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गुरुवार, 14 मई 2015

'कामधेनु '

१९८८ की एक रचना
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एक तो उम्र का तकाजा और दूसरे खानेपीने में कसर ,सो चांदुल सुबह साथी गाय-भैंसों के साथ जंगल चली तो जाती है लेकिन लौटते हुए एक एक कदम भारी हो जाता है .पैर कहीं के कहीं पड़ते है .
“ चांदुल मौसी ,अब तो तुम घर रहकर आराम करो . वन-वन भटककर चरने के दिन नहीं रहे तुम्हारे .अब तो जो भी मिल जाए खूंटे पर ही खा लिया करो ”—साथी जानवर समझाते हैं पर चांदुल का मन नहीं मानता .एक तो घर पर अब चारे के नाम पर सूखे टटेरे मिलते हैं जिन्हें चबाते चबाते जबड़ा दुःख जाता है पर पेट नहीं भरता . फिर बाहर निकलने की आदत छूटती नहीं . बाहर खुला आसमान , हरे-भरे पेड़-पौधे ,तमाम पाँख-पखेरू .नदी की धारा ..बगुला सब उसके पुराने दोस्त हैं .उन्हें देखे बिना चांदुल का जी नहीं लगता .
एक समय था जब इस दुधारू भैंस की नजर उतारी जाती थी . एक समय में कम से कम दस-बारह लीटर दूध देती थी .उसके आगे बिना दाना –दलिया ,खली-‘पीना’ के भूसा नहीं रखा जाता था .और गुड़ तिल अलसी और तेल की खुराक अलग . सारा घर उसकी देखभाल करता था कि चांदुल प्यासी तो नहीं ..चांदुल कीचड़ में तो नहीं बैठी ...की चांदुल धूप तो नहीं लग रही ...शरीर चिकना होगया था . हड्डी कहीं नाम को नहीं दिखती थी . चलती थी तो जैसे धरती दमदमाती थी . बच्चों ने उसे चांदुल नाम दिया था पर मालिक किसन उसे 'कामधेनु' कहता था . गले में काला कपड़ा , कछुआ की हड्डी , और न जाने क्या क्या बाँध रखा था कि किसी की ‘हाय’ न लगे . बूढी होते-होते उसने पांच चान्दुलें देकर किसनलाल का घर भर दिया .दूध से भी और रुपयों से भी .
अब उसकी वैसी देखभाल नहीं है . मंगली और कजरी की तरह उसे हरी घास नहीं मिलती . सूखा भूसा डालते समय बंसी की अम्मा एक झिड़की भी दे जाती है कि ,‘इसके लिए रोज गाडीभर चारा कहाँ से लाएं ?’  तो क्या हुआ चांदुल के लिए वह अपना घर है .
“इसी खूंटे पर जिन्दगी बीती है और यही किसी दिन मर जाऊँगी .तब तक तो बैठकर नहीं रहने वाली मेरे बच्चो !    
रोज की तरह छोटे बड़े साथियों के साथ मन बहलाती चांदुल घर लौटी और तभी उसके कानों में आवाज आई “यही है देखलो .”
“ यह ? यह तो एकदम बूढ़ी है .”      
“ बूढ़ी है तो क्या ,डील-डौल नहीं देखते ? अकेली दो ‘पडों’ की बराबर है .हजार रुपए कोई भी हंसकर दे देगा .” ”
“ मैं पांच सौ से ज्यादा नहीं दूंगा .”
“चलो न तुम्हारी न मेरी ,सात सौ में बात पक्की .”
चांदुल ने देखा दो आदमी हरी-नीली लुंगियां पहने ,सिर से कपड़ा बांधे उसी को घूर रहे हैं .दोनों के हाथ में लाठी है .
कुछ समझी कुछ नहीं .पर इतना जान गई कि उसे इस घर से निकाला जा रहा है क्योंकि किसन ने खूंटे से उसकी रस्सी खोलकर उन लोगों के हाथ में दे दी . वे रस्सी को खींचने लगे पर चांदुल ने पाँव जैस जमीन में गडा दिए .
“ चल चल ..” एक ने टांगों में लाठी मारी .चांदुल ने बेवशी के साथ किसन को देखा मानो कह रही हो –मुझे क्यों दूर कर रहे हो . मैं किसी को कोई परेशानी नहीं दूंगी पर आखिरी दिन भी यहीं गुजार लेने दो ना ..अब कहाँ है बंसी जो पूरी रात नहीं सोया था जब एक रात वह लौटी नहीं थी . सुबह जब लौटी तो बंसी उसकी गर्दन से लिपटकर रोया था . कहाँ है बंसी की माँ जिसने उसे बेचने के विरोध में दो दिन रोटी नहीं खाई थी .
“ अरे ऐसे नहीं जाएगी . थोडा डंडा दिखाना पड़ेगा .” यह किसन की आवाज थी .उसे कामधेनु कहने वाले किसन की .
“ सड़ाक..सड़ाक ..” पीठ पर कसकर डंडे पड़े .चांदुल तडफ उठी . दोनों आदमी पूरी ताकत से चांदुल को खींच रहे थे और किसन पीछे से हांके जा रहा था . गाँव के बाहर तक छोड़कर वह लौट आया जैसे वह चांदुल को जानता ही न हो .
डूबते सूरज की सुनहरी किरनों में बंसी की झोपडी चमक रही थी .पंछी चहचहाते हुए घर लौट रहे थे लेकिन चांदुल घर से दूर जा रही थी . धीरे धीरे शाम धुंधला गई और साथ ही चांदुल की यह उम्मीद भी कि कोई उसे लौटकर ले जाएगा .
(चित्र गूगल से आभार सहित )

