुलू उदास होगया । खाना-पानी लेना बन्द कर दिया । सुन्दर पत्ते मुरझा कर लटक गए । दो कोंपलें भी ,जो अभी पलकें खोल कर दुनिया देखने वालीं थीं सहम कर वहीं ठहर गई । अब कोई छोटी-मोटी बात होती तो कुछ नही था पर यह थी सबके चहेते नन्हे गुलू की उदासी व नाराजी वाली बात, सो चारों ओर बडा हडकम्प मचा । 
सबसे पहले हडबडाई--घबराई सी हवा आई । गुलू के लटके हुए पत्तों को सहला कर बोली---"क्या हुआ गुलू मास्टर । तुम्हारी हालत तो बडी खराब है । आखिर हुआ क्या है तुम्हें ?"
"क्या तुम्हें पता नही कि मुझे दो उड्डण्ड लडकों ने मेरी जगह से मुझे उखाड कर यहाँ लगा दिया है?"
"ओ...इतनी सी बात--हवा खिलखिलाई ---मैंने तो सुना कि तुम बडे बहादुर  हो । फिर क्या हुआ जो जरा सी बात पर मुँह लटका लिया । मुझे देखो न । दिनरात दुनिया का चक्कर लगाती हूँ । फूलों से भी गुजरती हूँ और सडी--गली चीजों के ढेर से भी । मैं तो दुखी नही होती । तुम्हें यों हिम्मत नही हारना चाहिये । जो कुछ हुआ उसे भूल जाओ और खुश रहो । बी हैप्पी । अच्छा चलती हूँ । मुझे तितलियों व मधुमक्खियों के फूलों का सन्देश देने जाना है ..।"
"मुझे देखो-"..--नन्हा पौधा हवा का वाक्य दोहराते हुए कहने लगा --"-जाने कहाँ--कहाँ आवारा जैसी फिरती रहती है । किसी की चिन्ता क्या करेगी । ..अरे खुशी क्या कोई बिजली का स्विच है कि दबाओ और फक् से उजाला हो जाए ।" 
"किस उजाले की बात कर रहे हो नन्हे बाबू ?"
किरण अपने रुपहले बालों को लहराती हुई आई । उसका चेहरा दिपदिपा रहा था । किसी महारानी की तरह । उसी रौब से बोली--"हमने सुना है कि आप उदास हैं । भई ये उदासी ,ये मायूसी हमें जरा भी पसन्द नही है । आप जानते हैं कि कमजोरों को दुनिया दबाती है । हमारी तरह मजबूत और ताकतवर बनो। हम एक दिन भी न दिखें या जरा नाराजी दिखादें तो हलचल मच जाती है । इसलिये  जिन्दादिल और बहादुर बनो ।खैर.., बताइयें कि हम आपके क्या काम आ सकते हैं ?"
"फिलहाल आप हमें अकेला छोड दीजिये प्लीज..।-"-गुलू ने किरण की  बातों से  उकता कर कहा ।
"जैसी आपकी इच्छा ।"---किरण लापरवाही से बोली--- "हम चलते हैं । जब जरूरी लगे बुलवा लेना । हम आपके के लिये खाना तैयार करवा देंगे ।"
"खाना तो वो खाए जिसे जीना हो --।" गुलू ने मन ही मन कहा । किरण की बातों से उसके पत्ते ज्यादा लटक गए थे । इससे तो अच्छी तो पानी की समझायश थी । उसकी बातों में कम से कम ठंडक तो थी ।  बातों में हमदर्दी  थी । बडे अपनेपन से  कहा---"अपने लिये न सही मेरे लिये ही कुछ खा लो बच्चे । ऐसे कैसे काम चलेगा ?"
लेकिन पानी की बातें  सुनकर भी गुलू को नही लगा कि यह नई जगह जीने लायक और खुश रहने लायक है ।
पास ही बरगद की डाली पर बैठी चिडियाँ कह रहीं थीं--"बेचारा गुलू ,ऐसे तो सचमुच ही मर जाएगा ।"
गुलू को भी यकीन होगया कि उसके सामने एक ही रास्ता है---मर जाना ।
यह सब देख कर मिट्टी को बडी चिन्ता हुई । उसके सामने ही एक प्यारा पौधा सूख जाए यह तो अफसोस की बात थी । उसने धीरे से पूछा---"क्या तुमने सचमुच मरने का फैसला कर लिया है गुलू ?"
"क्या तुम्हें कोई शक है ?"--- गुलू ने सवाल के जबाब में सवाल पूछा ।
"नही..नही शक तो बिल्कुल नही । पर क्या केवल इसी बात पर कि तुम्हें नई जगह लाया गया है ।
