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शनिवार, 28 जून 2014

"मैं तो छुटकी हूँ ।"


छुटकी गिलहरी वैसे तो हर समय कुछ भी खाने को तैयार रहती है । ब्रेड,बिस्किट,चना मूँगफली से लेकर सूखी रोटी तक बडे चाव से हजम कर जाती है । कुछ नही तो नीम के तने के खर्पटों में छुपे कीडों के ही खोजती चुनती रहती है । यही नही चाय कॉफी की वह बेहद शौकीन है । धोने के लिये रखे कप-गिलासों को लुढ़काकर तली में पड़ी चाय कॉफी की बूँदों की चुस्कियाँ बडे मजे से लेती है । लेकिन उसे जो सबसे ज्यादा पसन्द है ,वह है पके-अधपके फल कुतरना ।
शाखों पर सरपट दौड़ती और टहनियों व पत्तों में छुपती छुपाती वह कब गदराया फल ढूँढ़ लेती है और कब खोखला कर छोड़ देती है ,कोई नही जान पाता। अपने आपको 'कुतरू-उस्ताद' समझने वाले और आँखों में मिर्च झोंककर फल चुरा लेजाने वाले मिट्ठू जी भी चोंच घिसकर रह जाते हैं।

एक दिन की बात है । इधर-उधर घूमते छुटकी ने अनार का एक पेड़ देखा। वैसे तो अनार का पेड़ उसने पहली बार नही देखा था ,लेकिन बडे-बडे अनारों से इस तरह लदा-फदा पेड़ उसने कभी नही देखा था । उसके लिये बड़ा ही रसभरा अनुभव था । टहनियों में लटके हुए बडे-बडे सुर्ख-सुनहरे अनार मानो झूला झूल रहे थे । उनके बोझ से टहनियाँ उसी तरह झुक गईं थीं जिस तरह बोझ से तराजू का पलड़ा झुक जाता है। ऐसे रसभरे अनारों को देख छुटकी का मुँह पानी से लबालब भर गया।
"इन्हें चखे बिना तो मैं रह ही नही सकती "--छुटकी ने सोचा और फुर्ती से उछलती-छलाँगती अनार के पेड़ की ओर लपकी । तभी एक भारी आवाज ने उसे रोका-"ए !ए !रुक ।"
यह आवाज थी शेरू मास्टर की ।
आगे की बात बताने से पहले यह बताना जरूरी है कि शेरू जी बेहद अनुशासन-पसन्द हैं । नियम तोड़ने वालों की वे कपड़े और चमड़ी तक उतार लेते हैं । छोटे-मोटे मुज़रिमों को तो बिना चबाए ही निगल जाते हैं । ये महाशय पहले अपराध-विभाग में जासूस थे ।
बकौल उन्ही के उन्होंने चींटी से लेकर गन्नाचोर हाथी और अण्डाचोर डायनासौर जैसे भारी-भरकम अपराधियों को न केवल पकड़वाया था बल्कि मार-मारकर सीधा भी किया था।
क्या हुआ जो अब उन्हें पूसी और खरगोश के बच्चों की रखवाली का काम सौंपा गया है । क्या हुआ जो अब बड़े-बड़े शिकारियों से भिड़ने की बजाय अमरूद और अनार के फलों को कुतरने आती चिड़ियों और गिलहरियों को हड़काने में लगे हैं,उनका रौब और दबदबा तो वैसा ही है। लम्बे पैने दाँतों को दिखाते हुए पूरा मुँह खोल जो उनका भौंकना शुरु होता है तो लगता है कि टीन शेड पर कोई बड़े-बड़े पत्थर लगातार फेंक रहा हो ।
शेरू के आगे 'मास्टर' लग जाने का कारण यह है कि उन्हें जितना पढ़ने का शौक है उससे ज्यादा शौक पढ़ाने का है। जब और जहाँ भी मौका मिलता है, वे नई जानकारियाँ देने और सवाल करने लग जाते हैं । लोग भरसक बचना चाहते हैं पर कहीं न कहीं तो शेरू जी से सामना हो ही जाता है सो बस गोली दागने की तरह सवाल शुरु । जैसे---
"बताओ उस पेड़ तक पहुँचने तक कम से कम कितनी गिनतियाँ गिन सकोगे?"
"बबूल के पेड़ में फूल आने के सात-आठ महीने बाद फलियाँ आतीं हैं । बताओ बबूल की इस सुस्ती का क्या कारण है?"
शेरू जी का मानना था कि इस तरह से लोगों का सामान्य ज्ञान आसानी से बढ़ सकता है ।
अनार के पेड़ की तरफ आने वाले को शेरू जी के सवालों का जबाब देना खास तौर पर जरूरी था। हाँ कभी-कभी जब कोई शेरू मास्टर के सवालों के जबाब देते देते शिकायत करने लगता कि--
"शेरू दादा देखो मिट्ठू अनार लेगया । आपने उसे तो नही रोका ।"
"शेरू काका वह चिडिया बिना पूछे ही टहनी पर बैठ गई । आपने उससे तो कोई सवाल नही किया..।"
तब शेरू जी बेवशी छुपाकर कहते--"अब चोर उचक्कों के लिये क्या ताला और क्या पहरा । जिस दिन हाथ आगए तो नानी याद करा दूँगा हाँ..।"
     