गुरुवार, 19 मार्च 2015

मुनमुन जी का पेपर

“आज सुबह था मुनमुन जी का ;
पहला-पहला पेपर
पहुँच गई स्कूल हुलस,
सबसे पहले बनठन कर .
पेपर करके घर आई ,
दीदी पर रौब जमाया .
नखरों से खाना खाया ,
फिर ऊधम खूब मचाया .

चाचा बोले—“ ओ मुनमुन जी !
जरा दिखाओ पेपर .
देखूं तो दस में से कितनों के ,
सही लिखे हैं उत्तर .

“क्या देखोगे चाचा ! मैं
लिख आई सबके उत्तर .”
“अच्छा ?? देखूं तो , लिख आई
पहले का क्या उत्तर .”

पहला ही बस छूट गया ,
बाकी सारे लिख आई .
“और दूसरा ?”
“जाने कैसे इसे भूल ही आई .”

“चलो , तीसरा ?”
“इसे छोड़ बाकी सारे आते थे .”
“चौथे का क्या.. ?”
“चाचा ! बच्चे शोर मचाते थे .”
“और पांचवां ,छठवां ?”
“ये दीदी ने नहीं पढाए .”
सिर खुजलाती मुनमुन बोली ,
चाचाजी मुस्काए .

गोलमाल सातवाँ , आठवाँ
छूटा कहीं भटककर .
“और पूछलो जो भी चाहो ,
केवल नवां गटककर .”

“दसवां तो कर आई होगी .”
हंसकर बोला बंटी .
“लिखने ही वाली थी ,तबतक
बज गई टन टन घंटी .”     

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2015

बुलबुल के बच्चे

बुलबुल के थे अण्डे तीन
उनसे निकले बच्चे तीन
माँ समझे नादान अभी तक
Image result for बुलबुल और बच्चेलेकिन वे हैं बडे ज़हीन ।

कल तक देख नही पाते थे
चीं चीं ची चीं चिचियाते थे
लेकिन आज इरादे उनके
उड जायें लंका या चीन ।

पडने लगा घोंसला छोटा
दाने-दुनके का भी टोटा
माता-पिता चुगाते दिनभर
खाने के बेहद शौकीन ।

कोई भी आहट जब आती
गर्दन तान फुलाते छाती
खतरों से डरना छुप रहना
लगे उन्हें अपनी तौहीन।