यह छोटी बात है कि कोई किसी को अपने तरीके से जीने पर मजबूर करे । क्या तुम इसे सहन कर सकती हो ?" 
"हाँ "...मिट्टी ने गहरी साँस ली । 
"हाँ यह सहन करने वाली बात होनी भी नही चाहिये ।पर किसी की ज्यादती से घबरा कर जिन्दगी को खतरे में डालना तो ठीक नही है न ।"
"मुझे कोई उपदेश नही सुनना । जाओ यहाँ से अपने काम करो । मुझे मेरे हाल पर छोडदो बस...।"
"हाय ,गुलू तुम तो बिगड रहे हो । मेरा उद्देश्य वह नही  है । मैं तो कुछ और ही बताने वाली थी ।"   
"क्या बताने वालीं थीं ? यही न कि खुश रहो । मजबूत बनो । तभी तुम बहुत से दोस्त बना सकोगे । और तभी यह दुनिया ज्यादा सुन्दर लगेगी ..। कह डालो, कह डालो ..।"
"ओफ्..ओ...मैं वह सब नही कहने वाली । मैं तो यह बताने आई हूँ कि कुछ ही दिनों में ऋतुरानी आने वाली है । हर ऋतु में वह एक बार जरूर आती है ।" 
"तो मैं क्या करूँ ?"--गुलू ने रुखाई से मिट्टी की बात काट दी ।
"अरे बाबा ,पूरी बात तो सुनो । वह खाली नही आती । साथ में रंग-बिरंगे फूलों का टोकरा भी लाती है "
"तो मुझे उससे क्या !"
"हाँ यही तो जानने वाली बात है ।"-- मिट्टी ने तसल्ली के साथ कहा---"दरअसल वह पेड--पौधों को फूल बाँटने आती है । ढेर सारे रंग -बिरंगे फूल--लाल ,पीले, नीले, सफेद ,गुलाबी, बैंगनी जोगिया....। सब उससे फूल माँगने तैयार रहते हैं । हाँ बिना माँगे वह किसी को फूल नही देती ।"
"फिर ?"---गुलू को यह जानकारी कुछ दिलचस्प लगी ।
"फिर ?..नही समझे ?" मिट्टी ने अपनेपन से कहा --"सुनो मेरा विचार था कि तुम भी अपने लिये ऋतुरानी से फूल माँग लेते । मेरी समझ में तुम पर गुलाबी फूल अच्छे लगेंगे । वही छोटी रेशमी पंखुडियों वाले..।"
फूलों का नाम सुन कर नन्हे पौधे के मन में एक लहर सी उठी । उसकी आँखों में गेंदा , गुलाब सेवन्ती और मोगरा के पौधे झूम उठे जो किस तरह खूबसूरत फूलों से लद जाते हैं । भौंरे गीत गाते हैं । मधुमक्खियाँ नाचतीं हैं । तितलियाँ उनके कानों में जाने कितनी गपशप करतीं कि फूल खिलखिलाते हुए से लगते । पौधे की जिन्दगी के सबसे खूबसूरत दिन होते हैं वे ।
"ओह ,..लेकिन मैं फूल कैसे माँग सकता हूँ । मेरी तो हालत ही खराब है ।"--नन्हे पौधे को अपनी भूल का अहसास हुआ ।
"बस यही तो मैं तुम्हें समझाने वाली हूँ । मिट्टी ने प्यार से समझाया "---ऋतुरानी हमेशा स्वस्थ व प्रसन्न पौधों को ही फूल देती है । तुम चाहो तो अब भी बात बन सकती है । अभी बिगडा ही क्या है । "
"पर कैसे ?" गुलू की आवाज में बेचैनी थी ।
"बडी आसानी से" --मिट्टी उल्लसित होकर बोली--
"दुख और गुस्सा छोडदो । और यकीनन तुम्हारे साथ ऐसा कुछ नही हुआ कि तुम जीने का ख्याल ही छोडदो । सच तो यह है कि ये लडके सुन्दर फूलों के लालच में ही तुम्हें यहाँ लाए हैं । इसलिये इनके स्नेह को स्वीकार करो । इस नई जगह पर तुम्हारा स्वागत है । जिस दिन तुम्हें फूल मिल जाएं मुझे जरूर बताना । मेरे लिये वह बेहद खुशी का दिन होगा ।"
अगली सुबह सबने देखा नन्हा गुलू खुल कर मुस्करा रहा था । मुरझाए पत्ते ताजे और प्रसन्न लग रहे थे । सहमी सोई हुई सी दो कोंपलें भी आँखें खोलने लगीं थीं ।
(एकलव्य से प्रकाशित 'मिट्टी की बात' कहानी संग्रह से ,जिसकी छह कहानियों में तीन मेरी हैं )