हाँ तो छुटकी अनार के पेड़ की ओर अपनी धुन में चली जा रही थी कि उसे शेरू ने टोक दिया । छुटकी को उसे अनसुना कर आगे बढ़ने में ही खैर लगी पर तभी शेरू की गरज से आसपास की दीवारें भी बज उठीं ।
"ए ! ए ! कौन है तू ? मेरी बात सुने बिना कहाँ जाती है ?"
इतनी खौफनाक आवाज से छुटकी हड़बड़ा गई और जल्दी से बोली--"मैं ..मैं छुटकी हूँ ।"
"मैंने तेरा नाम नही पूछा कमअक्ल! इधर कहाँ चली जाती है बिना पूछे ?और बता ,कौनसी कक्षा में पढ़ती है ?"
"कक्षा ? यह क्या पूछ रहे हैं महाशय?"--छुटकी अचकचाई  
पढ़ाई-लिखाई से तो उसका दूर दूर तक का वास्ता नही था । कभी स्कूल की सूरत तक नही देखी थी। पर यह कहना भी आफत को बुलावा देना होगा ।अनपढ़ रहने के तमाम नुक्सान बताने के साथ  तुरन्त पढ़ाने बैठ जाएंगे शेरू मास्टर। लेकिन चुप रहना भी तो खतरनाक था इसलिये बिना कुछ सोचे उसने पहले वाला ही जबाब दोहरा दिया--"मैं छुटकी हूँ ।"
"भुलक्कड़ गिलहरी ,नाम तो तू पहले ही बता चुकी है । बार-बार बताना जरूरी नही है । खैर ,बता कनेर के फूलों का रंग लाल होता है कि पीला ?"
"कनेर ? लाल-पीला ?"---छुटकी का दिमाग चकराया । बेकार ही उसने अनार खाने का विचार किया था । कनेर का पेड़ तो उसने कभी नही देखा था। देखा भी होगा तो याद नही । पर इस बात को वह कह नही सकती थी। शेरू मास्टर उसकी पूँछ खींचते हुए कनेर का पेड़ दिखाकर ही मानेंगे । उसने अपना कुछ दिमाग चलाया और बोली--"शेरू दादा मैं गोलू गिरगिट नही छुटकी गिलहरी हूँ ।"
"गिरगिट ? यह मैंने कब कहा?" शेरू का दिमाग चकराया । छुटकी जो पहले घबरा रही थी , अब अनजान बनी उसे उलझाए रखने का आनन्द लेने लगी।
"अच्छा यह बता ,अनार में दाने नही होते तो क्या होता ?"
"क्या होता ,यह कैसा सवाल है ?" उसने सोचा और जबाब दिया--"कितनी बार कह चुकी हूँ कि मैं छुटकी हूँ चुलबुल चुहिया नही ।"
"फिर ..फिर वही बात?" शेरू को अब ताव आया--"सुन गिलहरी तू बहरी है क्या ? मेरे सवालों के जबाब दिये बिना तू आगे नही बढ सकती । समझी । ....चल बता तारे क्या चाँद के बच्चे हैं । अगर बच्चे हैं तो कभी बडे क्यों नही होते ?"
"शेरू दादा! लगता है आपके कानों ने काम करना बन्द कर दिया है। भला कोई भी बात आप सुन समझ नही सकते । किसी डाक्टर को दिखालो
अभी आपकी उम्र भी क्या है?"
"तू ठीक कहती है"-शेरू कुछ नरम पडा पर अगले ही पल उसे ध्यान आया कि वह गिलहरी को रोकने ही खड़ा है।
"लेकिन कम सुनाई तो तुझे देता है। मेरे सामने चालाकी नही चलेगी ।"
"मैं छुटकी हूँ शेरूदादा। नीटू नेवला नही ।किसी से भी पूछलो "-- यह कहती हुई छुटकी पेड की ओर चली ।
"ए ,ए ,ए !--शेरू ने टोका तो वह वही ठहर गई ।शेरू ने गहरी नजरों से परखा देखा --काली-काली आँखों में चालाकी नही भोलापन है । उसके होंठ फड़क रहे हैं । शायद ..शायद नही निश्चित ही डर की वजह से । काली धारियों वाली सुन्दर पीठ को उभारकर, झबरी पूँछ को नीचे दबाए वह अनजान सी उसे देख रही है ।
"च्च..च्च बेचारी इतनी सुन्दर और प्यारी नन्ही गिलहरी बहरी भी होगई ।"--शेरू का मन पिघलते मक्खन सा होने लगा ।
"अच्छा अनार खाना है पर ध्यान रहे लौटकर मुझे बताना कि कितने अनार पक गए हैं और कितने कच्चे हैं । और...।"
फिर तुरन्त ही उसे ध्यान आया कि यह सब उसे कहना बेकार ही है । वह प्यार से उस शरारती और चालाक गिलहरी को देख रहा था जो उछलती कूदती शेरू को देख देखकर कह रही थी--"मैं तो छुटकी हूँ ।"