   चित्र--गूगल से साभार  

मंगलवार, 23 दिसंबर 2014

माँ

वह बहुत ही सर्द सन्नाटे से भरी रात थी .सर्दी के आतंक से सड़कें ,गलियां सहमी और खामोश थीं. पेड़-पौधे कोहरे की चादर में लिपटे थे फिर भी काँप रहे थे . बाहर लॉन में यूकेलिप्टस के पत्ते आंसू बहा रहे थे .यह सब देख जैसे सितारे भी थरथरा उठे थे .
उस समय रात के लगभग साढ़े बढ़ बजे होंगे . लेकिन श्रीमती वर्मा अभी तक जाग रही थी और नीद की प्रतीक्षा उसी तरह कर रही थीं जिस तरह प्लेटफार्म पर कोई यात्री लेट हुई ट्रेन की प्रतीक्षा करता है .
श्रीमती वर्मा की नींद उड़ने का कारण कोई चिंता भी हो सकती थी और कड़ाके की सर्दी भी, जो  परीक्षा में ड्यूटी देने वाले मास्टरजी की तरह सब जगह कड़ी नजर जमाए थी.
लेकिन वास्तव में उनकी नींद उड़ने का कारण किवाड़ की दरार से आती पतली सी आवाज थी—कूं..कूं ..कूं .. जो क्रमशः कातर होती जाती थी .
“यह कम्बख्त तो फिर लौट आया शायद “—श्रीमती वर्मा ने कुढ़ते हुए सोचा .
 “ कितना ढीठ है जरा सा पिल्ला ? खुद इतनी दूर छोड़कर आई थी फिर भी सूंघ-सांघकर  लौट आया मरा . यह सारी  करामात दीपू की है .”   
दीपू श्रीमती वर्मा यानी शोभादेवी का भांजा है .बड़ी ननद ने यहाँ पढ़ने के लिए भेजा है पर इसे शोभादेवी ही जानती हैं कि दीपू का मन पढाई में कम और कुत्ता-बिल्ली के बच्चों से खेलने और और गिलहरियों को चना मूंगफली खिलाने ज्यादा लगता है . कही किसी पेड़ पर कोई घोंसला दिख गया तो समझो उसका दिन वहीँ बीतना है .यही वजह है कि पढाई के बहाने दीपू अक्सर सक्सेना जी के बगीचे में जा बैठता है .
शोभादेवी को दीपू के इन शौकों से कोई खास आपत्ति नहीं है लेकिन घर में किसी जानवर के बच्चे ,खास तौर पर कुत्तों को लाने की सख्त मनाही है क्योंकि वह काफी सफाई-पसंद महिला है .
लेकिन पिल्लों को देख दीपू का खुद पर काबू नहीं रहता है .मामी की वर्जना के बावजूद उसके साथ कोई न कोई पिल्ला या किसी जानवर का बच्चा देखा जासकता है .
उस दिन भी ,यह जानते हुए भी कि पिल्ले को देख मामी का पारा चढ़ जाएगा ,वह एक काले गोल-मटोल गुलफुले से पिल्ले को ले आया .मामी ने देखते ही आदेश सुनाया –“ घर में आना है तो इसे कही बाहर छोड़कर आ .नहीं तो तू भी इसके साथ गलियों में भटक .मैं जीजी से कह दूंगी कि...
“मामी ! मेरी बात तो सुनो प्लीज ..”—गजब का ढीठ है दीपू भी .डरने का अभिनय करता हुआ पिल्ले को लिए ही अंदर आगया .
“मैं तुम्हें नाराज नहीं करना चाहता था मामी सच्ची , विद्या-कसम लेकिन क्या है कि यह बेचारा तीन दिन से भूखा है .कोई बेरहम इसकी माँ को कुचलकर भाग गया .बेचारा उसी जगह बैठा जोटा रहता है . मामी मैं इसे छोड़ आऊंगा सच्ची ,बस जरा सा दूध दे दो .”
शोभादेवी ने दूध इस शर्त पर दिया कि दीपू आज ही अभी उसे कही दूर छोड़ आएगा.
 “एक बार लपक गया तो जाने के नाम भी नहीं लेगा यह .देखो न दूध को कैसे लपलप करके पी  गया . ”
शर्त के अनुसार दीपू पिल्ले को छोड़ आया पर शाम को वह घर की चौखट पार कर रहा था .
“मैं दीपू की चालबाजी खूब समझती हूँ .जरुर यही-कही छोड़कर आया होगा जानबूझकर .” –शोभादेवी ने अपने पति श्री वर्माजी को बताया और कहा—“ मुझे दीपू पर जरा भी भरोसा नहीं . आप खुद इसे कही दूर छोड़कर आना .”
वर्माजी पत्नी के निर्देशानुसार उस पिल्ले को दूर किसी गली में छोड़ आए  पर यह क्या, दो दिन बाद वे महाशय शान से वर्माजी के द्वार की तरफ चले आ रहे थे . यह देख शोभादेवी ने अपना माथा पीट लिया . मारे खीज के उसे पैर से दूर धकेला ,मन ही मन दीपू को बुरा भला कहा और फिर खुद जाकर उसे  स्टेशन के उस पार एक नाले के किनारे छोड़ आई .
“अब नहीं आएगा”—शोभादेवी ने तब इत्मीनान से सोचा था .