सोमवार, 19 अगस्त 2013

धरती गमक उठी है ।


पडी फुहारें वन आँगन में ,

भीगी धरती गमक उठी है ।

धूमिल काले कलश उठाये,

मेघराज पानी भर लाये ।
उमड--गरज कर खाली कर गये,
बीजुरिया ,लो चमक उठी है ।

आ, मयूर मतवाला नाचे ,

कोयल मीठी कविता बाँचे ।
भर-भर उमडी उफनी नदियाँ ,
इतराती सी झमक उठी हैं ।

बिछा मखमली हरा गलीचा ,

झूलों से है सजा बगीचा ।
मधुर मल्हार हवा गाती है,
हरियाली भी दमक उठी है ।

कीट-पतंगों का मेला सा ,

बीर-बहूटी का रेला सा  ।
मेंढक , झीगुर से झन्नाती ,
भीगी रातें बमक उठी हैं ।

सीले कपडे बिस्तर दादी ,

सेवईं पापड धूप दिखाती ।
जब लगता आकाश खुला है ,
सुस्त दुपहरी तमक उठी है ।

बुधवार, 14 अगस्त 2013

हमारा तिरंगा

हमें जान से भी है प्यारा तिरंगा,
अनौखा निराला है न्यारा तिरंगा ।

ये लहराए, पहली किरण मुस्कराए

सिन्दूरी प्रभा से गगन जगमगाए।
उदय होते रवि का नजारा तिरंगा,
अनौखा निराला.......

बीच का श्वेत-रंग है हिमालय का गौरव,

गूँजता है अमन के कपोतों का कलरव।
विमल सादगी का सितारा तिरंगा,
अनौखा निराला.........

हरित बाग-वन की छटा लहलहाती,

कि नीचे हरी  क्यारियाँ मुस्कराती,
हरियाली खुशहाली का नारा तिरंगा।
अनौखा निराला.........

चक्र है बीच में जैसे आँखों की पुतली।

अखिल विश्व को दे रहा द्रष्टि उजली।
डूबती आस्थाओं का किनारा तिरंगा।।
अनौखा निराला.......

आन है मान है अपना सम्मान है।

गीत बलिदान का देश की शान है ।
एक अभिमान अपना सहारा तिरंगा।
अनौखा निराला.......