     ( मई 2003 चकमक में प्रकाशित)  

रविवार, 27 अप्रैल 2014

मच्छर जी !

सुनो-सुनो ओ मच्छर जी !
हो तुम कितने निष्ठुर जी !
बातों-बातों में ही तुमने
मारे डंक बहत्तर जी ।

नन्हे नाजुक लगते हो,

पर दिल के पूरे पत्थर जी ।
दया-धरम का पाठ पढे ना 
हो तुम निपट निरक्षर जी ।

पढने दो ना लिखने दो
ना कहीं चैन से सोने दो ।
करके रखा नाक में दम 
यह ठीक नहीं है मिस्टर जी ।

कछुआ -वछुआ मार्टिन-आर्टिन

सब उपाय बेकार हुए
मच्छरदानी में भी घुस आते हो
कितने मट्ठर जी !

हमें जरा समझाओ, अपनी 
अकल खारही चक्कर जी 
क्या मिलता है तुम्हें खून में
घुली हुई क्या शक्कर जी ?

शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014

रात-रात में ही !!


कल तक थीं टहनी पर ,
कलियाँ जोई-मोई सी ।
अभी-अभी जन्मे शिशु जैसी 
सोई--सोई सी ।
लेकिन देखा सुबह सभी मिल ,
पलक खोल हँसतीं थीं 
खिल--खिल ।
झिलमिल तितली से 
घुलमिल कर
बतियाना भी सीख गईं लो !
रात-रात में ही ...।

हमने देखा ,सूरज पश्चिम

शाम किले के पीछे ।
बाँध पोटली धूप ,
और फिर....
 उतर गया वह नीचे ।
अरे ..सुबह पूरब में कैसे ,
झाँके पीपल के पीछे से ।
इतना चलकर आया कैसे ,
रात-रात में ही ...।

गोल-गोल अमरूद एक ,

जो टहनी में लटका था ।
गदराया था ,
पक जाने तक 
मन उसमें अटका था ।
देखा सुबह लगा वो झटका ,
आँखों में काँटा सा खटका ,
था अमरूद खोखला लटका ।
"कौन कुतर कर इसे खागया ,
रात--रात में ही ..।"

रविवार, 16 मार्च 2014

होली, होली, होली ।

सुबह -शाम सिन्दूरी हो  लीं ।
होली, होली, होली  ।
आँगन धूप झाँक कर बोली , 
होली, होली, होली ..।

खुलीं ,खिलीं कचनारी कलियाँ।
चीं चीं...चूँ,चूँ ..गाऐं चिडियाँ।
हुल्लड करती हरियल-टोली,
होली , होली , होली ,।

सरसों को रँग दिया वसन्ती ,
पीली ,लाल हुई सेवन्ती ।
टेसू ने लो केसर घोली --
होली , होली , होली ।

 जी भर बौराई अमराई ,
बेरों ने खुशबू फैलाई ।
है शहतूत शहद की गोली -
होली , होली , होली ।

हवा झूमती सी लहराती ,
झूम-झटक पेडों को जाती ।
उसके पास गुलाल न रोली -
होली , होली , होली ।