“लेकिन मैं तो आ गया .“---बाहर से लगातार आ रही कूकने की आवाज जैसे यही कह रही थी .   
 “आ गया है तो मर “—शोभादेवी ने रजाई को चारों ओर से दबाते हुए अपने आपको मुक्त किया  . 
रात के साथ सर्दी की भी गहराई बढती जा रही थी .दीपू और वर्माजी गहरी नींद में थे पर शोभादेवी कुछ ज्यादा ही सर्दी महसूस कर रही थीं .रजाई के अंदर भी हाथ-पाँव जमे जा रहे थे .
“जब अंदर कमरे में , रजाई के भीतर यह हाल है तो बाहर क्या होगा ? कही वह ठिठुरकर मर-मरा न जाए “
इस विचार के बाद वह लेटी न रह सकी .किवाड़ खोलकर देखा .पिल्ला दीवार से चिपका काँप रहा था .मानो ठण्ड से बचने दीवार के अंदर घुस जाना चाहता हो . उसका कूकना धीमा होगया था जैसे बहुत रो लेने पर बच्चा निढाल हो जाता है .
शोभादेवी ने पिल्ले को उठाकर शाल में लपेट लिया . और रजाई में दबा दिया . उन्हें महसूस हुआ कि नन्ही सी धडकनों से उसका कोमल शरीर हिल रहा था . हल्की सी घुरघुराहट उसकी राहतभरी नींद की सूचना थी .
अब शोभादेवी को नींद आने लगी थी .    


गुरुवार, 13 नवंबर 2014

अलविदा -दूधिया दाँत

14 नवम्बर 2014
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पूरा पक जाने पर टपके टहनी से ज्यों आम ।
पूरी खिलकर ,झट से झर जाएं पाँखुरियाँ  शाम।


छुट्टी मिलते ही शाला से बच्चे दौड़े भागे

 रोज खिसक लेते चन्दा जी ,सूरज जी के जागे ।
ऐसे ही अलविदा कह गए छोड़ दूधिया पाँत।
खोल हँसी की खिड़की खिसक गए नटखट दो दाँत ।


मान्या जी थीं हक्की बक्की एक न फूटा बोल । 
जाते जाते दाँत ,खोल गए सबके आगे पोल ।

   


आठ साल की होगई है अब मेरी गुड़िया रानी 
सालों साल सबेरा उसकी लिक्खे नई कहानी ।

मन की महकी फुलबगिया है , आँखों की उजियारी ।
उसकी मीठी बातों में ही ,सिमटी दुनिया सारी ।




मंगलवार, 16 सितंबर 2014

मेरी बकरी

मेरी बकरी
है चितकबरी
पर वह थोडी सी है बहरी।
चाहे कुछ भी उसे सिखालो
वह तो ,मैं....मैं....पर ही ठहरी ।

मेरी बकरी
चटपट चबरी
खाने में पूरी बेसबरी
दिन भर मुँह चलाती रहती
पल-पल पूँछ हिलाती रहती
अचरा-कचरा सब खाजाती
सब्जी -भाजी चना चपाती
छिलका-भूसा चट कर जाती
जहाँ-तहाँ मैंगनी गिराती

मेरी बकरी 
बडी गुनहरी
भोली-भाली सीधी-सादी
तीस मेमनों की वह दादी
जब भी चाहो दूध निकालो
बिना मुसीबत इसको पालो

शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

कितने रंग तुम्हारे !


बादल भैया ,
अजब-गजब के हैं ये ढंग तुम्हारे ।
कितने रूप बदलते पल में ,
कितने रंग तुम्हारे ।

 कुल्फी, सॉफ्टी,आइसक्रीम 
तो कभी केक लगते हो 
कभी बाल गुड़िया जैसे ही 
बड़े 'फेक 'लगते हो ।


कभी हिरण ,खरगोश
कभी काले सफेद गुब्बारे ।
कभी भेड--बकरी जैसे ही 
चलते बना कतारें ।
जंगल बाग पहाड़ 
कभी तो महल-दुमहले न्यारे ।। 

भालू बन्दर शेर कभी
लगते हाथी के बच्चे 
या बरखा रानी के हो तुम 
मटके काले कच्चे ।
छूने से ही फूट पड़ें 
फिर छूट पड़ें बौछारें ।।

कभी कपासी और कभी ,
लगते हो तीतरपंखी
कभी सुनहरे लाल कभी 
हो जाते हो नारंगी ।
काजल जैसे भी तो तुम
लगते हो हमको प्यारे ।।