कभी शान हम इसकी गिरने न देंगे।

कभी शीश हम इसका  झुकने न देंगे।
ऊँचा है और रहेगा हमारा तिरंगा ।
हमें जान से भी है प्यारा तिरंगा ।

सभी पाठकों को स्वाधीनता-दिवस मुबारक 

सोमवार, 15 जुलाई 2013

वर्षा का स्कूल

आसमान में शुरु होगया,
वर्षा का स्कूल।
सूरज की जो बजी 'बेल,'
सुन दौडे रेलमपेल।
नन्हे -नन्हे बादल ,
लादे भारी बस्ता ,
और पानी की 'बाटल '।

याद दिलाते मम्मी-पापा ,

नदी समन्दर ..यही निरन्तर,
कुछ गये तो नहीं भूल ??
   आसमान में शुरु हो गया ,
   वर्षा का स्कूल --।

कक्षाओं में ,

मचा शोर है ।
बडा जोर है --
"दीदी--दीदी..!..दीदी-दीदी.!!
कितने मुश्किल,
गिनती टेबल !
आज नहीं यह ,
"ए फार एपल  ।"
हम तो आज पढेंगे केवल,
मीठे--मीठे गीत ।"
मुस्काई सुन दीदी हवा  ---
"चलो तुम्हारी जीत ।"

पढकर खुशी-खुशी घर लौटे ,

नन्हे बादल ।
धूम मचाते और चिल्लाते ,
कविता बौछारों की गाते ।
पर्वत मैदानों ने खोले ,
हरियाली के छाते ।
"नहीं गई क्यों मैं भी पढने ?
यों शरमाई धूल ...
आसमान में शुरु होगया ,
वर्षा का स्कूल ।
( चकमक जुलाई 2000 में प्रकाशित)

बुधवार, 12 जून 2013

पेड किसका है ?