बगुला जी रंगों से बचने ,
नदी किनारे पहुँचे छिपने ।
दे पिचकारी मछली बोली--
होली , होली , होली ।

छुप ना कोयल बाहर आ री ,
तुझ पर रंग चढेगा क्या री ।
खुल कर करले हँसी ठिठोली--
होली , होली , होली ।
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गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

पापा तुम बस मेरे ही हो ...।

सहमे से बोले अप्पू जी
"पाप जरा बताओ ।
क्या तुम दादी के बेटे हो ?
साफ-साफ समझाओ ।"

"हाँ..हाँ वह मेरी माँ हैं-"-

कहकर पापा मुस्काए ।
"बेशक मैं उनका बेटा हूँ ।"
सुन अप्पू घबराए ।

"और बुआ के भैया भी हो ?

दीपा के भी मामा भी...??"
"हाँ"---बोले पापा तो ,उनका 
खिसका पाजामा भी ।

कोई पापा को या ,

पापा अपना कहें किसी को।
नहीं गवारा बिल्कुल-बिल्कुल 
अपने अप्पू जी को ।

डाल गले में बाँह ,

ठुनक कर बोले चढा पाजामा
"पापा तुम बस मेरे ही हो ,
बेटा, हो या मामा....।"

सोमवार, 30 दिसंबर 2013

नई सुबह

नीम की सबसे ऊँची टहनी पर किट्टू ने देखा । अभी तो चारों तरफ अँधेरा था ।आसमान में थरथराते हुए से तारे और धुन्ध में डूबे हुए पेड-पौधे अभी रात शेष होने की सूचना दे रहे थे ।
वह दिसम्बर की आखिरी रात थी । कडकडाती सर्दी में पत्ता-पत्ता काँप रहा था । किट्टू का सारा शरीर बर्फ हुआ जारहा था । लेकिन नई सुबह का विचार उसके मन में ऊष्मा पैदा कर रहा था । 


इस सुबह का किट्टू को बेसब्री से इन्तजार था । अपनी माँ सोना गिलहरी और कई चिडियों से उसने महीनों पहले सुन रखा था कि पहली जनवरी की सुबह नई और अनौखी होगी क्योंकि इस बार पहली जनवरी को केवल साल ही नया नही होगा बल्कि सदी भी नई होगी । साल या सदी का बदलना किट्टू के लिये एकदम नई बात थी । इसलिये वह सबसे अदिक उत्साहित था । अपने सारे क्रियाकलाप छोड कर वह मुँडेर पर धूप का आनन्द लेता हुआ उत्सव की उन तैयारियों के बारे में सुनता रहता जो नववर्ष के स्वागत के लिये की जारहीं थी ।
हरियल ,मैना पंडुकी,बया, कबूतर और नीलकण्ठ ने गीतों का कार्यक्रम तैयार किया था ,कुछ इस तरह कि गाते-गाते सबेरा हो और नए साल का स्वागत मधुर गीतों से हो । वे सबको यह भी दिखा देना चाहते थे कि गीत गाना केवल कोयल, पपीहा, या श्यामा को ही नही ,उन्हें भी आता है और बेशक उनसे अच्छा ।
गौरैया, बुलबुल, फुदकी ,हुदहुद ,कठफोडवा, आदि ने नृत्य प्रस्तुत करने का जिम्मा लिया । उन्होंने मोर के परम्परागत नृत्य से अलग एक नई शैली का नृत्य तैयार किया था जिसमें उछलना, कूदना ,दौडना, खदेडना, और भिडना ,सब शामिल था । उनके विचार से खुशी जाहिर करने का यह एक बेहतर और मौलिक तरीका था ।
चींटू चूहे और छुटकी छछूँदर ने शानदार दावत रखी थी और उल्लू व चमगादड ने रोशनी का बढिया इन्तजाम किया था । 
अरे मुझको भी तो कोई काम दो...मुझे भी तो नई सुबह का स्वागत करना है ...। किट्टू इन तैयारियों को देख उत्साह से भर जाता । गौरैया कहना चाहती कि , अभी उँगली भर के हो बच्चे । क्या काम करोगे । लेकिन उसने चहक कर कहा----"बिल्कुल ,और तुम्हें जो करना है वह यह कि अपनी खूबसूरत पूँछ को सम्हाले मूँगफली के दाने कुतरते रहो और हम सबके काम की निगरानी करो ।"
दिसम्बर की उस आखिरी रात अपने वशभर कोई नही सोया । लेकिन रात ढलते-ढलते सबको नींद के झोंके आने लगे । अकेला किट्टू ही था जिसने एक पल भी झपकी नही ली । उसे फिक्र थी कि सोजाने पर हो सकता है कि नई सुबह के आने का पता ही न चले । और इस तरह तो वह सुबह का स्वागत कर ही नही सकेगा । इसलिये जैसे ही कुक्कू मुर्गे ने पहली बाँग दी--" कुकडू.....कूँ " वह फुर्ती से पेड की सबसे ऊँची टहनी पर जाकर बैठ गया । वहाँ से नई सुबह को सबसे पहले अभिवादन किया जा सकता था ।
लेकिन आसपास घिरे अँधेरे को देख उसे कुक्कू की जल्बाजी पर अचरज हुआ ।
"तुम्हारी अक्ल को क्या हुआ है कुक्कू ? क्या अब भी तुम्हें किसी ने टार्च दिखादी ,जो रात में ही सुबह का एलान कर बैठे ?"
"अरे नही किट्टू जी,"---कुक्कू झेंप कर बोला---"वह तो टी.वी. वालों ने टार्च का विज्ञापन जो करवाया था । कमाई वाली बात थी न । लेकिन अब तो मैंने यकीनन सही समय पर ही बाँग दी है । क्या है कि सर्दियों में सूरज सर रजाई से निकलने में अलसाते हैं इसलिये उजाला नही होपाता । बाँग सुन कर पहले चिडियाँ जागतीं हैं फिर वे सूरज जी को जगातीं हैं तब कहीं आराम से बाहर निकलते हैं जनाब इसीलिये तो....। सब्र करो ,कुछ ही देर में उजाला होने लगेगा ।"
सचमुच कुछ देर बाद पेड-पौधे धुन्ध की चादर उतारने लगे । तारे भी एक-एक कर गायब होने लगे । और फिर पूरब में क्षितिज पर लालिमा बिखरने लगी ।
बस अब नई सुबह आने को ही है---किट्टू ने खुश होकर देखा । जैसे झाँझी के सूराखों से दीपक की रोशनी फूटती है वैसे ही प्राची के क्षितिज से सुनहरी किरणें फूटने लगीं थीं । और कुछ ही पलों में पहाड के पीछे से किसी ने जैसे बडी लाल गेंद को उछाल दिया हो , सूरज उभर कर ऊपर उठने लगा।
"नई सुबह मुबारक हो ! मुबारक हो "---पेडों की टहनियों पर बैठीं चिडियाँ चहकने लगीं । पेड किसी झुनझुने की तरह बज उठे । तभी सोना ने पुकारा----"किट्टू , मुबारक़ नई सुबह । तुम वहाँ अकेले क्या कर रहे हो ? हमारे साथ आकर खुशियाँ मनाओ ।"
"नई सुबह ?" किट्टू ने आश्चर्य से पूछा ।
"कहाँ है नई सुबह ?" मैं तो उसके आने का रात से ही इन्तजार कर रहा हूँ ।"   
"तुम्हें नई सुबह नहीं दिखाई देती ?"---कालू कौवे का छोटा बच्चा बोल पडा जो दिखने में कालू जैसा ही बडा होने पर भी सूरत से काफी बचकाना और भोला लगता था----"तुम्हारी आँखें तो दुरुस्त हैं न ?" 
"मेरी आँखों को छोडो, पहले यह बताओ कि नई सुबह है कहाँ ?"--किट्टू ने तेजी से पूछा ।
"यही तो है नई सुबह ।" कौवा के बच्चे ने कहा और अपनी माँ से उसकी पुष्टि करवाने बोला----"है न माँ ?" 
"बिल्कुल " उसकी माँ विश्वास के साथ बोली --"यही तो है नई सुबह ।"
नन्हा किट्टू बडा हैरान हुआ । उसने फिर से चारों ओर गौर से देखा । सब कुछ रोज जैसा ही तो है 
सूरज रोज की तरह ही लाल रंग का उगा है । आसमान नीला ही है । सामने का पहाड आज भी सुरमई रंग का है । नदी उसी तरह पश्चिम की ओर बह रही है । खेत ,मैदान,पेड-पौधे फूल-पत्ते, सब जैसे कल थे वैसे ही तो आज भी हैं । यहाँ तक कि हवा भी उतनी ही ठण्डी है वैसी ही खुशबू वाली । आखिर नयापन है भी तो कहाँ ??
"मैं क्या जानूँ ?" कौवे का बच्चा किट्टू के तर्कों से उलझन में पड गया --" मेरी माँ कहती है , कैलेण्डर ,टी.वी., रेडियो, अखबार और सारी दुनिया कह रही है ,वह क्या गलत है ?"
लेकिन किट्टू के गले यह बात नही उतरी कि सिर्फ अखबार में छपने या कैलेण्डर के अंक बदलने से ही कोई सुबह नई कैसे हो सकती है जबकि सब कुछ वैसा ही हो ।
"तुम्हारा सोचना अपनी तरह से बिल्कुल सही है "----सोना ने किट्टू को प्यार से समझाया --"केवल कैलेण्डर से नई सुबह नही हो सकती क्योंकि जितने कैलेण्डर उतने ही नए साल । कोई पहली जनवरी को नये साल का आरम्भ बताता है कोई बाईस मार्च को ,कोई गुडी पडवा को तो कोई मोहर्रम की पहली तारीख को ....। दरअसल वह नयापन अखबार कैलेण्डर मे नही हमारे अपने मन में है ।"
किट्टू यह सुनकर और भी उलझ गया । 'नयापन ? विचारों में ? कैसे ?..।
सोना समझाती रही ---"हाँ मेरे बच्चे ,नयापन हमारे अपने विचारों से आता है । मान लो कि पूरे साल कोई त्यौहार न आए । कोई होली, दिवाली ,दशहरा ,ईद ,क्रिसमस आदि त्यौहार न मनाए जाएं तो पूरा साल कितना लम्बा और उबाऊ लगेगा । न आनन्द होगा न उल्लास । त्यौहार हमें खुशी ही नही उम्मीदें व हौसले भी देते हैं । नई सुबह को भी तुम नए एहसास का नाम दे सकते हो । नए विचारों व नए संकल्पों का नाम । नए साल के बहाने हम मन में उल्लास उमंग और ताजगी लाते हैं । उल्लास के साथ बिताए कुछ पल हमें नई ऊर्जा देते हैं । मेरे विचार से तो नई सुबह का यही मतलब है ।"
"फिर तो माँ "....किट्टू माँ की बात को और ज्यादा समझने के लिये थोडा रुका फिर बोला--" हम हर सुबह को भी एक नई सुबह मान कर एक खुशहाल दिन की शुरुआत कर वसकते हैं ।" 
"क्यों नही ?" तमाम चिडियाँ चहक उठीं---"यह तो और भी अच्छी बात होगी ।" और फिर वे किट्टू को नववर्ष के उत्सव में खींच ले गईँ ।
(जनवरी सन् 2000 चकमक में प्रकाशित )