यह कहानी वैसे तो चकमक, मिट्टी की बात ( कहानी संग्रह एकलव्य) तथा बाल भास्कर में आ चुकी है लेकिन आपके पढे बिना बात अधूरी है । इसलिये इसे यहाँ भी दे रही हूँ । आप पढें और अपनी राय भी जरूर दें ।
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एक शाम जब सारा आसमान लौटते हुए पंछियों के कोलाहल से गूँज रहा था और सूरज अपनी किरणों के जाल को पहाडों व पेडों की फुनगियों से समेट कर क्षितिज के पार जाने की तैयारी कर रहा था ,तब नीम के पेड पर बैठे पक्षी व गिलहरियाँ एक खास मुद्दे पर चर्चा कर रहे थे । मुद्दा था --'एक अकडबाज बुलबुल का ,जो आँगन में खडे नीबू के पेड पर अधिकार के साथ घोंसला बना कर रह रही थी ।'
"कितना घमण्ड है उस जरा सी चिडिया को । सीधे मुँह बोलना ही नही चाहती किसी से ।"--नन्ही गौरैया ने मारे गुस्से के एक टहनी से दूसरी टहनी पर फुदकते हुए कहा ।
"तुम बात करने का रोना रो रही हो नन्ही ---गुलबी मैना अपनी पीली चोंच साफ करके बोली---"वह तो हमारी तरफ देखना तक पसन्द नही करती । हमें देखते ही कैसी बुरी सूरत बना लेती है ! मारे गुस्से के सिर के बाल खडे हो जाते हैं और मीठी आवाज भी एकदम कर्कश होजाती है ।"
"अरे ,तो फिर मुझसे पूछो कि मुझ पर क्या गुजरी ।"---- छुटकी गिलहरी ,जो पिछले पैरों पर बैठी दोनों हाथों में अमरूद थामे कुतर रही थी , आगे आकर बोली---"मैं तो उधर अमरूद तलाशने गई थी कि वह अचानक चीखती हुई मेरे पीछे आई । मैं तो घबरा कर डाली से नीचे ही गिर पडी । मेरे बदन में अभी भी दर्द है ।"
सब बढा--चढा कर अपनी व्यथा-कथा सुना रहे थे । कालू कौवा जो अब तक सबकी बातें ध्यान से सुन रहा था भारी आवाज में बोला-----"ये मीठा बोलने वाली चिडियाँ तो होतीं ही हैं स्वार्थी व धोखेबाज । कोयल को ही देखलो । सारी दुनिया उसकी मीठी आवाज के गीत गाती है ।पर यह कौन मानेगा कि वह चालाकी से अपने अण्डों की देखभाल हमसे करवाती है । हम तो उन्हें अपना समझ कर प्यार से सेते और पालते हैं पर बच्चे भी पूरे चालाक होते हैं । हम असलियत समझें इससे पहले ही वे उड जाते हैं । बुलबुल उनसे कैसे अलग हो सकती है ! मैं सबकी आलोचना से डरता हूँ वरना मजा चखाता उस बदतमीज बुलबुल को । उसे खदेडने में मुझे पल भर भी नही लगता ।"
"लेकिन अब क्या किया जासकता है ? अब तो उसने घोंसला बना लिया है । शायद बच्चे भी हैं ।"---पंडुकी बोली । उसे लडाई--झगडे की बात से जरा डर लगता है । 
"तो क्या हुआ !"--कालू सख्ती से बोला ---"जब वह हमारे पेड पर रह कर हमें आँखें दिखा सकती है तो हम उसे खदेड नही सकते क्या ?"
"कालू दादा ठीक कह रहे हैं "--गुलबी ने समर्थन किया ---"बुलबुल तो बागों में रहने वाली चिडिया है । हमारे घरेलू पेडों पर भला उसका क्या हक है ! फिर रहे तो रहे ,पर अकड भी दिखाए !"
"अजी रहे भी क्यों ?"---छुटकी ने जोर देकर कहा । वह चोट व अपमान के लिये बुलबुल को माफ नही कर पा रही थी ।
"ठीक है । बुलबुल को सबक सिखाना जरूरी है ।" 
इस तरह निर्विरोध ही यह प्रस्ताव पास होगया ।
 जिस समय यह प्रस्ताव पास हो रहा था ,बुलबुल अपने घोंसले में बच्चों को दाना चुगा रही थी । वह बारी-बारी से तीनों की चोंच में चुग्गा डाल रही थी पर उन्हें सब्र कहाँ था । वे गर्दन ताने ,चोंच फाडे बार-बार चुग्गा माँगे जारहे थे । उनमें एक बच्चा ज्यादा चुलबुला और भुक्खड था । हर बार चोंच बढा कर माँ से दाना छीन लेता था । इसलिये वह दोनों की तुलना में कुछ बडा व सेहतमन्द दिखने लगा था ।