गुरुवार, 28 नवंबर 2013

जाडे आए भैया ।

सहमे -सिकुडे लगते हैं दिन ,
रातें बडी लडैया ...
जाडे आये भैया  ।

खीच-खीच सूरज की चादर,
रजनी पाँव पसारे ।
काना फूँसी करें उघारे ,
थर्..थर्..चन्दा -तारे ।
धूप बिचारी ...हारी ,
जल्दी करती  गोल बिछैया ...
जाडे आये भैया ।

लदे फदे कपडों में निकलें ,
चुन्नू-मुन्नू भाई,।
मम्मी के हाथों में नाचे ,
दिन भर ऊन-सलाई।
किट्-किट्..करते दाँत,
 कंठ से सी...सी दैया--दैया ।
जाडे आये भैया ।

ठण्डे पानी से है कट्टी,
साथी धूप सुनहली .
देर रात बैठे अलाव पर ,
करते यादें उजली ।
अनजाने से लगते हैं अब ,
नदिया ताल तलैया ।
जाडे आए भैया ।

अमरूदों ने मीठी-मीठी 
खुशबू है फैलाई।
गोभी गाजर मटर टमामर ने
बारात सजाई ।
गन्ने होगये रस की गागर ,
सरसों भूल-भुलैया ...
जाडे आये भैया ।

खेलो, खालो ,पढलो सो लो ,
अब तुम जी भर-भऱ के ।
कोई काम करो मत भैया ,
घबरा के डर-डर के ।
"सर्दी लग जायेगी"--कहते ,
हारे बेशक मैया ।
जाडे आये भैया ...।
(सन् 1994 के आसपास रचित व चकमक के सौ वे अंक में प्रकाशित)