उसे घोंसला भी छोटा और उबाऊ लगने लगा था इसलिये वह घोंसले से बाहर निकल कर उडने के मनसूबे भी बनाने लगा था । दूसरे दोनों बच्चे भी कमजोर होने के बावजूद भाई की नकल करते थे । उनके पंख अभी उग ही रहे थे पर उन्हें ही फडफडाकर उडने का शौक पूरा करने लगे थे । और माँ के लाख समझाने पर भी वे कुछ न कुछ बोलते रहते थे---"माँ आसमान कितना बडा है ? माँ बाहर दुनिया खूब बडी और खूबसूरत होगी न ! माँ हमारे पंख कब बडे होंगे ? हमें जल्दी उडना है । माँ हमें खुद ही कब चुग्गा तलाश करने दोगी ..यहीं बैठे-बैठे खाते ऊब गए हैं माँ...!"
"अभी कुछ दिन और तसल्ली करलो मेरे नन्हे -मुन्नो !" बुलबुल अपने बच्चों की बातें सुन कर फूली नही समाती थी । बच्चों से बोलते समय तो उसकी आवाज बेहद से बेहद मीठी हो जाती थी । 
"तुम जल्दी ही उडोगे भी और दुनिया भी देखोगे मेरे बच्चो ! पर अभी कुछ दिन मेरे साथ भी तो गुजार लो मेरे लाडलो !"
बच्चों की बातें सुन कर बुलबुल निहाल तो होती थी पर साथ ही कई आशंकाओं से भी घिर जाती थी । पता नही उसके शिशुओं पर कब कौन सी मुसीबत आ जाए । पन्द्रह दिनों तक तो किसी को हवा तक नही लगी थी कि एक छोटे से घोंसले में एक नही तीन--तीन अण्डे सेये जा रहे हैं पर जब अण्डों को फोड कर बच्चे निकले तो बुलबुल की मुसीबत होगई । अब क्या वे अण्डे थे जिन्हें बुलबुल छाती के नीचे दबाए रखती । आँखें भी नही खुलीं थीं कि नटखट बच्चों की चीं चीं...चूँचूँ शुरु होगई थी । और फिर हुआ वही जिसका बुलबुल को डर था । कितनी ही चिडियाँ पेड के आसपास चक्कर काटने लगीं । और किसी न किसी बहाने बात करने की कोशिश करने लगीं --"कि अरे बुलबुल जी ! आजकल बडा शोर मचा रहता है । क्या तुम्हारे यहाँ मेहमान आए हुए हैं ?"...कि तुम तो फूलों में रहने वाली हो फिर यह हमारा काँटेदार पेड कैसे भा गया बुलबुल रानी ?" कि बुलबुल जी सुना है कि तु्म्हारी आवाज बहुत मीठी है । कोई गीत सुनाओ न !" 
जब ये बातें होती तब कालू भी किसी न किसी बहाने वहीं काँव--काँव करता हुआ मँडराता रहता था । बुलबुल  खतरे के बारे में सोचती और किसी तरह उसे टालने के लिये विनम्रता के साथ कहती----"मैं जरा व्यस्त हूँ । फिर कभी आना ।"
लेकिन उस समय न चाहते हुए भी उसकी आवाज रूखी व कठोर हो जाती थी ।
"इतना घमण्ड....!"  क्या हम सबको नही सोचना चाहिये कि बुलबुल का यह बर्ताव न केवल बदतमीजी  भरा है ,बल्कि यह हम सबका अपमान भी है ।
और इसके बाद आनन--फानन में बुलबुल को भगाने की योजना बन गई । इसकी जिम्मेदारी कालू को सौंपी गई । भूखा क्या चाहे ,भरपेट भोजन । कालू तो न जाने कब से इसी मौके के इन्तजार में था । बुलबुल ने कई बार उसे भी बुरी तरह खदेड दिया था । लेकिन वह बुलबुल का कुछ भी नही बिगाड पाया था । यह मौका पाकर उसका मन नए बछडे की तरह कुलाँचें भरने लगा । उत्साह को दबाते हुए बोला---"आपने मुझे इसके लायक समझा इसके लिये शुक्रिया । मैं इसे निभाने की पूरी कोशिश करूँगा और क्या कहूँ ।"  
दूसरे दिन जब सूरज की किरणें पत्तों पर थिरकने लगीं , पक्षी स्कूल से छूटे बच्चों की तरह चहकते हुए भोजन की तलाश में निकल गए और पेडों पर गिलहरियों की किट्..किट्..कुट्..कुट्..शुरु होगई मानो छैनी--हथौडा लेकर कोई पत्थर तराश रहा हो । तब बुलबुल ने चुग्गा लेने जाने से पहले अपने बच्चों को रोज की तरह ही नसीहतें दीं कि घोंसले से बाहर मत झाँकना । चहचहाने और उडने की इच्छा को फिलहाल दबा कर ही रखना । कोई खतरा हो तब जरूर मुझे जोर से पुकार लेना । मैं आसपास ही कुछ कीडे चुन कर आ जाऊँगी । और उड गई । 
कालू ने मौका देखा और चुपके से बुलबुल के घोंसले तक पहुँच गया । हालाँकि घनी पत्तियों व काँटेदार टहनियों में उसे खासी दिक्कत हुई लेकिन घोंसले में जो नरम-गरम बच्चे देखे तो मुँह में पानी आगया और मुँह से बरबस ही निकल पडा---"वाह क्या बात है !"
"कौन है ?" --तीनों बच्चे चौकन्ने होगए । कालू को लगा जैसे उसकी चोरी पकडी गई । वह दो कदम पीछे हट गया ।
"अरे ,डर लगा क्या ?"---बडा बच्चा गर्दन उठा कर सीना फुलाने की कोशिश करते हुए बोला । 
"यहाँ डर की कोई बात नही है ।"
"अभी हमारी माँ भी नही है । तुम हमसे दोस्ती करोगे ?"--बीच वाला बच्चा आगे आकर बोला । 
"दोस्ती !!"--कालू चौंका ।
"हाँ , दरअसल हमें एक दोस्त की सख्त जरूरत है जो बहादुर और ताकतवर हो । हमें आसमान की सैर कराए । हमसे खूब सारी बातें करे । और..."----बडे बच्चे ने अपनी बात पूरी भी न की थी कि छोटा बच्चा बीच में से निकल कर आगे आगया और बोला--
"क्या है कि हमारी माँ हमें न तो जोर से बोलने देती है न ही घोंसले से बाहर निकलने देती है ।लेकिन हम खूब गाना चाहते हैं । उड कर दूर तक सैर करना चाहते हैं । क्या आप हमारी मदद करेंगे ?"  
कालू हैरान । बच्चे निर्भीकता से बोले जा रहे थे । उन्हें न किसी खतरे का अहसास था न मुसीबत की चिन्ता ।
"ऐसे में इन पर वार करना तो बेहद शर्मनाक होगा "--कालू ने सोचा । बच्चों का बोलना जारी था---"हमारी माँ कहती है कि यहाँ हमारे कई दुश्मन हैं जो हमें नुक्सान पहुँचा सकते हैं । लेकिन हमें यकीन नही होता । और आप तो हमें बडे बहादुर लगते हैं । माँ कहती है कि जो बहादुर होते हैं वे बच्चों को कोई खतरा नही पहुँचाते । है न ?"
"हाँ...हाँ ..।" कालू की जुबान सूखने लगी । या बोलने के लिये उसे शब्द नही मिल रहे थे ।
"कालू ! तुम वहाँ क्या कर रहे हो ? हम जानने के लिये बेचैन हैं । जल्दी अपना काम करो और वापस आओ ।"
नीम के पेड पर बैठे पक्षी व गिलहरियाँ कालू को लगातार पुकार रहे थे पर कालू बुलबुल के तीनों बच्चों की बातों में खोया था जो बडे प्यार से उसे दोस्त बनाने को आतुर थे । उस समय कालू को अपना इरादा काफी घटिया लगा और काफी थकी-थकी सी आवाज में बोला ---"अच्छा चलता हूँ । फिर मिलेंगे ।"
"ठीक है लेकिन कल जरूर आना । हम इन्तजार करेंगे ।"
तीनों बच्चों की नन्ही आवाजें कालू का पीछा करती रहीं । वह जैसे जान छुडा कर मुश्किल से नीम के पेड तक आ पाया ।
"तुम कामयाब नही हुए ।"--नन्ही गौरैया ने शरारत से कहा ---"तुम्हारी सूरत बता रही है ।"
"कालू दादा तुम तो ऐसे बैठे हो जैसे बुलबुल ने तुम्हें पीट-पीट कर भगा दिया हो ।"---गुलबी मैना बोली । ऐसे में छुटकी भला पीछे कैसे रहती । चुटकी लेते हुए बोली---"लगता है तुम बुलबुल से हार गए ।"
"बुलबुल से नही बेवकूफ गिलहरी ...उसके नन्हे बच्चों से ,जिनके अभी ठीक से पंख भी नही उगे हैं ।
यह नही हो सकता "--सबने अविश्वास से कहा ।
"यही हुआ है "--कालू बहुत धीमे व कोमल स्वर में बोला---"मैंने तो तय किया है कि जब तक घोंसले में बच्चे हैं तब तक यह पेड उन्ही का है । आप जो भी सोचें ।"
"हमारे पास भी इससे अलग सोचने कुछ नही है-"--सब एक साथ बोले और पुलकित होकर घोंसले से आती नन्ही आवाजों को सुनने लगे ।

बुधवार, 5 जून 2013

नदिया कहती है ।

नदिया बहती है ।
सबसे कहती है ।
गति ही तो जीवन है ।
गति ही अन्वेषण है ।
तुम चलते रहो ,डरो ना
मन में सन्देह भरो ना  
जो पानी सा बहता है
जो पानी सा रहता है ।
फिर कौन उसे रोकेगा ।
फिर कौन उसे टोकेगा ।
जो खुद ही मुड जाता है,
तो कौन उसे मोडेगा ।
चट्टानों में भी बहकर ,
हर मुश्किल को भी सह कर,
खुद राह बना लेता जो 
उसका ही अभिनन्दन है ।
हाँ गति ही तो जीवन है ।
हाँ गति ही अन्वेषण है ।

नदिया बहती है ।
यों सबसे कहती है ।
तुम सभी ध्यान से सुनलो 
मेरी बातों को गुनलो ।
जल-धारा ही जीवन है ।
 धरती माता का धन है ।
इससे ही हरियाली है।
इससे ही  खुशहाली है।
यह प्राणों की रेखा है ।
यह वैभव अनदेखा है ।
यों करो न इसको दूषित ।
धरती इससे ही भूषित ।
यों मैला करो न जल को ।
क्यों बहा रहे  हो मल को ।
मेरी पीडा को बिसरा
फेंको ना कूडा-कचरा
होता गन्दा तन मन है 
यों नदी करे क्रन्दन है ।
यों नदी करे क्रन्दन है ।

गुरुवार, 30 मई 2013

सूरज सर

सूरज सर के गरम मिज़ाज
जब देखो रहते नाराज 
 क्यों रहते हैं तेवर तीखे ?
क्यों इतने रूखे अन्दाज ?

देते कितने कठिन सवाल

चलते अन्धड और बवाल
बोलें तो--लू सी चलती है 
डरे-डरे से सब बेहाल
किरणों की ये छडी ??...बाप....रे
होगी बहुत पिटाई आज ।
सूरज सर के गरम मिज़ाज

मैं स्कूल नही जाऊँगी -----

झुरमुट से झाँके गौरैया 
गमले में जा छुपी गिलहरी
बिल में छुप गई चिंकी चुहिया ।
अमराई में चुप्पी साधे ,
मोर पपीहा बुलबुल बाज .
सूरज सर के गरम मिजाज .

बेर--बबूल खडे मुर्गा से 

पीपल को आगया पसीना ।
सिट्टी-पिट्टी गुम गुलाब की
गेंदा भी तो गुमसुम है ना ।
रटा सबक भूली सेवन्ती 
बारहमासी भी बेताज ।
सूरज सर के गरम मिज़ाज ।

नदी--ताल की गिनती गडबड

पोखर के हैं हाल खराब
माथापच्ची करी रात भर 
फिर भी बैठा नही हिसाब।
झरना भैया,की भी देखो
बन्द होगई है आवाज ।
सूरज सर के गरम मिज़ाज ।